Elementor #398
‘अनोरा’ पाँच ऑस्कर और कान्स पुरस्कार लेकर पूरी दुनिया जीत चुकी है, मगर अनोरा’ देखने के बाद मेरे मन में खालीपन और असंतोष उत्पन्न हुआ, ऐसा असंतोष – जो तब उपजता है , जब कोई फिल्म अपने विषय के प्रति ईमानदार नहीं रह पाती हो। यह खालीपन फिल्म के शिल्प और उसकी कहानी के मूल तत्व के बीच की असंगति से पैदा हुआ है। जब कथा-शैली अपने विषय के प्रति सच्ची और आवश्यक संवेदनशीलता नहीं दिखाती है, तो फिल्म महज एक प्रदर्शन बनकर रह जाती है और ऐसा प्रदर्शन, जो सतह पर भले ही प्रभावशाली लगे, लेकिन भीतर से खोखला प्रतीत होता है।
रामायण में एक प्रसंग है कि जब अहिल्या के साथ छल करते हुए देवराज इंद्र को पकड़ लिया गया, तब देवराज ने अपने बचाव में कहा कि मेरी कोई गलती नहीं है कि पहले अहिल्या ने मुझे बुलाया और अब पकड़े जाने पर शोर मचा रही है।
यह अहिल्या की कथा थी -इंद्र की शैली में।
जब कथा कहने वाला ही उसके प्रति ईमानदार न हो, तो सत्य को झूठ और झूठ को सत्य सिद्ध करना आसान हो जाता है। ऐसा ही कुछ ‘अनोरा’ में निर्देशक शॉन बेकर ने किया है — जहाँ कथानक का दृष्टिकोण वास्तविकता को विकृत कर देता है और सत्य अपनी मूल पहचान खो बैठता है।
शॉन बेकर की ‘अनोरा’ का सबसे बड़ा दोष यही है। यह फिल्म सेक्स वर्कर्स के जीवन की कठिनाइयों और जटिलताओं को उजागर करने का दावा करती है, मगर इसकी कथा-शैली उस ईमानदारी को नहीं पकड़ पाती जिसकी यह विषय मांग करता है। फिल्म के पात्रों के संघर्षों को अतिनाटकीय और सनसनीखेज़ रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे उनका यथार्थ धुंधला हो जाता है।’अनोरा’ एक ऐसी फिल्म है, जो दर्शकों को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जो पहली नज़र में वास्तविक तो लगती है, परंतु उसके भीतर गहराई से देखने पर एक विचित्र-सा असंतुलन महसूस होता है।
शॉन बेकर वास्तविकता के नाम पर एक चौंकाने वाली दुनिया रचते हैं , एक ऐसी दुनिया जो सतह पर तो असली लगती है, मगर एक मनगढ़ंत और सनसनीखेज़ कल्पना है। इस फिल्म में जिस तरह सेक्स वर्कर्स के जीवन को चित्रित किया गया है, वह कहीं न कहीं एक ‘अवास्तविक यथार्थ’ (Unreal Reality) का आभास देता है और ऐसा यथार्थ जो दर्शकों के मनोरंजन शॉन बेकर के लिए जानबूझकर अतिरंजित किया गया है। यह फिल्म के अनोरा “अनी” मिखीवा के चरित्र से से समझा जा सकता है।
अनी का चरित्र: एक स्त्री-विरोधी दृष्टिकोण
‘अनोरा’ में अनी मिखीवा का चरित्र जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह कहीं न कहीं महिलाओं, विशेषकर सेक्स वर्कर्स के प्रति नकारात्मक और पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण को उजागर करता है। अनी का किरदार न केवल रूढ़िगत स्त्री छवियों को मजबूती देता है, बल्कि उसके व्यक्तित्व को इस हद तक सीमित कर देता है कि वह एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर इंसान के बजाय केवल ‘शोषित’ और ‘बचाव के योग्य’ स्त्री के रूप में प्रस्तुत होती है।
