मुकेश-राग:पंकज राग का कथा-वक्तव्य
“पंकज राग मूलतः कवि हैं। हिंदी फ़िल्मी गीतों के सहृदय प्रेमी भी हैं। इसी कारण है कि वे एक अनोखा काम करते हैं – वे एक कवि को संगीत की दुनिया में ले जाते हैं और संगीत की कहानी भी एक कवि की तरह कहते हैं।हिंदी फिल्म-संगीत के प्रति उनका अनुराग केवल रसिकता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दृष्टि है। वे कविता को संगीत की ओर ले जाते हैं और संगीत को कविता की तरह पढ़ते हैं। कह सकते हैं कि पंकज राग का भीतर का कवि, मुकेश के भीतर के गायक से संवाद करता है। इस बार पंकज राग के भीतर के कवि ने मुकेश के संगीत की कथा कही है, और जो कहा है, वही इस रिपोर्टालेख का केंद्र है।अर्थशिला के ऐसे आयोजन इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं कि वे विभिन्न विधाओं के बीच सार्थक संक्रमण और संवाद का अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। –संपादक
20 जून, अर्थशीला, पटना। जून की एक तपती हुई संध्या थी। दिन भर की धूप शहर की दीवारों, सड़कों और लोगों के चेहरों पर अपनी थकान छोड़ गई थी। हवा में लू की बची हुई किरचें तैर रही थीं। इतनी गर्मी, लू कि ऐसा लगता था मानो पूरा शहर किसी ठंडी छाया, किसी पुराने गीत, किसी भूली हुई स्मृति की प्रतीक्षा में बैठा हो।
फिर अर्थशीला, पटना के भूमिगत हॉल में धीरे-धीरे शाम उतरी। बाहर गर्मी थी, भीतर मुकेश थे।
कारण लेखक-कवि पंकज राग थे। अर्थशीला, पटना में ‘मुकेश को याद करते हुए’ पंकज राग का कार्यक्रम केवल एक वक्तव्य नहीं था। उसे व्याख्यान कहना उसके साथ अन्याय होगा, और उसे संगीत-संध्या कहना भी पर्याप्त नहीं। वह न शास्त्रीय अर्थों में किस्सागोई थी, न नाटकीय एकल-अभिनय, न ही पारंपरिक भाषण। वह इन सभी की सीमाओं के बीच जन्म लेती एक प्रस्तुति-विधा थी, जिसके लिए हिंदी में अभी कोई स्थिर नाम भी उपलब्ध नहीं है।
रोलैंड बार्थेस ने अपने साक्षात्कार “The grain of the voice” में कहा है आवाज़ केवल ध्वनि नहीं होती, वह व्यक्ति के शरीर, समय और जीवन का स्पर्श अपने भीतर लिए रहती है। यह आवाज का केवल गुण नहीं है, बल्कि यह गायक के शरीर की उपस्थिति है जो संगीत और भाषा के बीच घर्षण से उत्पन्न होती है। मुकेश की आवाज के इसी गुण को पंकज राज ने अपनी इस प्रस्तुति में पकड़ने का प्रयास किया है।
साहित्य, संगीत, रंगमंच और व्याख्यान जब अपनी-अपनी पृथक सीमाओं में बंद रहते हैं, तो वे धीरे-धीरे अपने ही व्याकरण के बंदी बन जाते हैं। सृजन की वास्तविक ऊर्जा उन सीमाओं के टूटने में निहित है, जहाँ एक कला दूसरी कला की भाषा सीखती है। महान कलाएँ अपने भीतर सदैव किसी दूसरी कला की स्मृति लिए रहती हैं—सिनेमा चित्रकला से सीखता है, रंगमंच संगीत से, कविता सिनेमा की दृश्यात्मकता से और संगीत कथा की समय-संरचना से।
विडंबना यह है कि हिंदी साहित्यिक संस्कृति में विधाओं के बीच इस प्रकार का रचनात्मक आदान-प्रदान अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। यहाँ लेखक प्रायः लेखक से, कवि कवि से और आलोचक आलोचक से संवाद करता है; चित्रकार, संगीतकार, फिल्मकार या रंगनिर्देशक उसके आलोचनात्मक परिदृश्य में अपेक्षित स्थान नहीं बना पाते। परिणामतः अनेक साहित्यिक आयोजन ज्ञान तो देते हैं, किंतु अनुभव नहीं रचते।
