असलम हसन की पोटली में चाँद “अपूर्ण इच्छाओं का सौंदर्यशास्त्र” : संग्रह समीक्षा
“संग्रह का शीर्षक ही एक गहरी आलोचनात्मक व्याख्या माँगता है।“पोटली में चाँद” एक ऐसा बिंब है जिसमें: चाँद का मतलब स्वप्न, सौन्दर्य, आकांक्षा है और पोटली का मतलब गरीबी, सीमित संसाधन, श्रमशील जीवन है। यह बिंब अपने भीतर एक विरोधाभास रखता है, जिसमें असीम (चाँद) को सीमित (पोटली) में बाँधने की कोशिश हा। यही इस संग्रह का मूल तनाव है। कुल मिलाकर असलम हसन का कविता-संसार मूलतः “अपूर्ण इच्छाओं का सौंदर्यशास्त्र” है।”
(लोकार्पण के बाद परिचर्चा में दिया गया वक्तव्य)
आज से लगभग 21 साल पहले मैं अपनी पहली साहित्यिक गोष्ठी में गया था। वहाँ तीन कवियों का काव्य-पाठ था-पहले कवि रियाजुल हक, दूसरे कवि प्रतिभा वर्मा और तीसरे कवि असलम हसन, जो आज लोकार्पित कविता-संग्रह पोटली में चाँद के कवि हैं।
इससे पहले आई पुस्तिका को नजरअंदाज किया जाए, तो असलम हसन को पहला संग्रह लाने में 21 साल का समय लगा। कारण यह है कि असलम हसन एक बहुत विनम्र व्यक्ति हैं। यह बात मैं केवल उनकी प्रशंसा में नहीं कह रहा, बल्कि यह उनके इस संग्रह को समझने की कुंजी है। कैसे- इस पर मैं अंत में आऊँगा।
ऐसा कहा जाता है कि पुस्तक का लोकार्पण बच्चे की छठी की तरह होता है, एक ऐसा अवसर, जहाँ हम केवल उसके सौंदर्य, उसकी संभावनाओं और उसकी विशेषताओं को ही स्नेहपूर्वक देखते हैं; उसकी कमियों पर बात नहीं करतें।
किन्तु आज असलम हसन की कविताओं पर बात करते हुए मैं उन्हीं पक्षों को स्पर्श करना चाहूँगा, जिन्हें कुछ आलोचक शायद कविता की कमी के रूप में देखते हों, परंतु मेरी दृष्टि में वे ही उनकी कविता की विशिष्टता, उसकी आंतरिक प्रकृति और उसके सौंदर्य के सूक्ष्म बिंदु हैं।
कुछ आलोचक इस पुस्तक की एक कमी यह बतायगें हैं कि यह न तो शुद्ध हिंदी कविता-संग्रह है, न शुद्ध ग़ज़लों का संग्रह। यह सच है कि इस संग्रह में हिंदी कविताओं के साथ कई हिंदी ग़ज़लें भी हैं। इसे एक स्थापित दोष की तरह देखा जाता है, हिंदी कविता के मठ -शठ आलोचक इसे हिंदी की किताब न मानेंगे, और उर्दू वाले इसे हिंदी की किताब कहेंगे।
इसके बड़े भुक्तभोगी उर्दू के शायर संजय कुमार कुंदन, जो मंच पर साथ में बैठे हैं, स्वयं रहे हैं। उन्होंने शानदार ग़ज़लें और नज़्में लिखी हैं। एक बातचीत में मदन कश्यप कह रहे थे कि संजय कुमार कुंदन में एक बड़े शायर की सारी विशेषताएँ हैं। मगर उर्दू वाले उन्हें उर्दू का शायर मानते ही नहीं क्योंकि उनकी लिपि हिंदी है। कुछ ऐसा ही आरोप असलम हसन पर भी लगेगा। इस जोखिम जानकर भी ऐसा करना बड़े साहस का काम है।
इस तरह का भेदभाव करने वाले कठोर मंद बुद्धि आलोचक यह भूल जाते हैं कि हिंदी के प्रारंभिक कवियों में अमीर ख़ुसरो भी थे, जिन्होंने अपनी कविता की एक पंक्ति फ़ारसी में और दूसरी पंक्ति खड़ी बोली हिंदी में लिखी -“
