Devaraj Dakoji
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देवराज डकोजी:कला का आदिम अनुष्ठान

“…समय बीत जाता है, पर निशान शेष रहता है। शरीर मिट जाता है, पर आभास बना रहता है।” देवराज डकोजी की कला इस क्षणभंगुरता और स्थायित्व के बीच के तनाव को प्रकट करती है। समय के एक दरार में एक डकोजी चित्र नहीं बनाते, बल्कि उत्खनन करते हैं। उनकी कला केवल चित्रण नहीं, बल्कि एक खुदाई…

Nand Katyal
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नंद कत्याल : एक दृश्य-संगीतकार

“जब तुम वह छोड़ देते हो जो तुम हो, तो तुम वह बन जाते हो जो तुम हो सकते हो।दरवेश नाचता है, और दुनिया संगीत बन जाती है।” (रूमी ) सूफी दर्शन में कला के विभिन्न रूपों का आपसी मिलन होता है, जहाँ एक कला रूप अन्य से जुड़ी भावनाओं को उत्पन्न कर सकता है। एक…

प्रयाग शुक्ल
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प्रयाग शुक्ल : अमूर्त कला का संतुलन

कला में अमूर्तता “इंद्रधनुष साँप” (Rainbow Serpent) की तरह होता है। ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी (Aboriginal) मिथकों में इस “इंद्रधनुष साँप” (Rainbow Serpent) की कथा है। आदिवासी लोगों का मानना है कि इंद्रधनुष साँप ही धरती के पहाड़, नदियाँ, झीलें और घाटियाँ बनाने के लिए जिम्मेदार था। जब साँप धरती पर सरकता था, तो वह अपने शरीर…