पंकज राग का कथा-वक्तव्य इसी जड़ता के विरुद्ध एक रचनात्मक हस्तक्षेप है। इसकी विशिष्टता केवल इस बात में नहीं है कि इसमें मुकेश के गीत सुनाए जाते हैं, बल्कि इस बात में है कि यहाँ संगीत को तर्क, जीवनी को संरचना और स्मृति को आलोचनात्मक उपकरण बना दिया गया है। यह प्रस्तुति हमें याद दिलाती है कि किसी कला को जीवित रखने का सबसे विश्वसनीय उपाय उसकी सीमाओं की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन्हें पार करने का साहस करना है।अर्थशिला के ऐसे आयोजन इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं कि वे विभिन्न विधाओं के बीच सार्थक संक्रमण और संवाद का अवसर उपलब्ध करा रहे हैं।
इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि मुकेश के जीवन की किसी निर्णायक घटना का सटीक नैरेशन होता और फिर बिना किसी कृत्रिम संक्रमण के उसी प्रसंग से जुड़ा मुकेश का गीत वातावरण में उतर आता। यहाँ गीत ‘ब्रेक’ नहीं था, बल्कि कथा का अगला अनुच्छेद था।
अलग-अलग किस्सों के बीच उस शाम बार-बार यह अनुभव हुआ कि मुकेश की आवाज़ दरअसल भारतीय भावनाओं की एक सामूहिक स्मृति है। उसमें प्रेम है, लेकिन प्रेम से भी अधिक उसकी प्रतीक्षा है। उसमें दुःख है, लेकिन दुःख से भी अधिक उसकी गरिमा है। उसमें भक्ति है, लेकिन भक्ति से भी अधिक आत्मा की बेचैनी है।
मुकेश वहाँ एक गायक के रूप में उपस्थित नहीं थे। वे कभी राज कपूर की आँखों में उतरते हुए दिखाई देते थे, कभी मनोज कुमार के आदर्शवाद में, कभी किसी मध्यमवर्गीय प्रेमी की संकोची चुप्पियों में, तो कभी कबीर के निर्गुण की तरह आत्मा के भीतर गूँजते हुए। और पंकज राग ने ये किस्सा आवाज़ की उस गरिमा के साथ कहा, जो मुकेश जैसे संत-स्वभाव व्यक्ति की कथा कहने के लिए अनिवार्य है। Roland Barthes का प्रसिद्ध विचार “The grain of the voice” याद आता है। उनके अनुसार आवाज़ केवल ध्वनि नहीं होती, वह व्यक्ति के शरीर, समय और जीवन का स्पर्श अपने भीतर लिए रहती है। पंकज राग की प्रस्तुति इसी “grain” को कथा के भीतर सक्रिय करती है।
ऐसा लगा कि हम किसी कार्यक्रम में नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा और संगीत की सामूहिक आत्मकथा के भीतर बैठे हैं।
मुकेश की आवाज़ को सबसे अधिक फिल्मों में इस्तेमाल करने वाले संगीतकारों में कल्याणजी–आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्होंने लगभग 57 फिल्मों में मुकेश से गीत गवाए। गीतों की संख्या के हिसाब से भले ही शंकर–जयकिशन आगे हों, लेकिन फिल्मों की संख्या में कल्याणजी–आनंदजी का स्थान विशेष है।
कल्याणजी भाई अक्सर एक रोचक घटना सुनाया करते थे। एक दिन उनके संगीत-कक्ष से मुकेश बाहर निकल रहे थे और उसी समय एक अत्यंत प्रशिक्षित शास्त्रीय गायक भीतर प्रवेश कर रहे थे। मुकेश के जाते ही उस गायक ने कुछ खिन्नता से कहा, “इन्हें न तो शास्त्रीय संगीत का विशेष ज्ञान है और न ही कोई बड़ी तकनीकी दक्षता, फिर भी देखिए, इन्हें कितने अवसर मिलते हैं। हम लोगों को तो ऐसे मौके नहीं मिलते।”
कल्याणजी भाई अपनी सहज विनोदप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अभी-अभी जो गीत रिकॉर्ड हुआ है, वह मैं आपको सुनाता हूँ। यदि आप उसमें वही भाव, वही अनुभूति ला सकें, तो मैं आपकी बात मान लूँगा।” उस गायक ने तीन-चार बार प्रयास किया, लेकिन वह भाव नहीं रच पाया। तब कल्याणजी भाई ने कहा, “अब समझ गए कि मुकेश को इतना क्यों पूछा जाता है? संगीत केवल सुरों का नहीं, भावों का भी संसार है।”
