साजिदा साजी का ‘दोज़ख़’ – अतिरेक हिंसा, यथार्थ और सार्थकता
साजिदा साजी का ‘दोज़ख़’ एक ‘अति प्रस्तुति‘ थी और इस ‘अतिरेक’ का स्रोत इसके आधार उपन्यास ब्लैसफेमी (1998) से आया है एवं ब्लैसफेमी में यह अतिरेक लेखिका तहमीना दुर्रानी के अपने जीवन में मौजूद सामाजिक हिंसा से आया है। हॉलीवुड में फिल्मों का एक जोनर ‘बॉडी टार्चर या सलेशर’ फिल्म की है, जिसमें शारीरिक और खूनी हिंसा के लंबे दृश्य होते हैं और यह प्रस्तुति भी कुछ ऐसा ही था। मंच पर माँ की गालियां, दर्जनों रेप और सेक्स के दृश्य एवं हत्या का दृश्य। हिंसा का यह स्तर और बढ़ता ही जाता है, जब पीर को हीर के ख्याल में दीगर और अन्य मर्द के होने बारे में शक होता है और पीर अपनी पत्नी हीर को वेश्या के रुप में अन्य बदबूदार मर्दों के सामने परोसने लगता है और हर दिन कई मर्द को भेजता है, बदबू वाले मर्द। और फिर यह प्रश्न पुछता है कि अब बताओ किस तरह का मर्द पसंद है। इस कथा में इतनी हिंसा है कि स्त्री के अधिकारों की कथा के बदले यह एक अपराध कथा लगती है, मानो हम गैंग्स ऑफ वासेपुर देख रहे हों। इतनी हिंसा, मगर किसलिए या इसकी सार्थकता क्या है? वैसे एंटोनिन आर्टौड (Antonin Artaud) का ‘क्रूरता का रंगमंच (Theatre of Cruelty)’ भी है और उनके अनुसार आघात या हिंसा को व्यक्त करने के लिए भाषा अपर्याप्त साधन है। इसलिए शब्दों से अर्थ छीन कर ही और उनके ध्वन्यात्मक तत्वों के इस्तेमाल से हिंसा को उसकी संपूर्णता में दिखाया जाना संभव है। इस अर्थ में मंच पर क्रूरता परपीड़न या दर्द पैदा करने के लिए नहीं है, बल्कि अकसर झूठी वास्तविकता को तोड़ने के लिए होता है। इसके मूल में नीत्शे का यह विचार है कि “समस्त उच्च संस्कृति क्रूरता के आध्यात्मिकीकरण से उत्पन्न हुई है। मनुष्य सबसे क्रूर जानवर है।” और सभी कलाएं अनुभव के रोमांच को फिर से बनाने के लिए जीवन में अंतर्निहित क्रूरताओं को मूर्त रूप देती हैं और तीव्र करती हैं।
सभ्यता के विकास के साथ हम यह सोचना पसंद करते हैं कि हमने क्रूरता और पशु प्रवृत्ति को मार डाला है, जबकि वास्तव में हमने उसको और आकर्षक एवं अनुकरणीय बना दिया है। मानव इतिहास का सबसे लंबा और सबसे प्राचीन हिस्सा यही सिखाता है कि क्रूरता के बिना कोई उत्सव संभव नहीं है और दंड में भी एक तरह का उत्सव जैसा ही कुछ होता है। इस प्रस्तुति में भी हिंसा का स्वर सबसे ऊपर था। स्त्री के प्रति हिंसा का इतिहास और वर्तमान में जो विस्तार और स्तर है, उसके सामने हिंसा के ये दृश्य कमतर ही हैं। जैसे तहमीना दुर्रानी के जीवन में था। यह नाटक तहमीना दुर्रानी की तीसरी पुस्तक ब्लैसफेमी (1998) उपन्यास पर आधारित है। उपन्यास में वह मुस्लिम धार्मिक नेता या पीर के गुप्त जीवन का वर्णन करती है। दुर्रानी ने कहा है कि यह कहानी सत्य घटनाओं पर आधारित है, मगर कहानी के केंद्र में महिलाओं की पहचान की रक्षा के लिए कुछ नाम और घटनाएं बदल दी गई हैं। “मेरे लिए, मेरा पति मेरे बेटे का हत्यारा था। वह मेरी बेटी का भी उत्पीड़न करने वाला था।” ये मुख्य पात्र हीर के शब्द हैं जो अमानवीय संबंध को दर्शाता है। पीर खुद एक पशु का जीवन जी रहा है, वह हीर के जीवन को भी पशुवत बना देता है। इस उपन्यास का कुछ हिस्सा स्वयं तहमीना दुर्रान का अपना अनुभव भी है, जिसे उनकी आत्मकथा फ्यूडल लॉर्ड (1991) में खोजा जा सकता है। उनकी दूसरी शादी पंजाब के राजनीतिक और कबिलाई नेता खार से हुई। उनकी पुस्तक में इसी शादी के बाद पति के वीभत्स दुर्व्यवहार का रक्तरंजित विवरण है। बेहद रूढ़िवाद मुस्लिम समाज में अपने तत्कालीन प्रसिद्ध पति को सार्वजनिक रूप से बेनकाब करने की कीमत चुकानी पड़ी। इसी कारण उसके अपने माता-पिता ने भी उसका बहिष्कार कर दिया था। पूर्व पति से मिलने वाली सारी वित्तीय सहायता के साथ-साथ अपने बच्चों के देखभाल का अधिकार भी खोना पड़ा। इस स्थिति को इससे भी समझा जा सकता