अनी का चरित्र मुख्यतः दो पक्षों में विभाजित है, अनी एक व्यक्ति के रूप में और अनी एक सेक्स वर्कर के रूप में। फिल्म में “अनी व्यक्ति के रूप में और अनी एक सेक्स वर्कर के रूप में” के बीच का भेद लगभग समाप्त हो जाता है। लेकिन फिल्म इन दोनों पक्षों के बीच का संतुलन स्थापित करने में असफल रहती है। फिल्म में ‘अनी’ के निजी व्यक्तित्व उसकी पेशेवर सेक्स वर्कर की पहचान में गायब है। उसके निजी अस्तित्व और उसकी सामाजिक पहचान के बीच की सीमाएं धुंधली कर दी गई हैं, जिससे उसकी भावनाएं, इच्छाएं, और उसकी मानवीय जटिलताएं कहीं गुम हो जाती हैं।
यह स्थिति समाज में सेक्स वर्कर्स के प्रति गहरे पूर्वाग्रह के जैसा है। फिल्म में अनी का यह चित्रण इस बात का उदाहरण है कि सेक्स वर्कर्स को अक्सर सिर्फ उनके पेशे के माध्यम से परिभाषित किया जाता है। उनके व्यक्तित्व, उनके सपने, और उनकी कमजोरियां , ये सब उस छवि के आगे धुंधली हो जाती हैं, जो समाज ने उनके लिए गढ़ रखी है।
अनोरा’ ने सेक्स वर्कर्स को उसी पारंपरिक ढांचे में प्रस्तुत किया है, जहां वे समाज के शोषित, असहाय और दयनीय वर्ग के रूप में नजर आती हैं, जिन्हें केवल किसी बाहरी व्यक्ति — अक्सर पुरुष — के हस्तक्षेप से ‘बचाया’ जा सकता है। वर्षों से सेक्स वर्कर्स को अक्सर ऐसी ही छवि के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है , मानो उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य बस ‘इस दलदल’ से बाहर निकल पाना ही हो।
इस प्रक्रिया में फिल्म कहीं न कहीं सेक्स वर्कर्स की वास्तविकता से भटक जाती है। वास्तविक जीवन में सेक्स वर्कर्स की परिस्थितियां कई रूपों में होती हैं , उनके जीवन में संघर्ष के साथ-साथ आत्मनिर्णय, प्रेम और सामर्थ्य के पहलू भी शामिल होते हैं। मगर ‘अनोरा’ इस जटिलता को अनदेखा कर सिर्फ एक ‘पीड़ित’ सेक्स वर्कर की छवि प्रस्तुत करती है, जिसे दर्शक ‘बचाए जाने योग्य’ मान लें।
इस संदर्भ में ‘अनोरा’ का दृष्टिकोण स्त्री-विरोधी प्रतीत होता है, क्योंकि यह महिलाओं को स्वयं अपने निर्णय लेने में असमर्थ दिखाता है। अनी का चरित्र स्वयं के लिए कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाता; वह परिस्थितियों का शिकार बनती है और फिल्म उसे अपनी तकलीफों से बाहर निकालने की जिम्मेदारी किसी पुरुष पात्र पर डाल देती है। उसका हर निर्णय बाहरी घटनाओं या अन्य पात्रों द्वारा नियंत्रित प्रतीत होता है।
फिल्म में अनी के चरित्र को लेकर जिस प्रकार की ‘सहानुभूति’ दर्शाई गई है, वह सतही और निष्क्रिय है। यह सहानुभूति अनी को एक स्वतंत्र स्त्री के रूप में स्थापित करने के बजाय उसे केवल एक ‘दुखद पात्र’ में बदल देती है, जिससे दर्शक उसकी परिस्थितियों पर तरस खाएं लेकिन उसके संघर्ष को स्वीकार न करें।
अनी का चरित्र पूरी तरह उसके पेशे की छवि से नियंत्रित है। फिल्म में उसकी संघर्षशीलता, उसकी आत्मनिर्णय की क्षमता, और उसकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को नजरअंदाज कर दिया गया है। इससे फिल्म का दृष्टिकोण सेक्स वर्कर्स के प्रति रूढ़िवादी बन जाता है, जहां वे केवल एक ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत होती हैं, जिन्हें किसी ‘उद्धारकर्ता’ की आवश्यकता है।
यह दृष्टिकोण महिलाओं की भूमिका को सीमित कर देता है, जिससे अनी का किरदार केवल ‘पीड़ित स्त्री’ के स्टीरियोटाइप में कैद रह जाता है। यह चित्रण सेक्स वर्कर्स को एक संपूर्ण इंसान के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें केवल उनकी पेशेवर स्थिति से परिभाषित करने का प्रयास करता है, जिससे उनका मानवीय पक्ष दब जाता है।