वह गीत था— “चंदन सा बदन, चंचल चितवन…”। मुकेश की आवाज़ में इस गीत की कोमलता और भाव-संपन्नता ऐसी है कि आज भी सुनने वाले उसके सम्मोहन से मुक्त नहीं हो पाते।
केवल कल्याणजी–आनंदजी ही नहीं, महान संगीतकार सलील चौधरी भी मुकेश के बड़े प्रशंसक थे। उन्हें मुकेश की आवाज़ का विशिष्ट डिक्शन, उसका गहरापन और मानवीय स्पर्श बेहद प्रिय था। सलील चौधरी राजनीतिक और सामाजिक चेतना से जुड़े गीतों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थे, खासकर बंगाल और बांग्लादेश में। किंतु सत्तर के दशक तक आते-आते भारतीय सिनेमा का परिदृश्य बदलने लगा। सामाजिक-राजनीतिक फिल्मों की जगह शहरी मध्यवर्गीय जीवन की कहानियाँ केंद्र में आने लगीं।
ऋषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी जैसे निर्देशक मध्यवर्गीय जीवन के छोटे-छोटे सुख-दुःख, प्रेम और दुविधाओं को अत्यंत संवेदनशीलता से पर्दे पर उतार रहे थे। आनंद, छोटी-सी बात और रजनीगंधा जैसी फिल्मों के लिए सलील चौधरी ने एक नया, सूक्ष्म और प्रयोगधर्मी संगीत रचा। इसी दौर में समानांतर सिनेमा भी मनुष्य के निजी और मनोवैज्ञानिक अनुभवों की ओर उन्मुख हो रहा था। ऐसी फिल्मों में मुकेश की आवाज़ एक नए अर्थ में स्थापित हुई—राज कपूर की छवि से आगे बढ़कर वह शहरी मध्यवर्गीय संवेदनाओं की आवाज़ बन गए।
इस परिवर्तन का सबसे सुंदर उदाहरण है रजनीगंधा का गीत— “कई बार यूँ ही देखा है…”। योगेश द्वारा लिखे गए इस गीत में प्रेम, असमंजस और मन की अनकही इच्छाओं का अत्यंत परिष्कृत चित्रण है। फिल्म में विद्या सिन्हा और दिनेश ठाकुर की भावनात्मक दुविधा को यह गीत शब्द, संगीत और गायन—तीनों स्तरों पर अभिव्यक्त करता है। इसी गीत के लिए मुकेश को राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
मुकेश की गायकी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष राग यमन और यमन-कल्याण पर आधारित गीतों में दिखाई देता है। “सारंगा तेरी याद में”, “चंदन सा बदन” और “कभी-कभी मेरे दिल में” जैसे गीत इसकी मिसाल हैं। “कभी-कभी मेरे दिल में” से जुड़ी एक मार्मिक घटना भी प्रचलित है। गीत की रिकॉर्डिंग से पहले मुकेश को गंभीर हृदयाघात हुआ। उनसे मिलने आए यश चोपड़ा से उन्होंने कहा था, “मैं ठीक होकर यह गीत गाऊँगा, इसे किसी और को मत दीजिए।” बाद में यही गीत हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय प्रेम-गीतों में शामिल हुआ।
मुकेश की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे केवल गीत नहीं गाते थे, वे शब्दों के भीतर छिपी भावनाओं को स्वर देते थे। तकनीकी दृष्टि से उनसे अधिक दक्ष गायक उस समय मौजूद थे, लेकिन भाव की सच्चाई, मानवीय ऊष्मा और आत्मीयता जिस तरह उनकी आवाज़ में उतरती थी, वह विरल थी। शायद इसी कारण उनकी गायकी समय के साथ पुरानी नहीं हुई; वह आज भी सीधे हृदय से संवाद करती है।
सत्तर के दशक तक आते-आते मुकेश केवल एक पार्श्वगायक नहीं रह गए थे; वे अपने आप में एक सांस्कृतिक घटना बन चुके थे। उनके लाइव कंसर्ट इतने लोकप्रिय थे कि देश के विभिन्न शहरों—नागपुर, जोधपुर, पटना और न जाने कितने नगरों—में नियमित रूप से “मुकेश नाइट” आयोजित होने लगीं। बाद के वर्षों में यह लोकप्रियता भारत की सीमाओं से बाहर भी फैल गई। इंग्लैंड, अमेरिका और दुनिया के अन्य देशों में बसे भारतीयों के बीच मुकेश के कार्यक्रमों की विशेष प्रतीक्षा रहती थी। संभवतः उस दौर में सबसे अधिक कंसर्ट करने वाले गायकों में उनका नाम सबसे ऊपर था।
