vinay Kumar
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विनय कुमार की मानसून सीरीज़ : अमूर्तता

विनय कुमार
वसिली कैंडिंस्की एक दिन अपने स्टूडियो में एक पेंटिंग देखी जिसे वह पहचान नहीं पाए, और उन्हें वह बहुत सुंदर लगा। बाद में उन्हें एहसास हुआ कि जिस पेंटिंग को वे पहचान नहीं पा रहे थे, वह पेंटिंग वास्तव में उनका ही बनाया हुआ था, लेकिन वह उल्टा रखा हुआ था। ( संदर्भ -1)
 
एक उल्टी पेंटिंग ने वसिली कैंडिंस्की के कला के बारे में उनके विचार को बदल दिया। उस उल्टे चित्र ने उन्हें यह समझने में मदद की कि कला के लिए बाहरी वस्त्र और वस्तुएँ आवश्यक नहीं हैं। इस घटना के बाद कैंडिंस्की ने अमूर्त कला की ओर अपने रुझान को केंद्रीत कर दिया। रंग और रूप की शक्ति उस समय और भी प्रभावशाली होती है जब उन्हें किसी भौतिक आकृति के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधा अनुभव किया जाता है। कुछ इसी प्रकार का सीधा अनुभव विनय कुमार की मानसून सीरीज की एक पेंटिंग में होता है।
 
“हम छवि को नहीं देखते, हम अपनी छवि के अनुसार देखते हैं”। ( संदर्भ-2) Vinay Kumar की मानसून सीरीज की इस पेंटिंग को भी अपने – अपने तरीके से देखा जा सकता है। कभी लगता है कि यह अपने गहन, स्वप्निल परतों के माध्यम से रूप और रंग की सीमाओं पर खड़ी है । कभी इसमें आकृतियाँ चलते हुए प्रतीत होती हैं, लेकिन हमेशा स्थिर भी लगती हैं और वह भी तब उस आकृति के पास पंख जैसा कुछ है। ऐसा इसलिए है कि गियाकोमेटी की आकृतिओं की तरह ही विनय कुमार की आकृति भी अधूरेपन का दृश्यरुप है, मानो किसी अंतरावलोकन या रूपांतरण के अनसुलझे क्षण में फंसी हुई हो और मानो कहती हो कि मनुष्य हमेशा अधूरेपन की स्थिति में जीता है। आकृति की विस्थापन के अलावा पेंटिंग संक्रमणकालीनता दिखता है, जो दुनियाओं के बीच के स्थान शारीरिक या भावनात्मक या आध्यात्मिक में एक साथ विचरण कर रही है।
 
हरे रंग का उपयोग और इसकी धुंधली, अस्पष्ट आकृतियाँ एक स्वप्निल स्थिति या एक बीच का स्थान सुझाती हैं जहाँ समय और स्थान का सामान्य अर्थ खो जाता है। यह परिदृश्य पारंपरिक रुप से स्पष्ट नहीं है, और न ही यह पूरी तरह से अमूर्त है—यह इसके बजाय, उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों के बीच का स्थान है। मानो “आत्मा की उस अवस्था के रूप में वर्णित करता हैं जिसमें सभी गति कुछ हद तक भय के साथ स्थिर हो जाती है”।
कुमार की पेंटिंग उक्त प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करती है, मगर न तो भव्यता के माध्यम से और न ही मुखरता के माध्यम से, बल्कि सूक्ष्म विस्थापन के माध्यम से। मानव आकृति, प्रकृति, और रहस्यमय पशु एक साथ ऐसे वातावरण में मौजूद हैं जो दर्शक की समय और स्थान की भावना को निलंबित कर देता है, जिससे आश्चर्य और शांत असुविधा दोनों की भावना उत्पन्न होती है।
 
इसके अलावा, पेंटिंग के ऊपरी आधे हिस्से में दिखाई देने वाली बैल या गैंडे जैसी आकृति को अवचेतन प्रेरणाओं या आदिम प्रवृत्तियों के प्रतीकात्मक रूप में देखा जा सकता है। यहाँ, यह पशु तार्किक विचारों के बाहर के स्व से जुड़ी एक अनियंत्रित और प्रवृत्तिपरक पहलू का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
 
कैनवास पर बने रूप और रंग चित्रकार की आंतरिक दुनिया का प्रतिबिंब होते हैं। विनय कुमार की यह पेंटिंग अपने अमूर्त लेकिन संरचित आयोजन के माध्यम से एक व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक दुनिया को प्रतिबिंबित करती है। विनय कुमार की पेंटिंग का रंग, रूप और बनावट एक एक आत्म- अन्वेषण की तरह है। हल्के रंगों के उपयोग को तीव्र रेखाओं और आकृतियों के साथ संयोजित किया गया है, जो एक चिंतनशील मूड को प्रकट करता है। नकारात्मक स्थान (नेगेटिव स्पेस) का उपयोग मौन या शून्यता के रूप में देखा जा सकता है, जो रोथको के अमूर्त अभिव्यक्तिवाद (abstract expressionism) की याद दिलाता है, जहाँ रंग क्षेत्र भावनाओं को उभारने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
 
विनय कुमार की इस पेंटिंग की अमूर्तता किसी एक निश्चित व्याख्या का विरोध करती है और इसके बजाय कई संभावित अर्थों की पेशकश करती है। जैसा कि मॉरिस मर्लो-पोंटी कहते हैं कि अनुभव केवल इंद्रिय डेटा की निष्क्रिय स्वीकृति नहीं है, बल्कि यह अर्थ का सक्रिय निर्माण है। ( संर्दभ-3) यह दर्शक से एक सक्रिय जुड़ाव की मांग करती है, जहाँ दर्शक का अनुभव भी चित्र का हिस्सा बन जाता है। यह पेंटिंग दर्शक के अवचेतन, इच्छाओं और भय के लिए एक दरवाजे की तरह कार्य करती है। आकृतियों की अस्पष्टता मानव, जानवर और परिदृश्य दर्शक को अपने विचार चित्र पर आरोपित करने की अनुमति देती है, जिससे यह पेंटिंग कलाकार की मंशा और दर्शक की धारणा के बीच एक गतिशील संवाद बन जाती है।
अंतत विनय कुमार की यह पेंटिंग मानवीय और गैर-मानवीय दोनों अस्तित्व की अस्पष्ट सीमाओं पर है, जो हमें उस दुनिया से अलग करती हैं जिसमें हम रहते हैं। यह एक ऐसी पेंटिंग है, जो व्याख्या के लिए खुला है एवं प्रत्येक नए दर्शक के साथ बदलता और विकसित होता है, जैसे कि यह वही परिवर्तनशील स्वप्न-संसार है, जिसे वो व्यक्त करना चाह रही हो।
 
——– समाप्त ——-
Canvas Patna के “मॉनसून मेघदूत” के आयोजन (27 से 30 सितंबर) से अंतिम पेंटिंग।
 
संदर्भ:
1. Concerning the Spiritual in Art.” 1911.
2. Merleau-Ponty, M. (1945). Phenomenology of Perception. Routledge & Kegan Paul.
3. Merleau-Ponty, M. (1945). Phenomenology of Perception. Routledge & Kegan Paul
4. Burke, E. (1757). A Philosophical Enquiry into the Sublime and Beautiful. R. and J. Dodsley.

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