अर्थशिला पटना का वास्तुशिल्प: कच्चेपन का सौंदर्यशास्त्र
ग्रीक मिथक में डेडालस (Daedalus) को पहला महान शिल्पकार और वास्तुकार माना जाता है डेडालस ने क्रीट शहर में राजा मिनोस के लिए एक भूलभलैया बनाया, एक ऐसा भवन जो केवल दीवारों का नहीं, बल्कि भ्रम और अनुभव का स्थापत्य था। यह भवन दानव मिनोटौर को छिपाकर कैद करने के लिए बनाया गया था, पर अंततः वह स्वयं डेडालस के लिए भी क़ैद बन गया। उससे पहले डेडालस एथेंस से निर्वासित होकर क्रीट आया था। डेडालस अपने बेटे इकारस के साथ मोम से बने पंख का उपयोग करके क्रीट से उड़ान भरी, लेकिन इकारस की सूर्य के करीब उड़ने से मौत हो गई। मगर डेडालस, जिसने संतुलन और सीमा का पालन किया, सुरक्षित लौट आया। मनुष्य हमेशा से कला या विज्ञान से अपने स्वप्न को पाने का प्रयास करता रहा है।
एक ऐसा ही प्रयास है-अर्थशिला पटना का नया सांस्कृतिक भवन का वास्तुशिल्प। बेली रोड की अराजक, शोरग्रस्त और निरन्तर गतिशील धमनियों के बीच खड़े उस 30 मीटर ऊँचे, कंक्रीट और कॉर्टन स्टील के मोनोलिथ को देखता हूँ, तो मुझे यह भवन केवल एक ‘इमारत’ के रूप में नहीं, बल्कि सिमेंट और लोहे से बनी कविता लगती है। यह न तो शहर से कटकर खड़ा है, न ही शहर में घुलकर अदृश्य होता है। यह वह मध्यवर्ती अवस्था है जिसे मार्टिन हाइडेगर dwelling कहता है, जहाँ मनुष्य केवल रहता नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के साथ संवाद करता है। यह भवन ध्यान खींचता नहीं, बल्कि ध्यान की माँग करता है।
कल 25 जनवरी को अर्थशिला, पटना का उद्घाटन हुआ। यह एक बहु-कला केंद्र है, जिसे कलात्मक अभिव्यक्तियों को सक्षम करने और रचनात्मक अनुभवों के क्यूरेशन हेतु डिज़ाइन किया गया है, जहाँ ऑडिटोरियम, बहु-स्तरीय दीर्घाएँ, बाल अनुभव केंद्र, वर्कशॉप प्लेस, पुस्तकालय, कैफ़े और क्राफ्ट स्टोर जैसे विविध स्थल समाहित हैं। दृश्य कला, रंगमंच, संगीत, नृत्य, साहित्य और सिनेमा के नियमित कार्यक्रमों के माध्यम से यह केंद्र कला को दर्शनीय वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक अनुभव के रूप में स्थापित करता है।
यह भवन अर्थशिला की सांस्कृतिक यात्रा का पाँचवाँ पड़ाव है, एक ऐसी यात्रा जो शहर दर शहर कला के लिए कला के नये स्थान रच रही है। इससे पहले अहमदाबाद (2021) में इसकी पहली आकृति उभरी, फिर शांतिनिकेतन और फिर दिल्ली व गोवा (2024) में समकालीन बहु-कला केंद्रों के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पटना में यह भवन उस यात्रा अगला कदम है।
मार्टिन हाइडेगर का “dwelling” (निवास/katoikein) का विचार उनके ‘Building Dwelling Thinking’ (1951) निबंध में निहित है, जहाँ वे इमारत को केवल घर नहीं “पृथ्वी पर लोगों का जीने का तरीका” मानते हैं। इसका अर्थ है प्रकृति, आकाश और मनुष्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करना, जिसे ‘काव्यात्मक रूप से जीना’ (poetic dwelling) कहा जाता है। क्या अर्थशिला पटना की वाल्तुकला में यह काव्यात्मक सामंजस्य है, जिसका स्वप्न मार्टिन हाइडेगर ने देखा था, या डेडालस ने देखा था या फिर इकारस ने?