मुकेश के लाइव कार्यक्रमों की एक खासियत थी। वे मंच पर गीतों को हू-ब-हू रिकॉर्डिंग की तरह दोहराने की कोशिश नहीं करते थे। उदाहरण के लिए, यदि आप लता मंगेशकर की मूल रिकॉर्डिंग और उनका लाइव गायन सुनें, तो दोनों में शायद ही कोई अंतर महसूस हो। उनकी प्रस्तुति अद्भुत रूप से परिपूर्ण होती थी। मुकेश का तरीका थोड़ा अलग था। वे गीत में छोटे-छोटे बदलाव करते, कहीं स्वर को मोड़ देते, कहीं भाव को थोड़ा और गहरा कर देते। तकनीकी दृष्टि से यह हमेशा परफेक्ट नहीं होता था, लेकिन श्रोताओं के मन को छू लेने की उनकी क्षमता अद्वितीय थी। वे सुरों से अधिक भावनाओं के गायक थे।
उस समय हिंदी फिल्म संगीत में भी परिवर्तन का दौर चल रहा था। पहले मोहम्मद रफ़ी का प्रभाव था। फिर आराधना के बाद किशोर कुमार का दौर आया और फिल्म उद्योग में उनकी मांग तेजी से बढ़ी। रफ़ी साहब को भी अपेक्षाकृत कम अवसर मिलने लगे। लेकिन इन बदलती हवाओं के बीच मुकेश का अपना एक विशिष्ट क्षेत्र था—दर्द, आत्मीयता और रूमानी संवेदनाओं से भरे गीतों का संसार। उस क्षेत्र में उनका कोई वास्तविक प्रतिस्पर्धी नहीं था।
यही कारण था कि अनेक फिल्मों में, चाहे वे बड़ी हों या छोटी, निर्माता और संगीतकार विशेष भावभूमि वाले गीतों के लिए मुकेश को ही चुनते थे। उनकी लोकप्रियता का एक दिलचस्प पक्ष यह भी है कि उनके अनेक अत्यंत सुंदर गीत व्यापक रूप से प्रसिद्ध नहीं हो पाए। यदि आज उन दुर्लभ और कम सुने गए गीतों को खोजकर सुना जाए, तो महसूस होता है कि उनमें से कई गीत उनके लोकप्रिय गीतों से किसी भी तरह कम नहीं हैं।
ऐसा ही एक गीत 1968 की फिल्म माता महाकाली का है, जिसके संगीतकार थे अविनाश व्यास। गीत के शब्द समय के अनवरत प्रवाह और जीवन की अनिश्चितताओं की ओर संकेत करते हैं—
“जो उगता है, वो ढलता है,
समय का चक्र चलता है,
अरे मानव, संभल के चल,
समय करवट बदलता है।”
यह गीत जीवन-दर्शन और लोक-बुद्धि का सुंदर संगम है, जिसे मुकेश ने अपनी सहज गंभीरता से विशेष ऊँचाई प्रदान की।
इसके बाद 1974 में आई फिल्म प्यासे दिन का उल्लेख किया जा सकता है। यह फिल्म भले ही सफल नहीं हुई, लेकिन खय्याम के संगीत और जाँ निसार अख़्तर के शब्दों से सजा एक अत्यंत सुंदर गीत इसमें था। गीत में प्रिय की उपस्थिति को चाँदनी, रोशनी और खुशबू जैसे बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया गया है। मुकेश की आवाज़ इस गीत को एक स्वप्निल कोमलता देती है—
“तुम जहाँ हो, वहाँ क्या चाँदनी हो,
चलती-फिरती कोई रोशनी हो…”
इसी तरह ‘मुट्ठी भर चावल’ नामक फिल्म का एक और दुर्लभ गीत है। फिल्म लगभग भुला दी गई, लेकिन गीत आज भी अपनी मिठास और भावनात्मक गहराई के कारण याद किए जाने योग्य है। इसमें प्रेम की अनुभूति को ऋतुओं और जीवन के अनुभवों के साथ जोड़कर व्यक्त किया गया है। मुकेश की गायकी गीत को आत्मीय और अंतरंग बना देती है।
1969 की एक कम चर्चित फिल्म ‘रोड टू सिक्किम ’ में भी मुकेश का एक अनमोल गीत मिलता है। इसके संगीतकार विजय सिंह थे, जो पेशे से इंजीनियर थे और बाद में संगीत की दुनिया में आए। वे महाराष्ट्र के सांगली राजघराने से जुड़े थे और आगे चलकर प्रसिद्ध अभिनेत्री भाग्यश्री के पिता के रूप में भी जाने गए। इस फिल्म में उन्होंने मुकेश से एक अत्यंत मधुर, पहाड़ी रंगत वाला गीत गवाया—
“तुम जहाँ हो, वहाँ क्या मौसम नहीं,
क्या नज़ारे वहाँ गाते नहीं…”
