Devaraj Dakoji
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देवराज डकोजी:कला का आदिम अनुष्ठान

“…समय बीत जाता है, पर निशान शेष रहता है। शरीर मिट जाता है, पर आभास बना रहता है।” देवराज डकोजी की कला इस क्षणभंगुरता और स्थायित्व के बीच के तनाव को प्रकट करती है। समय के एक दरार में एक डकोजी चित्र नहीं बनाते, बल्कि उत्खनन करते हैं। उनकी कला केवल चित्रण नहीं, बल्कि एक खुदाई…

Basu Chatterjee
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सारा आकाश: बासु चटर्जी की सिनेमा का विरोधाभास

बासु चटर्जी को साधारण मध्यमवर्गीय जीवन का सहज फिल्म निर्देशक माना जाता है और उनकी पहली फिल्म “सारा आकाश” (1969) को इसका उदाहरण माना जाता है, मगर बासु चटर्जी के निर्देशन और फिल्मों का एक विरोधाभास यह है कि निर्देशक की कहन शैली उतनी साधारण नहीं है, बल्कि लाउड और गैर सिनेमाई है। इस बात…

Nand Katyal
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नंद कत्याल : एक दृश्य-संगीतकार

“जब तुम वह छोड़ देते हो जो तुम हो, तो तुम वह बन जाते हो जो तुम हो सकते हो।दरवेश नाचता है, और दुनिया संगीत बन जाती है।” (रूमी ) सूफी दर्शन में कला के विभिन्न रूपों का आपसी मिलन होता है, जहाँ एक कला रूप अन्य से जुड़ी भावनाओं को उत्पन्न कर सकता है। एक…