Arun Singh
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पटना खोया हुआ शहर : एक शहर की तलाश

Arun Singh Book
कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जो पाठक के दिल में एक खाली जगह छोड़ देती हैं, जिसे पाठक अपने अनुभवों और यादों से भरता है। ऐसी कुछ किताबों की समीक्षा नहीं लिखी जा सकती, बस तारीफ़ की जा सकती है। इस कथन को आलोचक के तौर पर असफलता माना जा सकता है, पर यह असफलता नहीं है, बल्कि ईमानदारी है। Arun Singh का ‘पटना खोया हुआ शहर’ (2019, Vani Prakashan ) एक ऐसी ही किताब है। ‘पटना खोया हुआ शहर’ भी पाठक के दिल में खाली जगह छोड़ता है, जिसे चाहकर भी भरना संभव नहीं है, क्योंकि लोगों की कहानी खत्म होती है, लेकिन उन लोगों से बने शहर की कहानी चलती रहती है और कभी खत्म नहीं होती है।
 
पहली महत्वपूर्ण बात इस किताब की यह है कि लेखक का व्यक्तित्व किताब के विषय को कृत्रिम रूप से मैनिपुलेट नहीं करता। इसमें लेखक शरबत में घुली चीनी की तरह है -अदृश्य, मगर मीठा। सभी लेखक- लिख्खार जानते हैं कि लिखी हुई हर पंक्ति लेखक के लिए आत्ममोह का द्वार होती है। यदि लेखक गलती से इस द्वार में प्रवेश कर जाए, तो वह पंक्ति या विषय में परकाया प्रवेश की तरह भूतहा हो जाता है। मगर खोया हुआ शहर में अरुण सिंह के शब्दों में ऐसा संयम है कि पटना प्रमुख हो जाता है और लेखक गौण ही नहीं, लुप्त हो जाता है। लेखक का लुप्त हो जाना एक दुर्लभ उपलब्धि है, जो ख्यातिलब्ध लेखकों के नसीब में भी नहीं होती। लेकिन खोया हुआ शहर इसका एक क्लासिक उदाहरण है।
दूसरी बात है – इस किताब की गति। यह किताब किसी हड़बड़ी में नहीं है। यह उन किताबों में से नहीं है जो पहली पंक्ति से ही महानता चीखने लगती हैं। खोया हुआ शहर उस अनडररेटड क्लासिक फिल्म की तरह है, जो धीरे-धीरे, मध्यम गति से, दृश्य-दर-दृश्य अदृश्य गति से एक गतिशील दृश्यात्मक अनुभव का निर्माण करती है। खोया हुआ शहर 83 पड़ावों (अध्यायों) में पटना के 2600 वर्षों का, अध्याय-दर-अध्याय, ऐसा चित्र खींचती है जो किसी सटीक इतिहास की नीरसता से संभव नहीं है, और न ही किसी उपन्यास की अप्रमाणिकता से। यह किताब इतिहास की प्रमाणिकता और उपन्यास की जीवंतता, दोनों को साथ लेकर चलती है। जैसा कि लेखक कहता है, ‘कुछ चीजें शायद सिर्फ कहानियों के जरिये ही ज़िंदा रह सकती हैं, ख़ासकर वे चीजें जो हमने पूरी तरह खो दी हैं।’ 83 पड़ावों (अध्यायों) में यह कथा-दर-कथा और तथ्य-दर-तथ्य पटना को अपनी संपूर्णता में पाठक के मन में ऐसे छापती है, मानो उसने इसे पढ़ा नहीं, बल्कि देखा हो। यह सब इतना धीरे-धीरे होता है कि पता ही नहीं चलता, मगर इतना अनुभव करवाता है कि मानो आपकी उम्र 2600 साल की हो गई हो — पटना की नहीं।
 