गीत में बिछोह की पीड़ा है, स्मृति की कसक है और दूर बैठे प्रियजन के लिए एक निरंतर पुकार है। मुकेश की आवाज़ इसे असाधारण संवेदनशीलता प्रदान करती है।
मुकेश की गायकी का एक बड़ा आकर्षण यह है कि उनके खज़ाने में केवल वे गीत नहीं हैं जो हर किसी की ज़ुबान पर चढ़ गए, बल्कि ऐसे असंख्य गीत भी हैं जो समय की धूल में कहीं दब गए, फिर भी अपनी सुंदरता में किसी कालजयी रचना से कम नहीं हैं।
ऐसा ही एक गीत 1973 में रिकॉर्ड हुआ था। निर्देशक रमेश खोसला ‘चंद्रग्रहण’ नामक फिल्म बना रहे थे। किसी कारणवश फिल्म पूरी नहीं हो सकी। गीत रिकॉर्ड हो चुके थे, संगीत तैयार था, लेकिन फिल्म अधूरी रह गई। समय बीतता गया और रमेश खोसला भी इस दुनिया से विदा हो गए। फिर एक अद्भुत घटना घटी। लगभग चौबीस वर्ष बाद उनके पुत्र रॉबिन खोसला ने पिता के अधूरे स्वप्न को पूरा करने का निर्णय लिया। फिल्म पूरी की गई, लेकिन उसके गीत वही रखे गए जो 1973 में रिकॉर्ड हुए थे। संगीतकार थे जयदेव, और उनमें मुकेश के दो गीत थे।
उनमें से एक गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय है। प्रेम और आराधना के बीच झूलते उसके शब्द मुकेश की आवाज़ में एक आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त कर लेते हैं—
“तुझको यूँ देखा है, यूँ चाहा है,
यूँ पूजा है,
जैसे खुदा को देखा हो…”
यह गीत सुनते हुए लगता है जैसे प्रेम धीरे-धीरे भक्ति में रूपांतरित हो रहा हो। मुकेश की आवाज़ में यह भाव अत्यंत स्वाभाविक और विश्वसनीय प्रतीत होता है।
युगल गीतों की बात करें तो मुकेश ने हिंदी सिनेमा को अनेक अमर रोमांटिक डुएट दिए। लता मंगेशकर के साथ गाया गया “सावन का महीना पवन करे शोर” हो या “एक प्यार का नगमा है”, ये गीत केवल लोकप्रिय नहीं हुए, बल्कि भारतीय जनमानस की स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गए। लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल और कल्याणजी–आनंदजी जैसे संगीतकारों ने मुकेश से कई यादगार युगल गीत गवाए।
मुकेश की गायकी की एक और बड़ी विशेषता उनका उच्चारण था। दिल्ली के चाँदनी चौक और पुरानी दिल्ली के सांस्कृतिक वातावरण में पले-बढ़े होने के कारण उनकी उर्दू पर असाधारण पकड़ थी। शब्दों को वे जिस नफ़ासत और स्पष्टता से गाते थे, वह उन्हें अन्य गायकों से अलग बनाती थी। यही कारण था कि गैर-फिल्मी ग़ज़लों और भजनों के लिए भी संगीतकार उन्हें विशेष रूप से चुनते थे।
मुकेश के भजनों की दुनिया भी उतनी ही समृद्ध है। उनके भजन आज के तेज़ वाद्यों और ऊँचे स्वर वाले भक्ति-संगीत से बिल्कुल भिन्न हैं। उनमें एक शांत साधना है, एक आंतरिक संवाद है। वे श्रोताओं को उत्तेजित नहीं करते, बल्कि भीतर की ओर ले जाते हैं। उनके प्रसिद्ध निर्गुण भजनों में कबीर की वाणी की प्रतिध्वनि सुनाई देती है—
“तूने रात गँवाई सोय के,
दिवस गँवाया खाय के,
हीरा जनम अमोल था,
कौड़ी बदले जाय…”
इन पंक्तियों को सुनते हुए लगता है जैसे कोई संत जीवन की क्षणभंगुरता का स्मरण करा रहा हो। मुकेश का स्वर यहाँ गायक का नहीं, एक साधक का स्वर बन जाता है।
ग़ज़लों के क्षेत्र में भी उनकी उपलब्धियाँ कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। यद्यपि ग़ज़ल का नाम लेते ही लोगों के मन में मेहदी हसन, बेगम अख्तर या बाद के दौर में जगजीत सिंह का स्मरण आता है, लेकिन मुकेश ने भी कुछ अत्यंत प्रभावशाली ग़ज़लें गाईं। उनकी आवाज़ में ग़ज़ल का दर्द और आत्मीयता एक अलग रंग ले लेती है। वे शब्दों को गाते नहीं, जीते हुए प्रतीत होते हैं।
