प्रयाग शुक्ल : अमूर्त कला का संतुलन
कला में अमूर्तता “इंद्रधनुष साँप” (Rainbow Serpent) की तरह होता है। ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी (Aboriginal) मिथकों में इस “इंद्रधनुष साँप” (Rainbow Serpent) की कथा है। आदिवासी लोगों का मानना है कि इंद्रधनुष साँप ही धरती के पहाड़, नदियाँ, झीलें और घाटियाँ बनाने के लिए जिम्मेदार था। जब साँप धरती पर सरकता था, तो वह अपने शरीर से भूमि का आकार बदल देता था।
एक तरफ इंद्रधनुष साँप को एक दयालु रक्षक के रूप में देखा जाता है, जो पृथ्वी और उसके सभी जीवों की रक्षा करता है। दूसरी तरफ इसे विनाशकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और कहा जाता है कि जब वह क्रोधित होता है, तो भयंकर बाढ़, तूफान और अन्य आपदाओं का कारण बनता है। साँप का अस्तित्व इंद्रधनुष से जुड़ा है, और इसे प्रकृति के संतुलन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है—यह जीवन और विनाश दोनों ला सकता है। अमूर्त कला में भी निर्माण और विनाश की ऐसी ही ताकत होती है।
अमूर्त कला में भी यह संतुलन प्रमुख और आवश्यक होता है, जो कला को संरक्षित रखता है और संतुलन न होने पर कला को विघटित भी करता है। इसलिए अमूर्तता कला में विभिन्न अर्थों में खुलती है या नष्ट हो जाती है। Prayag Shukla की इस पेंटिंग में अमूर्तता के संदर्भ में समझा जा सकता है।
अमूर्तता और रंग – गहराई और परतदारता ( मल्टी लेयर)
प्रयाग शुक्ल की यह पेंटिंग अमूर्तता को दर्शाती है, जो किसी खास रूप या आकृति की अनुपस्थिति के बावजूद एक दृश्यात्मकता प्रदान करता है। पेंटिंग में प्रयोग किए गए रंग जैसे गहरा बैंगनी, पीला, लाल और नीला दर्शाते हैं कि कलाकार ने गहरे और जटिल भावनात्मक विषयों पर ध्यान केंद्रित किया है।
गहरे नीले और बैंगनी रंग का उपयोग दर्शकों को एक आंतरिक यात्रा पर ले जाता है, जहाँ प्रत्येक रंग का अपना प्रतीकात्मक महत्त्व होता है। नीला और बैंगनी रंग अक्सर आध्यात्मिकता और गूढ़ता के प्रतीक होते हैं, और इस पेंटिंग में भी ये रंग एक रहस्यमयी वातावरण का निर्माण करते हैं। पेंटिंग में प्रमुखता से दिखाए गए बैंगनी और नीले रंग भारतीय परंपरा में महत्वपूर्ण रहे हैं। नीला रंग भारत में भगवान कृष्ण और शिव से जुड़ा है, जोकि दिव्यता, शांति और अनंतता का प्रतीक है, जबकि बैंगनी रंग आध्यात्मिकता और रहस्यवाद का प्रतीक माना जाता है।
और रंगों के विभिन्न स्तरों का उपयोग इसकी गहराई को बढ़ाता है। यह परतदारता दर्शाती है कि कलाकार ने प्रत्येक रंग और आकृति को सोच-समझकर जगह दी है। इन परतों के माध्यम से कलाकार ने एक जटिल दृश्यात्मक अनुभव निर्मित किया है, जो देखने में सरल नहीं है, मगर समय के साथ खुलता जाता है। यह परतें दर्शाती हैं कि कोई भी पेंटिंग केवल सतही अनुभव नहीं होता है, बल्कि गहराई में उतरने की मांग करती है।