शहर, शोर और एक मौन स्थापत्य
पटना एक ऐसा शहर है जहाँ इतिहास परतों में है-मौर्यकालीन स्मृति, औपनिवेशिक प्रशासन, समाजवादी राजनीति और आज की आधुनिक अव्यवस्था। ऐसे शहर में अर्थशिला का भवन एक अलग मौन है।
अमेरिकी वास्तुकला शिल्पी लुई कान (Louis Kahn) का कहना है “Architecture is the thoughtful making of space.” अर्थशिला इस कथन को आगे बढ़ाते हुए यह जोड़ती प्रतीत होती है कि वह विचारशीलता शोर से नहीं, मौन से जन्म लेती है। यह भवन अपने ठोस, लगभग खिड़की-रहित बाहरी रूप से शहर को यह नहीं बताता कि भीतर क्या है? वह केवल यह संकेत देता है कि भीतर कुछ घटित होता है, कुछ ऐसा, जिसे देखने से पहले भीतर उतरना होगा।
‘Culture on a Pedestal’ : अवधारणा नहीं, दृष्टि
अर्थशिला पटना के वास्तुशिल्पकी केंद्रीय अवधारणा Culture on a Pedestal है, इसे यदि सतही ढंग से देखा जाए, तो यह संस्कृति को ऊँचाई पर स्थापित करने का दावा लग सकता है। इसके आर्किटेक्ट सौरव गुप्ता की समझ में यह ‘पेडेस्टल’ किसी भव्यता या स्मारकीय अहंकार का प्रतीक नहीं है, बल्कि संस्कृति के लिए एक स्थिर आधार है। एक साधरणता का वास्तुशिल्प है यह – जंग लगे लोहे की जंग की तरह साधारण मगर सुरक्षात्मक।
यहाँ मुझे पियरे बोरद्यू का cultural field याद आता है, जहाँ प्रतिस्पर्धा में कला को जीवित रखने के लिए केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि संस्थागत संरचना भी मह्तवपूर्ण होती है। अर्थशिला का भवन वैसी ही संरचना है।
सामग्री : कच्चेपन की सौंदर्यशास्त्र
मेगास्थनीज़ ने अपनी कृति ‘इंडिका’ में प्राचीन पाटलिपुत्र के भवनों की भव्यता का वर्णन करते हुए लिखा था कि उनकी विशालता और स्थापत्य-सामर्थ्य को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन्हें मनुष्यों ने नहीं, बल्कि दैत्यों ने निर्मित किया हो।
मगर इस निर्माण के पीछे इस बार दैत्य नहीं हैं, बल्कि कुछ साधारण मनुष्य है…मगर कुछ अलग कल्पनाशीलता के साथ। इस भवन के निर्माण की कल्पना के पीछे अर्थशिला के संस्थापक संजीव कुमार, आर्किटेक्ट सौरव गुप्ता और कला निर्देशक रुचिरा दास का संयुक्त प्रयास है। संजीव कुमार की संस्था अर्थशिला है, जो उनके अन्य प्रयासों तक्षशिला, परिवर्तन, पहल, अर्थात् आदि का अलग विस्तार की तरह है।
कंक्रीट, कॉर्टन स्टील और काँच इन सामग्रियों का प्रयोग किसी फैशन के तहत नहीं, बल्कि ईमानदारी के तहत किया गया है। इस भवन के आर्किटेक्ट सौरव गुप्ता ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में इस भवन को कच्चेपन से निर्मित सौंदर्य ‘raw beauty’ कहा। यह ‘raw beauty’ वही है जिसे जर्मन वास्तुशिल्पी लुडविग मीस वैन डेर रोहे (Ludwig Mies van der Rohe) कहते हैं— “Less is more.” यह भवन यह दावा नहीं करता कि वह सुंदर है; वह केवल यह स्वीकार करता है कि वह जैसा है, वैसा ही पर्याप्त है।