उनके द्वारा गाई गई एक प्रसिद्ध ग़ज़ल में यह भाव आता है—
“जिया अपनी ख़ुदी को जो हमने मिटा दिया,
वो जो पर्दा-सा बीच में था, न रहा…”
यह प्रेम के माध्यम से अहंकार के विसर्जन की बात करती है, जहाँ दो अस्तित्वों के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।
एक अन्य ऐतिहासिक ग़ज़ल, जो 1857 के बाद की त्रासदी और विघटन की स्मृतियों से जुड़ी मानी जाती है, मुकेश की आवाज़ में एक विशेष करुणा प्राप्त करती है। उसमें इतिहास की पीड़ा और व्यक्तिगत दुःख एक-दूसरे में घुल जाते हैं।
लेकिन मुकेश की प्रतिभा केवल हिंदी तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अनेक भारतीय भाषाओं में गीत गाए। विशेष रूप से गुजराती भाषा में उनका योगदान उल्लेखनीय है। गुजराती गैर-फिल्मी गीतों की उनकी संख्या काफी बड़ी है और आज भी गुजरात में उन्हें अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है।
गुजराती साहित्य और लोकदर्शन में ‘पंखी’ और ‘पिंजरा’ अत्यंत महत्वपूर्ण रूपक हैं। आत्मा और शरीर, मुक्ति और बंधन, इच्छा और विरक्ति—इन सबको व्यक्त करने के लिए इन प्रतीकों का बार-बार प्रयोग होता है। मुकेश ने एक प्रसिद्ध गुजराती निर्गुण गीत गाया, जो आज भी गुजरात के सबसे लोकप्रिय आध्यात्मिक गीतों में गिना जाता है—
“पंखीडा ने आ पिंजरू,
झूम झूम लागे…”
यह गीत केवल एक पक्षी और पिंजरे की कथा नहीं है। यह मनुष्य की उस बेचैनी का रूपक है जो सीमाओं के भीतर रहते हुए भी असीम आकाश की ओर देखती रहती है।
पंकज राग ने इसे मुकेश की सबसे बड़ी विशेषता के रुप में पहचाना। मुकेश भाषा बदलते थे, शैली बदलते थे, विषय बदलते थे, लेकिन उनकी आवाज़ में छिपी मानवीय संवेदना कभी नहीं बदलती थी। चाहे वह प्रेम का गीत हो, विरह की पुकार, कबीर का निर्गुण भजन, उर्दू की ग़ज़ल या गुजराती लोकदर्शन—हर जगह उनकी आवाज़ सीधे मनुष्य के हृदय से संवाद करती है। यही कारण है कि समय बीत जाने के बाद भी मुकेश केवल एक गायक नहीं, बल्कि भारतीय भाव-संस्कृति की एक स्थायी स्मृति बने हुए हैं।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक पहुँचते-पहुँचते मुकेश केवल राज कपूर की आवाज़ भर नहीं रह गए थे। वे हिंदी सिनेमा के अनेक नायकों की पहचान का हिस्सा बन चुके थे। जिस तरह एक समय राज कपूर और मुकेश का नाम लगभग एक-दूसरे का पर्याय बन गया था, उसी तरह सत्तर के दशक में कई बड़े सितारों के लिए भी मुकेश की आवाज़ एक स्वाभाविक चुनाव बन गई।
मनोज कुमार की फिल्मों को ही देखिए। पहचान, बेईमान, शोर, सन्यासी, दस नंबरी और रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों में मुकेश की आवाज़ ने मनोज कुमार के चरित्रों को एक विशेष भावात्मक गहराई दी। उनकी आवाज़ में वह संवेदनशीलता थी जो मनोज कुमार के आदर्शवादी और अंतर्मुखी नायकों के व्यक्तित्व के साथ सहज रूप से मेल खाती थी।
फिरोज़ खान जैसे बिल्कुल अलग व्यक्तित्व वाले अभिनेता के लिए भी मुकेश ने यादगार गीत गाए। उपासना, सफ़र और धर्मात्मा जैसी फिल्मों में उनकी आवाज़ ने फिरोज़ खान की स्क्रीन-छवि को एक नया आयाम दिया। यह मुकेश की बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण था कि वे अलग-अलग अभिनेताओं की संवेदनात्मक ज़रूरतों के अनुरूप स्वयं को ढाल लेते थे।