रंगों के प्रयोग में प्रयाग शुक्ल ने संतुलन और विरोधाभास का मिश्रण किया है। पृष्ठभूमि में गहरे नीले, बैंगनी, और भूरे रंगों का उपयोग किया गया है। ये गहरे रंग पेंटिंग के आधार को स्थिर और ठोस बनाते हैं, जिससे ऊपरी परतों में हल्के रंग अधिक स्पष्ट रूप से उभरकर आते हैं। गहरे रंग के ये क्षेत्र गहरी और रहस्यमय प्रकृति का संकेत देते हैं, जहाँ वास्तविकता और कल्पना का मिलन होता है।
ऐसे रंगों का प्रयोग किया गया है, जो पेंटिंग को एक जीवंत और गतिशील आयाम प्रदान करते हैं। ये हल्के रंग गहरे रंगों के विपरीत अधिक स्पष्ट और उभरते हुए दिखाई देते हैं। सफेद फूल जैसी आकृतियाँ पेंटिंग में एक ताजगी और जीवन का प्रतीक हैं, जबकि लाल और पीले रंग की आकृतियाँ ऊर्जा और आवेग का संकेत देती हैं। इन आकृतियों को एक सीमित और नियंत्रित ढंग से रखा गया है, जिससे दर्शक का ध्यान तुरंत उन पर जाता है, मानो वे अंधेरे में चमकते हुए प्रकाश के स्रोत हों।
मल्टी फोकल पॉइंट
पेंटिंग की संरचना ऐसी है कि यह दर्शकों को पहली नज़र में एक विशेष दिशा में देखने के लिए बाध्य नहीं करती। आकृतियाँ अमूर्त और मुक्त रूप से बिखरी हुई हैं। चित्र के केंद्र में कोई स्पष्ट एक फोकल पॉइंट नहीं है, बल्कि यह चित्र रंगों और रूपों का एक सामूहिक प्रवाह है। पेंटिंग में कोई विशिष्ट वस्तुनिष्ठ आकृति नहीं है और यही इसका प्रमुख आकर्षण है।
पेंटिंग में कुछ आकृतियाँ अस्पष्ट और धुंधली हैं, जबकि कुछ स्पष्ट रूप से उभरी हुई हैं। अस्पष्ट आकृतियाँ, जैसे धुंधले बादल या भूरे-काले धब्बे, गहराई की भावना को बढ़ाते हैं और दृश्य में एक अनिश्चितता का संकेत देते हैं। दूसरी ओर कुछ आकृतियाँ जैसे फूल, पत्तियाँ और टहनियाँ स्पष्ट रूप से पहचानी जा सकती हैं। इस स्पष्टता और अस्पष्टता का खेल पेंटिंग को और अधिक बहुआयामी बनाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कलाकार ने परतों का निर्माण किया है ताकि पेंटिंग दर्शकों को समय के साथ अलग-अलग रूपों में अनुभव हो सके।
पेंटिंग में आकृतियों का स्थान भी गहराई का संकेत देता है। उदाहरण के लिए, बैकग्राउंड में दिखने वाली पेड़ों की आकृतियाँ या पहाड़ी संरचनाएँ दूर की अनुभूति कराती हैं, जो गहराई का आभास देती हैं। ये आकृतियाँ पेंटिंग के आगे के हिस्से में बने फूलों और पत्तियों की तुलना में छोटे और कम स्पष्ट हैं। इस प्रकार का प्रतीकात्मक स्थान संयोजन दर्शकों को एक यात्रा पर ले जाता है—पेंटिंग की अगले भाग से लेकर पीछले भाग तक।
छाया के माध्यम से गहराई को और अधिक प्रभावी बनाया है। गहरे रंगों के साथ हल्के रंगों का संयोजन छाया और प्रकाश का खेल प्रस्तुत करता है। उदाहरण के लिए, सफेद और पीले रंग की हल्की आकृतियाँ अंधेरे बैकग्राउंड के विपरीत उभरती हैं, जिससे प्रकाश की उपस्थिति का संकेत मिलता है। यह प्रकाश और छाया का खेल पेंटिंग में रहस्य और खुलासे के बीच के अंतर को दर्शाता है, मानो हर परत के नीचे एक और परत छिपी हो, जो पेंटिंग को निरंतर खोजने योग्य बनाती है।