ज़े हाले मिसकीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ।
शबाने-हिजराँ दराज़ चूं ज़ुल्फ़ो— रोज़े वसलत चूं उम्र कोताह।
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ॥
( अमीर खुसरो)
देख रहे साहब,आज के दौर में वह संभव नहीं दिखता, जो जायसी, नज़ीर अकबराबादी, तुलसी और कबीर ने सदियों पहले कर दिखाया था। क्यों? इतिहास और विचार हमेशा आगे नहीं बढ़ते; वे कभी पीछे जाकर पतनशील भी हो जाते हैं।
Francesca Orsini उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास और उसके बहुभाषिक स्वरूप पर महत्वपूर्ण काम किया है। उनकी चर्चित पुस्तक है: The Hindi Public Sphere 1920–1940।
उन्होंने यहाँ तक कहा है कि अभी तक हिंदी का इतिहास अधूरा है; पूरा हिंदी साहित्य का इतिहास उर्दू, मैथिली आदि अन्य भाषाओं को मिलाकर ही लिखा जा सकता है।
मुझे समझ में नहीं आता कि रामचंद्र शुक्ल जैसे महान आलोचक से यह सामाजिक यथार्थ कैसे छूट गया कि बिना ग़ालिब और मीर को पढ़े हिंदी का कोई कवि पूर्ण नहीं हो सकता। शमशेर ने भी ‘महाकवि होने’ के प्रसंग में इस बात को रेखांकित किया है। रामचंद्र शुक्ल और उनकी परंपरा के कई आलोचकों ने यह भूल बार-बार की है।
मगर संजय कुमार कुंदन और असलम हसन इस परंपरागत विभाजन को अपने लेखन से चुनौती देते हैं। मुझे खुशी है कि ये दोनों पटना के कवि हैं।
लोकार्पण में बाएँ से शहंशाह आलम, अनिल विभाकर, सुशील कुमार, आलोक धन्वा, अरुण कमल, असलम हसन, विनय कुमार और अन्य।
भाषा महान कविता की भाषा
कुछ महा आळोचक यह आरोप कि असलम जी इस संग्रह की कविताओं की भाषा महान कविता की भाषा नहीं हैं। वे कहेगें कि असलम हसन की भाषा सीधी है, बोल चाल की है और लोक-संवेदना से जुड़ी है, शिष्ठता और शास्त्रीयता नहीं है। वे कहेगें कि यह भाषा कई जगह काव्यात्मक जटिलता से बचती है। ये कविताएँ विचार नहीं, भावनात्मक घोषणाएँ बन जाती हैं। वे कहेगें कि महान कविता में भाषा सिर्फ माध्यम नहीं होती और वह स्वयं अर्थ-निर्माण करती है। वे उदाहरण देगें कि मुक्तिबोध या अज्ञेय में भाषा: अस्पष्ट भी होती है और पर बहुस्तरीय भी। असलम हसन की भाषा पारदर्शी है। पाठक तुरंत समझ जाता है ..कोई जटिल प्रतीक नहीं ।
कल्पना की महीन कोशिकाओं में
महसूस करता हूँ टीस
खोखले बयानबाज़ी से रचता हूँ संसार
(मेरी कविताएँ, असलम हसन)
असलम सरल भाषा के कवि हैं और सबसे कठिन होती है—कविता में सरलता।
यह वाक्य सुनने में जितना सहज लगता है, उसकी साधना उतनी ही दुर्लभ है।
मंच पर अरुण कमल बैठे हैं। अरुण जी ने सरल शब्दों और भाषा में कहकर उन्होंने इतनी महीन बुनावट की कविता लिखी है कि आश्चर्य होता है। अरुण कमल की कविता भी वैसी ही है, वह अपने अर्थ का दावा नहीं करती, वह धीरे-धीरे खुलती है, जैसे कोई दरवाज़ा जो पहले से ही आधा खुला था, बस हमने ध्यान नहीं दिया।
भौजी, डोल हाथ में टाँगे
मत जाओ नल पर पानी भरने