जब पहली बार मैंने शीर्षक पढ़ा -पटना खोया हुआ शहर, तब लगा कि यह किताब बहुत बड़बोला या महत्वाकांक्षी है। इसमें एक भीष्म-दावा निहित था कि पटना में एक ऐसा शहर है जो खो गया है, और इस किताब का लेखक उसे खोज निकालेगा,  इतना बड़बोलापन, इतनी महत्वाकांक्षा! कौन नहीं जानता पटना को? 33 सालों से पटना में रहता हूँ, इसे अपनी हथेली की रेखाओं की तरह जानता हूँ। पर अध्याय-दर-अध्याय गुजरने के बाद महसूस हुआ कि मैं पटना को कितना कम जानता हूँ। लगा कि इंसान जानने के लिए नहीं, भूलने के लिए बना है। यह सभ्यता आपको वर्तमान में उतना ही बताती है, जितना उसे फायदा पहुंचाता है, और वह आपको वह नहीं बताती, जो आपके लिए फायदेमंद हो। मगर यह किताब पटना की उस व्यक्तिगत स्मृति की तरह है, जिसे सब पता है और जिसके बिना हर पटनावासी अधूरा है।
 
इस स्मृति में भगवान बुद्ध, जिनकी शिक्षाओं ने सदियों पहले इस धरती को ज्ञान की भूमि के रूप में प्रतिष्ठित किया, और गुरु नानक, जिनकी उपस्थिति ने पटना को धर्म और सहिष्णुता का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया, दोनों के विचार आज भी इस शहर की धड़कनों में बसे हुए हैं। इस स्मृति में आर्मेनियाई मित्र ख़्वाज़ा सफ़र भी हैं, और 1574 में अकबर का पटना आना भी इसका हिस्सा है।
 
इस स्मृति में इमारतें, जिनमें इतिहास की कहानियाँ बसी हुई हैं, जैसे तीन-तीन कॉफी हाउसों के बनने और मिटने की कहानी, जहाँ कभी कला, साहित्य, और राजनीति पर गरमागरम बहसें हुआ करती थीं, मगर अब नहीं हैं। ‘कृष्ण कुंज’, मरियम मंजिल की भव्यता, और ‘कैप्टन गास्टिन की मूर्खता’ के नाम से प्रसिद्ध गोलघर, जो कभी एक विशाल अनाज भंडार के रूप में बनाया गया था, मगर उसमें अनाज कभी रखा नहीं गया और अब शहर के स्मृति-चिह्न के रूप में खड़ा है। और फिर आता है रिज़वान कैसल, जो अपनी गोथिक शैली की स्थापत्य कला के कारण शहर की पुरानी और नई दुनिया के बीच एक सेतु का काम करता है। बकौल लेखक “कंक्रीट के जंगलों के बीच यह इमारत जैसे एक ओएसिस की तरह उभरती है,” जो reminding us of a time when architecture wasn’t just about utility but also about beauty and expression.
 
इस तरह, पटना की यह स्मृति न केवल एक भूगोल या स्थान है, बल्कि एक धरोहर है, जिसमें समय की अनगिनत परतें और कहानियाँ बसी हुई हैं।
 
पर इस पटना की स्मृति में सब कुछ अच्छा नहीं है, कुछ काले अध्याय भी हैं। यह शहर दास व्यापार के बाद दुनिया के सबसे गंदे व्यापार अफीम के व्यापार का केंद्र था और पटना के अफीम से अंग्रेज़ चीन की चाय ख़रीदते थे। 1760 में बंगाल के नवाब मीर जाफर के नरसंहार की घटना है, जिसमें 198 अंग्रेज़ मारे गए थे। 1670 का भयंकर अकाल है, जिसमें एक लाख लोग मारे गए थे। उस अकाल की त्रासदी में 50 पैसे में एक माँ द्वारा अपने बेटे को बेचने की कहानी है, ताकि बेटे को भोजन मिल सके। थॉमस लिखता है, ‘लोगों ने मुट्ठी भर चावल के लिए खुशी-खुशी अपने बच्चों को बेच दिया।’ एक ख़ूबसूरत बच्चे के माता-पिता ने अपने बच्चे को आठ आने में बेचने का प्रस्ताव मार्शल को ही दिया था।
 