पेंटिंग में आकृतियों के ऊपर आकृतियाँ हैं, जो एक साथ देखने पर मानो एक दूसरे से स्वतंत्र होते हुए भी जुड़ी हुई हैं। जैसे-जैसे एक आकृति ऊपर से उभरती है, वह अपने नीचे की आकृति को ढँकती नहीं है, बल्कि उसके साथ एक संवाद में आती है। यह परतदारता केवल रंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि आकृतियों के विभिन्न स्तरों पर भी लागू होती है। यह संयोजन पेंटिंग की गहराई को बढ़ाता है और दर्शक को इसके प्रत्येक हिस्से को अलग-अलग देखने और समझने के लिए प्रेरित करता है।
प्राकृतिक और कृत्रिम तत्वों का संतुलन
इस पेंटिंग में प्राकृतिक और कृत्रिम आकृतियों का मिश्रण देखा जा सकता है। पत्तियाँ, पेड़, और फूलों के संकेत प्राकृतिक जीवन के प्रतीक हैं, जबकि कुछ आकृतियाँ मनुष्य की बनाई गई कृत्रिम संरचनाओं की ओर संकेत करती हैं। इस प्रकार, यह पेंटिंग एक संतुलन बनाती है जहाँ प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों एक साथ सहअस्तित्व में हैं।
स्पर्श
यह पेंटिंग स्पर्श की अनुभूति देती है। प्रयाग शुक्ल की इस पेंटिंग में मोटे रंगों के स्ट्रोक इसे स्पर्शनीय (tactile) बनाता है। पेंटिंग की सतह पर कुछ स्थानों पर स्ट्रोक का घना और मोटा प्रयोग किया गया है, जो तुरंत दर्शकों का ध्यान खींचता है। उदाहरण के लिए, बैंगनी और पीले रंग के बड़े, मोटे स्ट्रोक पेंटिंग के केंद्र और किनारों पर प्रमुखता से दिखाई देते हैं। इन मोटे स्ट्रोक्स से ऐसा आभास होता है जैसे वे पेंटिंग की सतह से बाहर निकल रहे हों। इस तरह की मोटी रंगत शारीरिकता की अनुभूति को बढ़ाती है, मानो दर्शक न केवल देख रहे हों, बल्कि पेंटिंग को छूकर महसूस कर रहे हों।
इसके विपरीत, कुछ जगहों पर हल्के और मुलायम स्ट्रोक्स का प्रयोग किया गया है, जैसे पृष्ठभूमि में हल्के नीले या सफेद रंग की झलकियाँ। यह हल्के और मोटे स्ट्रोक का संयोजन पेंटिंग में एक संतुलन उत्पन्न करता है और दर्शकों को रंगों की विविधता के साथ एक बहु-स्तरीय अनुभव प्रदान करता है।
गतिशीलता, संगीत और विजुअल जर्नी
पेंटिंग में समय और गति की बहुलता है। रंगों और आकृतियों के माध्यम से एक निरंतर गतिशीलता को प्रदर्शित किया गया है। मानो रंग और रूप दर्शक के सामने बदल रहे हैं, या एक यात्रा पर हैं। यह गतिशीलता पेंटिंग को एक स्थिर चित्र से आगे बढ़ाकर एक ऐसा अनुभव बनाती है, जो कभी खत्म नहीं होता, बल्कि निरंतर विकसित होता रहता है।
इस पेंटिंग को सुना भी जा सकता है। इसमें आकृतियों और रंगों का आवृत्त (repetitive) उपयोग एक लयबद्ध ध्वनि का आभास कराता है। अमूर्त कला में रूपों और रंगों के पुनरावृत्ति से एक मूक ध्वनि उत्पन्न होती है, जो दर्शक को किसी संगीत या कविता के साथ जुड़ने का अनुभव कराती है। यह पेंटिंग भी उसी ध्वनिगत प्रभाव का आभास कराती है, जहाँ रूप और रंगों की पुनरावृत्ति एक प्रकार की लय और ताल का निर्माण करती है।
यह पेंटिंग दर्शकों को एक दृश्यात्मक यात्रा पर ले जाती है, जहाँ रंगों और आकृतियों के माध्यम से एक अनदेखी दुनिया का अनुभव कराया जाता है। यह एक स्थलविशेष पर टिकने की बजाय दर्शक को एक बहुआयामी अनुभव की ओर खींचती है, जहाँ दृष्टि और मस्तिष्क दोनों मिलकर एक व्यक्तिगत यात्रा का हिस्सा बनते हैं।