तुम्हारा डोलता है पेट
झूलता है अन्दर बँधा हुआ बच्चा
ऊपर-नीचे दोलेगा पेट
और थक जाएगा बउआ
(अरुण कमल, धरती और भार, अपनी केवल धार)
कविता की असली ताकत उसकी सरलता में होती है, मगर यह दुर्लभ है। यहाँ सरलता, दरअसल, भाषा का त्याग नहीं, बल्कि भाषा का परिष्कार है। Roland Barthes ने “writing degree zero” की बात करते हुए कहा था कि सच्ची लेखन-शैली वह है, जहाँ भाषा अपने भार से मुक्त हो जाती है।
रिल्के ने कहीं संकेत किया था कि गहराई अक्सर चुपचाप आती है, बिना शोर के। असलम हसन की कविता की सरलता इसी परंपरा में खडी है।
भावनात्मक आर्काइव
असलम हसन का संग्रह “पोटली में चाँद” पहली नज़र में एक सहज, सीधे-सरल, जनपदीय संवेदना का संग्रह प्रतीत होता है। लेकिन एक गहरी आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह संग्रह दरअसल भारतीय निम्नवर्गीय जीवन-विश्व का “भावनात्मक आर्काइव” है—एक ऐसा आर्काइव जो इतिहास नहीं लिखता, बल्कि इतिहास के नीचे दबे हुए अनुभवों को आवाज़ देता है।
अगर आपको असलम हसन की कविताओं के महत्व है, तो पहले यह समझना होगा कि मनुष्य कविता क्यों लिखता है? मनुष्य कविता तब लिखता है जब उसके भीतर अनुभव का अधिशेष (surplus) जमा हो जाता है, ऐसा अधिशेष जिसे सामान्य भाषा, तर्क या संवाद वहन नहीं कर पाते। यह अधिशेष तीन स्तरों पर बनता है, पहला मनोवैज्ञानिक अधिशेष जिसमें दबी, अस्पष्ट, या अति-तीव्र भावनाएँहोती हैं, दूसरा सामाजिक अधिशेष होता है, जिसमें असमानता, विस्थापन, या सामूहिक तनाव होती है और तीसरा भाषिक अधिशेष है जिसमें भाषा की सीमाएँ, जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं।
फ्रायड ने कला को दबी इच्छाओं का रूपान्तरण (sublimation) कहा। पर यह अधूरा है। कविता केवल दमन का विसर्जन नहीं, बल्कि अकथ्य (the unsayable) का प्रबंधन है।
अंतिम आरोप
अंतिम आरोप यह लगेगा कि कविता यथार्थ से भागती है। कवि यहाँ अनुभव को पकड़ता है, पर उसे राजनीतिक संरचना तक नहीं ले जाता। यह कविता संवेदना पैदा करती है, पर संरचना का विश्लेषण नहीं करती।
कविता “मैं मज़दूर हूँ” को पढ़ना ज़रूरी है।
“मेरी मुट्ठी में क्रांति है…
और आँखों में पानी…
मेरा पेट… मेरा पेट…”
यहाँ एक महत्वपूर्ण द्वंद्व है: क्रांति का दावा , भूख की स्वीकारोक्ति यह द्वंद्व बताता है कि कवि का मज़दूर: न पूरी तरह क्रांतिकारी है , न पूरी तरह पीड़ित बल्कि वह एक “विलंबित क्रांति” की अवस्था में है।
लेकिन गहराई से देखें… कविता यथार्थ को सरल नहीं करती, बल्कि उसे असहनीय रूप में प्रस्तुत करती है। सीधी भाषा यथार्थ को “समझने योग्य” बनाती है, कविता उसे “महसूस करने योग्य” बनाती है और महसूस करना, समझने से अधिक खतरनाक है। असलम हसन की कविता महसूस करवाती है, इसलिए खतरनाक प्रभाव वाली कविता है।