भूमिगत रंगमंच : धरती में धँसी कला
इस भवन की सबसे निर्णायक वास्तुकला-गत उपलब्धि उसका चार स्तर नीचे धँसा हुआ ऑडिटोरियम और एम्फीथिएटर है। यह केवल तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि एक वक्तव्य है-ग्रीक एम्फीथिएटर की तरह। ग्रीक एम्फीथिएटर को धरती में खुदा हुआ बनाने का निर्णय केवल संरचनात्मक या ध्वनिकी सुविधा का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा मिथकीय और दार्शनिक सिद्धान्त निहित था। ग्रीक दृष्टि में धरती (Gaia) केवल भौतिक आधार नहीं, बल्कि स्मृति, समुदाय और सत्य की जननी थी; कला को उसमें उतारना उसे दैवी से मानवीय और व्यक्तिगत से सामूहिक अनुभव में रूपांतरित करना था। मिथकीय रूप से यह माना जाता था कि जब दर्शक धरती की गोद में बैठता है, तो वह देवताओं के नहीं, बल्कि पोलिस (नगर-समुदाय) के साथ एक साझा चेतना में प्रवेश करता है, जहाँ नाटक मनोरंजन नहीं, बल्कि नागरिक आत्मबोध बन जाता है।
रंगमंच को धरती के भीतर रखना भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का वह प्रसंग याद दिलाता है, जिसमें ‘पंचम वेद’ के रुप में नाट्य कला स्वर्ग की उँचाई से धरती पर अवतरित हुआ था। यहाँ कला ऊपर चढ़कर नहीं, बल्कि नीचे उतरकर जन्म लेती है। अर्थशिला का ऑडिटोरियम और एम्फीथिएटर धरती द्वारा शोर से, अव्यवस्था से और समय की तात्कालिकता से संरक्षित है।
यह संरक्षण उन्हें एकाग्रता और अंतरंगता प्रदान करती है, किंतु अर्थशिला का ऑडिटोरियम और एम्फीथिएटर मंच के आकार और अवस्थिति के कारण कुछ व्यावहारिक रंगमंचीय सीमाएँ और समस्याएं भी हैं। छोटे और संकीर्ण मंच पर नाटकों का मंचन करते समय दृश्य-विन्यास, गतिशीलता और तकनीकी प्रयोगों में कठिनाइयाँ सामने आती हैं।
पिछले वर्ष दिल्ली में भारंगम द्वारा मेरे नाटक ‘स्मॉल टाउन ज़िंदगी’ का मंचन, उसके विशाल सेट के कारण, अपेक्षाकृत छोटे मंचीय आकार वाले कमानी ऑडिटोरियम में संभव नहीं हो सका; परिणामस्वरूप उसका मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सम्मुख मंच पर करना पड़ा। यह उदाहरण बताता है कि समकालीन रंगमंच की व्यावहारिक ज़रूरतें पारंपरिक इतालवी या ग्रीक थियेटर संरचनाओं से कहीं आगे निकल चुकी हैं। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि अर्थशिला के ऑडिटोरियम मंच के वर्तमान स्वरूप में इस मंच पर हर प्रकार के नाटक का मंचन संभव नहीं होगा। आधुनिक रंगमंच की बहुरूपी, प्रयोगधर्मी और तकनीकी प्रकृति भविष्य में मंचीय पुनर्विचार की माँग अवश्य करेगी। मगर इस स्पेस का उपयोग अनेक कलात्मक तरीकों से संभव है, जो रंगमंच के कलाकारों के लिए एक चुनौती के साथ-साथ पुनर्कल्पना का अवसर भी प्रदान करेगा, क्योंकि हर मंच अपनी प्रकृति के अनुसार भिन्न प्रकार के नाट्य रूप और प्रस्तुति की माँग करता है।