यहीं नहीं, अमिताभ बच्चन के शुरुआती दौर में भी मुकेश ने अपनी आवाज़ दी। अदालत, रास्ते का पत्थर और कभी-कभी जैसी फिल्मों में उनकी गायकी अमिताभ के व्यक्तित्व से जुड़ती दिखाई देती है। कई संगीत-इतिहासकारों का मानना है कि यदि मुकेश कुछ और वर्षों तक जीवित रहते, तो संभवतः अमिताभ बच्चन के लिए भी वे उतनी ही स्थायी आवाज़ बन जाते, जितनी राज कपूर के लिए बने थे।
विडंबना यह है कि जिस समय मुकेश का जीवन अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा था, उसी समय उनका करियर अपनी सर्वोच्च ऊँचाइयों को छू रहा था। 1976 का वर्ष उनके लिए असाधारण सफलता का वर्ष था। उस समय की सबसे लोकप्रिय रेडियो गिनती बिनाका गीतमाला में वर्ष का प्रथम स्थान “कभी-कभी मेरे दिल में” को मिला था, जबकि दूसरे स्थान पर धर्म-करम का गीत था। दोनों गीत मुकेश के थे। यह केवल लोकप्रियता नहीं थी; यह उस विश्वास का प्रमाण था जो जनता ने उनकी आवाज़ में रखा था।
उनका अंतिम रिकॉर्ड किया गया गीतों में से एक सत्यम शिवम् सुंदरम् के लिए था। गीत था— “चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल…”। यह गीत शशि कपूर पर फिल्माया गया। रिकॉर्डिंग पूरी करने के कुछ ही दिनों बाद मुकेश अमेरिका के दौरे पर निकल गए, जहाँ लता मंगेशकर के साथ उनके कई कार्यक्रम निर्धारित थे।
27 अगस्त 1976। अमेरिका के डेट्रॉइट शहर में उनका कार्यक्रम होना था। कार्यक्रम शुरू होने में अभी लगभग दो घंटे का समय था कि उन्हें हृदयाघात हुआ। यह उनका पाँचवाँ हार्ट अटैक था। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन इस बार वे जीवन की ओर वापस नहीं लौट सके।
भारतीय संगीत-जगत के लिए यह समाचार किसी आघात से कम नहीं था। उस समय उनकी आयु केवल तिरेपन वर्ष थी। एक ऐसी आवाज़, जो लाखों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुकी थी, अचानक मौन हो गई।
उनकी मृत्यु के कुछ समय पहले रिकॉर्ड किए गए गीतों में एक गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय है—
“सुहानी चाँदनी रात हमें सोने नहीं देती,
तुम्हारे प्यार की बातें हमें सोने नहीं देती…”
आज जब इस गीत को सुना जाता है, तो उसमें एक अनकही विदाई की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। मानो गायक स्वयं धीरे-धीरे स्मृति में बदल रहा हो।
पंकज राग ने बताया कि मुकेश के निधन के बाद जिस प्रकार का जनशोक उमड़ा, वैसा शायद ही किसी अन्य पार्श्वगायक के लिए देखने को मिला हो। कई दिनों तक रेडियो पर उनके गीत लगातार बजते रहे। श्रोताओं के पत्र आते रहे। समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में श्रद्धांजलियाँ प्रकाशित होती रहीं। उनके प्रशंसकों के लिए यह केवल एक कलाकार की मृत्यु नहीं थी; यह उनके निजी जीवन की किसी आत्मीय उपस्थिति के खो जाने जैसा था।
उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साहित्यकारों ने भी उन पर कविताएँ लिखीं। हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने उनकी स्मृति में कविता लिखी। हिंदी के प्रख्यात आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह ने भी उन पर एक भावपूर्ण कविता लिखी, जो उस समय की साहित्यिक दुनिया में काफी चर्चित हुई।
पंकज राग ने बताया कि मुकेश के प्रशंसकों का समर्पण भी अद्भुत था। उनके निधन के बाद अनेक लोगों ने उनकी दुर्लभ रिकॉर्डिंग्स, अधूरी फिल्मों के गीत, अप्रदर्शित फिल्मों के संगीत और भूले-बिसरे गैर-फिल्मी गीतों को खोजने का अभियान-सा चला दिया। धीरे-धीरे ऐसे अनेक गीत सामने आए, जिन्हें सामान्य श्रोता कभी सुन ही नहीं पाए थे।