मनुष्य के रुप में बचा रहना…आज के दौड़ में कठीन है। इसलिए कविता न तो विलास है, न ही शौक, यह मनुष्य की अस्तित्वगत तकनीक (technology) है। कविता तब जन्म लेती है, जब मनुष्य के पास कहने को बहुत कुछ होता है… और कहने की कोई सीधी भाषा नहीं बचती।
अंत में…
अब मैं उस बात पर लौटकर आता हूँ, जिससे मैंने अपनी बात आरंभ की थी। बात यह है कि असलम हसन बहुत ही विनम्र व्यक्ति हैं। वे हमेशा अपने स्व को संशय में रखते हैं। यही गुण उनकी कविता में ‘मैं’ को कम करता है और सामाजिकता को कविता का दृश्य बनाता है। आज जब महामानवों और महान विचारों के बावजूद सभ्यता उल्टी दिशा में जा रही है… हम तीसरे विश्वयुद्ध की गोद में बैठे हैं… मुझे सबसे ज्यादा चीढ़ महान विचारों और महान नेताओं से होती है…
“रिक्शावाला”: गति और पिछड़ना — आधुनिकता का विडम्बनात्मक रूपक
“आगे… फिर भी पीछे बैठे आदमी से
बहुत पीछे छूट जाता है रिक्शावाला”
( असलम हसन)
यह पंक्ति पूरे संग्रह की सबसे सटीक समाजशास्त्रीय पंक्तियों में से एक है। यहाँ गति है , पर प्रगति नहीं । यह आधुनिकता का विरोधाभास है, जहाँ श्रम आगे बढ़ता है, पर श्रमिक पीछे छूट जाता है।
महावीर का स्यादवाद याद आता है… स्यादवाद यह मानता है कि वस्तु या सत्य के अनेक पक्ष होते हैं। मनुष्य अपनी सीमित दृष्टि के कारण केवल एक ही पक्ष देख पाता है, इसलिए उसका कथन आंशिक होता है। इसीलिए जैन दर्शन कहता है कि सत्य बहुविध है और हर कथन सापेक्ष है। स्याद् अस्ति अर्थात एक दृष्टि से यह है और स्याद् नास्ति अर्किथात सी दृष्टि से यह नहीं है।
इसलिए आज का समय जिसे हम तथाकथित ‘महान मनुष्यों’ और ‘महान विचारों’ का समय कहते हैं, दरअसल एक विचित्र विडंबना का समय है। सभ्यता जैसे अपने ही बनाए रास्तों से उल्टी दिशा में चल पड़ी है। यहाँ एडोर्नो की यह उक्ति अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है—“Wrong life cannot be lived rightly.” (गलत जीवन को सही ढंग से जिया नहीं जा सकता।)
ऐसे समय में सही समाज बनाने के सारे रास्ते खुद चुके हैं, जहाँ कोई मार्ग शेष नहीं दिखाई देता। कोई रास्ता नहीं बचा है; उसमें यथार्थ को ज्यों का त्यों कहना ही सबसे बड़ा रास्ता है।
इस विडंबनापूर्ण समय में असलम हसन का कवि-स्वर किसी समाधान का दावा नहीं करता। वह कोई वैकल्पिक यूटोपिया नहीं रचता। इसी बिंदु पर उनकी कविता का सबसे बड़ा नैतिक आग्रह सामने आता है, यथार्थ को ज्यों का त्यों कहना।
यहाँ “ज्यों का त्यों कहना” कोई साधारण यथार्थवाद नहीं है।
अंत में संग्रह का शीर्षक ही एक गहरी आलोचनात्मक व्याख्या माँगता है।“पोटली में चाँद” एक ऐसा बिंब है जिसमें: चाँद का मतलब स्वप्न, सौन्दर्य, आकांक्षा है और पोटली का मतलब गरीबी, सीमित संसाधन, श्रमशील जीवन है। यह बिंब अपने भीतर एक विरोधाभास रखता है, जिसमें असीम (चाँद) को सीमित (पोटली) में बाँधने की कोशिश हा। यही इस संग्रह का मूल तनाव है। कुल मिलाकर असलम हसन का कविता-संसार मूलतः “अपूर्ण इच्छाओं का सौंदर्यशास्त्र” है।