“यह किताब एक खिड़की की तरह है, जो आपको टाइम ट्रैवल करवाती है। 600 ईसा पूर्व से आज तक, लगभग 2600 सालों के पटना का सफर केवल 240 पन्नों में समेटा गया है , यह पेड़ों से बने पन्नों का अब तक का सर्वोत्तम सदुपयोग है। पहली दृष्टि में यह आपको एक साधारण किताब लगेगी, जो किताब बनने के लिए लिखी भी नहीं गई थी। इसे साढ़े चार वर्षों की लंबी अवधि में प्रभात खबर के ‘हिस्ट्री एंड हेरिटेज’ साप्ताहिक कॉलम के रुप में लिखा गया था। बकौल लेखक “इस बार यह सिलसिला शुरू हुआ तो करीब साढ़े चार वर्षों तक चला। शोध के क्रम में जैसे-जैसे मैं इतिहास के पन्ने पलटता, एक नया पटना सामने दिखता। पटना के लिए मेरा प्यार बढ़ता चला गया। मुझे लगा कि अब तक मैं पटना को कितना कम जानता था! वी. एस. नायपॉल भी कहते हैं, ‘With knowledge, appreciation grows.'” लिखने और किताब बनने की इस प्रक्रिया में ही इस किताब की खूबसूरती छिपी है। मिर्ज़ा ग़ालिब ने सही ही कहा है, “आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,” उसी तरह एक किताब के विचार को एक किताब बनने में भी ‘इक उम्र’ चाहिए होती है असर होने के लिए। इस किताब को भी लेखक ने ‘इक उम्र’ दी है।”
 
इस प्रक्रिया ने शायद पटना और लेखक को एक कर दिया है, क्योंकि लेखक की दो किताबें पटना पर आ चुकी हैं और कम से कम दो किताबें और तैयार हो रही हैं। पटना पर यह एक तरह की ट्रायलाजी की तरह है। यह कथ्य के साथ एक ईमानदारी का संकेत है, जो पटना पर उनके लेखन को एक किताब से आगे तक ले जा रहा है। इससे एक बात तय है कि इस किताब को बहुत प्यार से लिखा गया है, साथ ही काफी मेहनत से भी। इस किताब में इतने स्रोत हैं, इतने अलग-अलग लोगों के हैं और इतने अलग-अलग काल के हैं कि उन्हें एक साथ करना एक लंबी अवधि में निरंतर किए गए श्रम के बिना संभव नहीं है। और ऐसा श्रम बिना प्यार के संभव नहीं है।
 
यह किताब ओपन वर्ल्ड गेम की तरह है, जो आपको एक पूर्व-निर्धारित नैरेटिव (कथा-सूत्र) नहीं देती, बल्कि आपको 83 संभावित नैरेटिव लाइनें देती है। आप अपनी पसंद की नैरेटिव लाइन को पकड़ लें और उसे पकड़कर अपना पटना तलाश लें, जैसे कोई भैंस की पूछ पकड़कर वैतरणी को पार करेगा। यह नकारात्मक मुहावरा है, मगर यही सच है। एक शहर की स्मृति में लाखों लोगों की स्मृति शामिल है, सैकड़ों सालों का। उसे पार करना एक व्यक्ति के लिए असंभव कार्य है। मगर उस असंभव के पास सबसे संभावित तरीका है – पटना खोया हुआ शहर।
 
पटना खोया हुआ शहर वह किताब है, जिसे पढ़कर हर पटनावासी को इससे प्यार हो जाएगा, और जो पटनावासी नहीं हैं, उन्हें भी पटना से प्यार हो जाएगा। जैसे ही आप इसके पन्ने पलटते हैं, आपको ऐसा अनुभव होता है मानो आप पटना की स्मृतियों में चल रहे हैं, उसकी महक को महसूस कर रहे हैं और उसकी कहानियों को सुन रहे हैं। यह किताब न केवल पटना के निवासियों के लिए, बल्कि हर किसी के लिए है, जो अपने शहर की वास्तविक स्मृति को तलाशना चाहते हैं क्योंकि जब हम एक शहर की कहानियों को भूलते हैं, तो हम उसकी आत्मा को भी खो देते हैं, और अपनी भी। ऐसी किताबें शहर की आत्मा को बचाती हैं।
 
————-समाप्त—————
संदर्भ-
1. Mark Haddon. The Curious Incident of the Dog in the Night-Time. London: Jonathan Cape, 2003.
2. Benjamin Walter . The Arcades Project. The Belknap Press of Harvard University Press,2002.
3. Colson Whitehead. The Colossus of New York. Doubleday, 2003

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