लोक और वैश्विक
इस पेंटिंग को भारतीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में भी रंगों का उपयोग और उनकी संरचना एक ओर वैश्विकता या आधुनिकता की ओर इशारा करती है, जबकि दूसरी ओर यह पारंपरिक भारतीय कलात्मक लोक शैलियों का भी प्रतीक हो सकती है। इस पेंटिंग में प्रयुक्त बैंगनी और नीले रंग भारतीय कला के परंपरागत रंगों की याद दिलाते हैं, जबकि इसका अमूर्त रूप आधुनिकता की दिशा में एक कदम है। उदाहरण के लिए, फूलों और पत्तियों की आकृतियाँ मधुबनी और वारली कला की शैली में किए गए लोकचित्रों की तरह दिखती हैं, जो ग्रामीण भारतीय जीवन और प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाती हैं। यह पेंटिंग पूरी तरह से अमूर्त शैली में है, जो आधुनिक वैश्विक कला आंदोलनों से प्रभावित है, खासकर 20वीं सदी की अमूर्त अभिव्यक्तिवादी और क्यूबिस्ट कला से। यह लोक और वैश्विकता का मेल पेंटिंग को एक ऐसे बिंदु पर लाकर खड़ा करता है, जहाँ भारतीयता और आधुनिकता एक साथ सहअस्तित्व में हैं।
इस प्रकार प्रयाग शुक्ल की पेंटिंग में अमूर्तता और संरचना के बीच एक खेल है, जो न केवल आकृतियों के अनिश्चित बिखराव को दर्शाता है, बल्कि इसके पीछे छिपी रचनात्मक संतुलन को भी उजागर करता है। इस पेंटिंग में रंगों और आकृतियों का जो अनिश्चित और अमूर्त संयोजन है, वह धारणा (perception) और अनुभूति (sensation) के बीच खेलता है। पहली नज़र में यह एक भ्रम पैदा कर सकता है कि यह केवल आकस्मिक बिखराव है या केवल केओस (Chaos) है। जिस प्रकार हेसियड की “Theogony” में केओस (Chaos) को सृष्टि के प्रारंभिक अवस्था के रूप में देखा गया, उसी तरह इस पेंटिंग में भी अमूर्तता से एक नये अर्थ का उद्भव होता है। हेसियड इस केओस से ही क्रमशः पृथ्वी (Gaia), अंधकार (Erebus), और रात्रि (Nyx) का जन्म हुआ, उसी प्रकार प्रयाग शुक्ल इस पेंटिंग में अमूर्तता से एक और अनेक अर्थों का सृजन करते हैं। इसलिए इस पेंटिंग की संरचना में कोई स्पष्ट फोकल पॉइंट नहीं है, बल्कि आकृतियाँ स्वतंत्र रूप से बिखरी हुई हैं,जो दर्शकों को समय के साथ धीरे-धीरे खुलती है।
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संदर्भ
1. Mudrooroo Nyoongah , Aboriginal Mythology: An A-Z Spanning the History of Mythology” ,HarperCollins, 1994.
2.Hesiod, Richard S. Caldwell ( Trans.) Theogony, Hackett Publishing Company, 1987 .
नोट -5 अक्टूबर को आर्ट स्पेस, भोपाल में प्रयाग शुक्ल की एकल चित्रकला प्रदर्शनी ‘Myriad Hues’ में इस पेंटिंग का प्रदर्शन हुआ था। इसमें प्रयाग शुक्ल जी एकल दीर्घा के साथ भोपाल के चार युवा कलाकारों Preeti Potdar Jain , डॉ. Chhaya Dubey, Hansa Milan Kumar तथा Sadhana Shukla की समूह प्रदर्शनी भी थी। Shampa Shah वक्तव्य वक्तव्य भी था।