‘अनोरा’ में अनी का चरित्र इस बात का उदाहरण है कि कैसे सिनेमा में कभी-कभी ‘सहानुभूति’ के माध्यम से भी स्त्री-विरोधी दृष्टिकोण प्रकट हो सकता है। फिल्म के माध्यम से सेक्स वर्कर्स की वास्तविकता को जटिलता और आत्मनिर्णय के बजाय महज एक ‘पीड़ित’ छवि में सीमित कर दिया गया है। यह दृष्टिकोण महिलाओं को उनके संघर्ष, आत्मसम्मान और अस्तित्व की लड़ाई में कमतर दिखाता है, जिससे फिल्म अपने ही विषय के साथ न्याय करने में असफल हो जाती है।
यह वही ‘Unreal Reality’ है, जो अक्सर फिल्मों में देखने को मिलती है , जहां समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की जिंदगी को एक ‘दर्दनाक तमाशे’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ताकि दर्शक सहानुभूति महसूस कर सकें। यह दृष्टिकोण सेक्स वर्कर्स को एक संपूर्ण व्यक्ति के रूप में दिखाने के बजाय उन्हें केवल ‘वृत्ति का शिकार’ बनाने का प्रयास करता है। इससे दर्शकों की सहानुभूति तो मिलती है, मगर असली सवाल – सेक्स वर्कर्स के आत्मसम्मान, उनके अधिकारों और उनके रोज़मर्रा के जीवन में मौजूद जटिलताओं का प्रतिनिधित्व कहीं गुम हो जाता है। इस विसंगति का एक बड़ा कारण फिल्म के शैली और शिल्प में निहित है।
भ्रमित कथा संरचना -शैली बनाम कथ्य
शॉन बेकर की ‘अनोरा’ की कथा-शिल्प वैसे तो एक रोचक प्रयोग है, लेकिन यह प्रयोग अपने कथ्य को प्रस्तुत करने में त्रुटिपूर्ण सिद्ध होता है, जिससे वास्तविकता का स्वरूप विकृत हो जाता है। फिल्म तीन स्पष्ट हिस्सों में विभाजित है। यह संरचना प्रयोगात्मक होने का आभास देती है, लेकिन गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि यह प्रयोग वास्तविकता को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है, जिससे दर्शकों के लिए सत्य और भ्रम के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
‘अनोरा’ का ढांचा पारंपरिक तीन-अंकीय संरचना (Three-Act Structure) पर आधारित है, मगर इसकी शैलीगत प्रयोगशीलता इसे एक जटिल और विरोधाभासी अनुभव में बदल देती है। यह विरोधाभास दर्शकों को एक ठोस, विश्वसनीय कथा में प्रवेश करने से रोकता है और उन्हें लगातार भ्रमित और असंतुष्ट बनाए रखता है।
पहले अंक में फिल्म का शुरुआती हिस्सा एक प्रेम कथा के रूप में उभरता है, जो किसी आधुनिक ‘Pretty Woman’ या किसी क्लासिक परीकथा की याद दिलाता है। यह भाग कोमल, रोमांटिक और भावनात्मक रूप से सहज प्रतीत होता है।
दूसरे अंक में अचानक फिल्म एक उन्मादी स्क्रूबॉल कॉमेडी (Screwball Comedy) में तब्दील हो जाती है, जहां घटनाएं तेजी से बदलती हैं, पात्र अराजकता में उलझते हैं, और हास्यपूर्ण दृश्य गहरे तनाव के बीच बुने जाते हैं, जो पहली अनुभूति के विपरीत है।
तीसरे अंक में अंतिम चरण में कहानी एक घने अंधकार में प्रवेश करती है, जहां हिंसा, त्रासदी और विडंबना अपने चरम पर पहुंच जाते हैं। यह भाग दर्शकों को असहज कर देता है।
आदर्श रूप में तीनों अंकों के बीच एक सहज प्रवाह होता है, जहाँ हर भाग पिछले भाग का स्वाभाविक विस्तार होता है। मगर जब कहा जाता है कि “तीन-अंकीय संरचना का आपस में सहज संबंध नहीं है, जिसे हर एक अंक से संपादित भावना दूसरे अंक के विरोध में रहती है”, इसका अर्थ है कि प्रत्येक अंक अपनी अलग भावना, लय और संवेदना लेकर आता है, जो पिछली अनुभूति को झुठलाता या चुनौती देता प्रतीत होता है। ‘अनोरा’ में हर अंक अपनी अलग भावना, लय और संवेदना लेकर आता है, जो पिछली अनुभूति को झुठलाता या चुनौती देता प्रतीत होता है। यह विरोधाभास दर्शकों को किसी ठोस, विश्वसनीय कथा में प्रवेश करने से रोकता है और उन्हें लगातार असंतुष्ट और भ्रमित बनाए रखता है।