है कि कोई भी प्रकाशक ऐसी विवादास्पद पुस्तक को प्रकाशित करने को तैयार नहीं था, इसलिए उन्होंने शुरुआत में इसे स्वयं मुद्रित किया। “पहली रात एक किस्म की मौत और पलंग एक बड़ी कब्र के जैसा था” इस नाटक को देखना भी कुछ इसी तरह का अनुभव था। मगर फिर भी स्त्री के प्रति हिंसा की विकरालता को दिखाने का क्या यही तरीका सबसे सक्षम तरीका था? “क्रूरता के इस रंगमंच” के साथ यह समस्या है कि स्पष्ट अर्थ को अमूर्त एहसास में बदल देता है और कथा में मौजूद जीवन के ठोस विवरण को भी निराशाजनक रूप से अस्पष्ट और प्रतीकात्मक बना देता है। इसके विकल्प को देखना होगा।
आधे घंटे के बाद तक नाटक में दोहराव सा लग रहा था, शोषण का एक कृत्रिम चक्र। मगर थोड़ी देर रुक कर देखने पर यह नाटक ‘नाटक से परे एक महत्त्वपूर्ण बात’ तक ले जाता है कि एक लंबे समय के चक्र में शोषित भी शोषक की भूमिका में आ जाता है। शुरुआत में हीर 14 साल में पति द्वारा शोषित के रूप आती है, मगर अंत तक में कम उम्र की अनाथ बच्ची को पति के समाने परोसने का माध्यम बन जाती है। इसे इस तरह से भी देखा जा सकता कि लंबे समय तक शोषण को स्वीकार करते रहने के कारण शोषित का अवचेतन शोषक और शोषण को सही मान कर स्वीकार लेता है और अवसर मिलने पर वह स्वय शोषक की भूमिका में आ जाता है। शोषक पीर की भी शोषण की एक पूर्व कथा है।पीर भी अपने पिता की हिंसा का शिकार हुआ था, जो उसे पागल कुत्ते के साथ बंद किये जाने के प्रसंग से पता चलता है। नाटक में कई संदर्भ हैं। एक संदर्भ धर्म और सत्ता के गठजोर का है। मगर इससे भी बड़ा संदर्भ परिवार में पुरुष द्वारा स्त्री के शोषण का है। एक संदर्भ यह भी है कि शोषित स्त्री भी दूसरे स्त्री के शोषण का माध्यम बनकर शोषक हो जाती है। हीर खुद ‘शैतान की बीवी’ बन जाती है। अभिनय के लिहाज से एक शोषित चरित्र का शोषक चरित्र में रूपांतरण करना और इसे प्रमाणिक रखना एक कठिन प्रक्रिया है। दर्शक के लिए भी यंत्रणा की तरह है कि जिस चरित्र से वह सहानुभूति रखता है, वह चरित्र अचानक नफरत का पात्र हो जाता है। यह रूपांतरण नाटकीय और भावनात्मक होते हुए भी बौद्धिक निष्कर्षों तक ले जाता है।
कुल मिलाकर यह नाटक अभिनेताओं का नाटक था और अभिनेता स्वयं निर्देशक भी हो, तो यह स्वाभाविक ही था। अभिनय के लिहाज से साजिदा साजी का Treasure Art Association और दोजख ट्रेजर ही लगा। लगभग पूरे नाटक में चुप चील के रुप में बुत की तरह खड़ा रहना अभिनेता के लिए एक टार्चर वाला अभ्यास रहा होगा, अभिनेता को साधुवाद। वैसे मूल उपन्यास में चील एक ऐसा पात्र है जो हीर को पीर से लड़ने लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और चील का चरित्र हीर का सहयोगी रहा था, मगर प्रस्तुति में वह प्रतीक सा लगा, हिंसा का मूक दर्शक। गाने का चुनाव कथ्य से कमतर था और कथ्य में दबकर रह गया और अभी-कभी विपरीत भी लगा। ध्वनि के पार की ध्वनि से नाटक की शुरुआत इसके संगीत का सबसे सक्षम हिस्सा था। नाटक में कई दृश्य उल्लेखनीय हैं। जैसे बोलने और बातचीत की मनाही के बाद काली और हीर का बर्तनों से बातचीत करने का दृश्य था। जैसे आरंभ का दृश्य था, जिसमें जीवन के अंत से यह नाटक शुरू होता और फिर मृतक के लिए शोर के बाद हीर का आजाद अकेलापन।
कुल मिलाकर इस नाटक का वितान इतना बड़ा और विस्तृत था और इतनी घटनाएं और दृश्य थे कि लगा चीजें दिखने के बाद महसूस होने का समय दिये बिना ही या समझने का अवसर दिये बिना ही सामने से निकल गयी। उपन्यास के नाट्य रूपांतरण पर और काम होना चाहिए था। नाटक लाश से शुरू होती है और लाश के जग जाने से कथा शुरू होती है, मगर इस प्रभावी शुरुआत के समानांतर अंत अधूरा और कमजोर लगता है। दृश्यों के अंदर कुछ अंतराल की आवश्यकता है। यह एक बनता हुआ नाटक है, इसके आगे की प्रस्तुति से उम्मीद की जा सकती है।
(14 फरवरी, पटना कालिदास रंगालय में भारंगम 2024 के तहत प्रस्तुत।)