इन्हीं दुर्लभ धरोहरों में मैथिली भाषा के कुछ गीत भी शामिल हैं। एक फिल्म परियोजना के लिए, जिसमें लोकप्रिय लोकचरित्र गोलू झा पर काम हो रहा था, मुकेश ने मैथिली के दो गीत रिकॉर्ड किए थे। गीतकार थे कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर—यहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर नहीं, बल्कि मैथिली साहित्य के कवि। इनमें एक गीत भगवान शिव की स्तुति में था—
“हो बाबा कान्हा के हो बाबा,
तूँहें दानी सदाशिव…”
यह गीत सुनकर सहज ही अनुभव होता है कि भाषा चाहे कोई भी हो, मुकेश की आवाज़ में भक्ति का वही निर्मल भाव उपस्थित रहता है।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि उनकी लोकप्रियता समय के साथ कम नहीं हुई। नई पीढ़ियों के श्रोता, जिन्होंने मुकेश को कभी देखा तक नहीं, आज भी उनके गीत सुनते हैं और उनसे गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं। शायद इसलिए कि उनकी आवाज़ में केवल संगीत नहीं, मनुष्य का अनुभव बोलता है—प्रेम, विरह, आशा, अकेलापन, करुणा और आत्मीयता का अनुभव।
वास्तव में यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। वे शरीर से भले ही 27 अगस्त 1976 को विदा हो गए हों, लेकिन उनकी आवाज़ भारतीय जनमानस की स्मृति में आज भी जीवित है। हर बार जब कोई श्रोता “कभी-कभी मेरे दिल में”, “दोस्त दोस्त ना रहा”, “जीना यहाँ मरना यहाँ” या “सावन का महीना” सुनता है, मुकेश फिर से हमारे बीच लौट आते हैं। यही एक सच्चे कलाकार की अमरता है।
पंकज राग का यह मुकेश पर कथा-वक्तव्य समाप्त हो गया था। अर्थशिला पटना की कुर्सियाँ खाली हो रही थीं, लोग धीरे-धीरे उठ रहे थे, बाहर रात अपने पाँव पसार चुकी थी, पर भीतर कहीं एक पुराना ग्रामोफोन अब भी घूम रहा था। उसकी सुई किसी भूले हुए रिकॉर्ड पर अटकी थी और मुकेश की आवाज़ समय की खामोशी में लगातार गूँज रही थी–
“कहीं दूर जब दिन ढल जाए”।
भीतर कहीं एक पुरानी, कोमल, चाँदनी-सी ठंडक उतर आई थी…..मुकेश की आवाज़ की ठंडक, जो आधी सदी बाद भी हमारे भीतर वैसे ही गूँजती है।
अक्सर हम यह मान लेते हैं कि गायक मर जाते हैं, गीत पुराने पड़ जाते हैं और समय सब कुछ अपने पीछे छोड़ देता है। लेकिन उस शाम लगा कि कुछ आवाज़ें समय के अधीन नहीं होतीं, समय उनके अधीन होते हैं।
पंकज राग की कथाओं के बीच से गुजरते हुए बार-बार महसूस हुआ कि मुकेश केवल हिंदी सिनेमा के पार्श्वगायक नहीं थे। वे उस पीढ़ी की सामूहिक उदासी के गायक थे जिसने विभाजन देखा, विस्थापन देखा, सपने टूटते और फिर बनते देखे। वे उन प्रेमियों की आवाज़ थे जिन्होंने अपने प्रेम को कभी शब्दों में नहीं कहा। वे उन अकेले लोगों की आवाज़ थे जो भीड़ में रहते हुए भी अपने भीतर किसी अनाम रिक्ति को ढोते रहे। शायद यही कारण है कि उनकी आवाज़ सुनते हुए हर श्रोता को लगता है, यह गीत किसी और का नहीं, मेरा अपना है।
मुकेश के बारे में सोचते हुए अंततः यही समझ में आता है कि कुछ कलाकार अपने युग के नहीं होते। वे युगों के बीच पुल बन जाते हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक स्मृति से दूसरी स्मृति तक, एक हृदय से दूसरे हृदय तक।
(समाप्त)

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