कभी-कभी तीनों अंकों में भावनात्मक विसंगति जानबूझकर रचा जाता है ताकि पात्रों के द्वंद्व को गहराई दी जा सके, दर्शकों को किसी निश्चित पूर्वधारणा के साथ सहज न होने दिया जाए और हर मोड़ पर कहानी का अर्थ और प्रभाव पुनर्परिभाषित किया जा सके। विरोधाभास कथा के उद्देश्य का हिस्सा हो जैसे भ्रम, असंतोष या अस्थिरता को उजागर करना , तो यह शैली प्रभावी सिद्ध हो सकती है। इसलिए जब तीन अंकों की भावनाएं आपस में विरोधी हों, तब भी यदि वे किसी बड़े विचार, संवेदना या कथानक के उद्देश्य को गहराई प्रदान कर रही हों, तो यही विरोधाभास रचना की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है। उदाहरण के लिए Bong Joon-ho की ‘Parasite’ में हास्य, भय और त्रासदी का संयोजन एक सामाजिक वर्ग संघर्ष की गहराई को उजागर करता है। मगर इस फ़िल्म में शैलीगत अंकीय विरोधाभास कथ्य में कुछ जोड़ने से अधिक कथ्य के प्रभाव को धुंधला कर रहा है। ‘अनोरा’ में यह विसंगति कथा को गहराई देने के बजाय उसे कमजोर करती है। फिल्म के तीनों अंकों की भिन्न भावनाएं एकीकृत होने में असफल रहती हैं, जिससे कहानी अपने आप में बिखरी हुई और असंगत लगने लगती है।
‘अनोरा’ में इस असंगति का उद्देश्य स्पष्ट नहीं होता। यहाँ विसंगति किसी गहरे कथानक उद्देश्य के बजाय केवल शैलीगत प्रयोग का आभास देती है। पात्रों के संघर्ष और उनकी मानसिक दुनिया को गहराई देने के बजाय यह विरोधाभास उन्हें ‘घटनाओं के पुतले’ में बदल देता है, जिससे उनकी भावनात्मक विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप, दर्शक कथा के उद्देश्य को समझने के बजाय एक अधूरे अनुभव के साथ रह जाते हैं।
इस फिल्म के तीनों अंकों की भिन्न भावनाएं एकीकृत होने में असफल रहती हैं, तो कथा अपने आप में बिखरी हुई या असंगत लगने लगती है। फिल्म के तीनों अंक प्रेम, अराजकता और त्रासदी मिलकर एक ऐसी तस्वीर गढ़ते हैं जो दर्शकों को वास्तविकता का भ्रमित चित्रण देती है। एक ऐसा तरीका जो सत्य को खोजने के बजाय उसे भ्रमपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है। ‘अनोरा’ की शैलीपूर्ण संरचना वास्तविकता को समझने के बजाय उसे अतिनाटकीय बना देती है और एक अधूरा दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है , एक ऐसा दृष्टिकोण जो भ्रम को यथार्थ का नाम दे देता है।
यही disconnect फिल्म के सबसे बड़े दोष के रूप में उभरता है। ‘अनोरा’ वास्तविकता को समझने के बजाय उसे सनसनीखेज़ बनाकर प्रस्तुत करती है। इसके परिणामस्वरूप फिल्म के पात्र महज घटनाओं के पुतले या कृत्रिम लगते हैं, न कि जीवंत इंसान। इस प्रक्रिया में फिल्म अपने ही विषय के साथ न्याय करने में असफल रहती है और अंततः दर्शकों के मन में एक अधूरे अनुभव की भावना छोड़ जाती है, ऐसा अनुभव, जो यह दर्शाता है कि ‘अनोरा’ न केवल अपने कथ्य के प्रति ईमानदार नहीं रह सकी, बल्कि सत्य और भ्रम के बीच की रेखा भी धुंधली कर देती है।
( समाप्त)