ऊर्ध्वाधर यात्रा : शरीर और दृष्टि का अनुशासन
अर्थशिला पटना भवन की ऊर्ध्वाधर संरचना प्रत्येक तल त्रिकोणीय विभाजन के साथ गति और क्रियाशीलता को अलग करता है और दर्शक के शरीर को विशेष तरीके से अनुशासित करती है। जैसा कि मिशेल फूको (Michel Foucault) के heterotopia (विषम-स्थान) के सिद्धान्त में कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो समाज के सामान्य प्रवाह को रोककर वैकल्पिक समय और व्यवहार रचते हैं। मिशेल फूको का हेटेरोटोपिया समाज के भीतर ही मौजूद स्थान ही होते हैं, लेकिन अन्य सभी स्थानों से भिन्न या अलग-थलग या उनका विकल्प होते हैं। इन्हें ‘दुनिया के भीतर दुनिया’ कहा जा सकता है, जैसे कि कब्रिस्तान, जहाज, जेल या थिएटर, जो सामान्य स्थान-समय (space-time) के नियमों को तोड़ते हैं। अर्थशिला वैसी ही एक हेटेरोटोपिया का स्वप्न अपने भीतर रखती है, जहाँ समय धीमा हो जाता है, दृष्टि गहरी होती है और सामान्य स्थान-समय के नियम टूटते हैं।
प्रकाश : एक नैतिक निर्णय
अर्थशिला में प्रकाश सजावट भर नहीं है। कॉर्टन स्टील की फिन्स से छनता हुआ प्राकृतिक प्रकाश, छत से गिरती रोशनी और नियंत्रित कृत्रिम प्रकाश यह सब मिलकर यह तय करता है कि कहाँ देखना है और कहाँ ठहरना है।
पुन: लुई कान के शब्द में “Light to silence, silence to light.”। लुई कान वास्तुकला को भौतिकता से परे आत्मिक और रचनात्मक ऊर्जा के रूप में परिभाषित करता है। ‘मौन’ (Silence) सोच का क्षेत्र है, जबकि ‘प्रकाश’ (Light) उस रचनात्मक विचार को भौतिक रूप देने का माध्यम है। कान के लिए इमारतें इन दोनों के मिलन का स्थान हैं। अर्थशिला का वास्तुकला में प्रकाश भी वस्तु को नहीं, बल्कि स्थान के अनुभव को प्रकाशित करता है।
सेवाएँ : अदृश्य श्रम की राजनीति
जल, यांत्रिक, बैकअप सिस्टम सेवाओं का अदृश्य रहना, एक तरह का स्वायत्तता देता है। यह भवन यह नहीं चाहता कि दर्शक यह सोचे कि यह कैसे चलता है, बल्कि वह चाहता है कि दर्शक यह सोचे कि यह क्या उत्पन्न करता है।
पटना हमेशा से रंगमंच, संगीत और कवि-सम्मेलनों का अग्रणी शहर है। अर्थशिला उस परम्परा का सुचिंतित भविष्य के स्वप्न जैसा है, मगर यह भवन ऐसा कोई दावा नहीं करती….हाँ यह जरुर है कि वह विनम्र होकर उसके लिए एक स्थान बनाती है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था “Art awakens a sense of reality by establishing relationship between our inner being and the larger world.” टैगोर का मानना था कि कला केवल बाहरी दुनिया की नकल नहीं है। यह हमारे ‘भीतरी अस्तित्व’ (inner being) और ‘विशाल ब्रह्मांड’ (larger world) के बीच एक अंतरंग संबंध स्थापित करती है। अर्थशिला पटना का वास्तुशिल्प मनुष्य के उसी अंतरंग संबंध का भवन रुप है, न उससे अधिक, न उससे कम।
(समाप्त)

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