देवराज डकोजी:कला का आदिम अनुष्ठान
“…समय बीत जाता है, पर निशान शेष रहता है। शरीर मिट जाता है, पर आभास बना रहता है।”
देवराज डकोजी की कला इस क्षणभंगुरता और स्थायित्व के बीच के तनाव को प्रकट करती है। समय के एक दरार में एक डकोजी चित्र नहीं बनाते, बल्कि उत्खनन करते हैं। उनकी कला केवल चित्रण नहीं, बल्कि एक खुदाई है। एक आह्वान। एक ऐसी भाषा जो भुला दी गई थी, फिर भी जिसे अंत:करण पहचानता है।
डकोजी की कला-संरचना रुप या फार्म स्थिर नहीं होता। उनकी कृतियाँ हमें सिर्फ देखने के लिए नहीं, बल्कि याद करने के लिए आमंत्रित करती हैं। इसकि अमूर्तता में भी एक कथा होती है, इसकी बनावट में इतिहास समाया होता है और मौन के भीतर एक स्वर होता है।
जैसे रॉक शृंखला मानो स्थैर्य या समय का अवसादन। फीके रंगों में दबा हुआ गहन निंद्रित अतीत, जैसे पत्थर उस हाथ को याद करता है जिसने उसे कभी आकार दिया था।
और फिर प्राणमू शृंखला मानो सतह में गति का कंपन। उकेरी गई रेखाएँ स्थिर नहीं हैं, वे सांस लेती हैं, उच्छ्वास करती हैं, बदलती हैं। यह उद्भव का एक अनुष्ठान है, जहाँ आकृतियाँ पहचान और विस्मरण के बीच झूलती हैं। मानव, पशु, अदृश्य, पुरखों के प्रतिबिंब-सब हैं और नहीं हैं।
एक आह्वान है; दूसरा उसकी अभिव्यक्ति।
देवराज डकोजी भारतीय समकालीन कला में आदिम रूपों की खोज, सांकेतिक अमूर्तता, और प्राकृतिक एवं पौराणिक तत्वों से गहरे संबंध के लिए जाने जाते हैं। उनकी दो प्रमुख कृतियाँ— प्राणमू शृंखला (1990, रंग उत्कीर्णन) और रॉक शृंखला (1982, ऐक्रेलिक ऑन कैनवास), उनकी विकसित होती कलात्मक भाषा और वैचारिक चिंतन को दर्शाती हैं। इस लेख में, मैं दोनों शृंखलाओं की तुलना करूँगा और उनकी औपचारिक, विषयगत, और दार्शनिक विशेषताओं का विश्लेषण करूँगा, ताकि डकोजी की कला-दृष्टि की विशिष्टता को समझा जा सके।
1.संरचना: गति और संरचना
रॉक सीरीज़ (1982) की बनावट अधिक ठोस और एकात्मक है। यह पेंटिंग बड़े, सशक्त रूपों पर केंद्रित है, जो भूगर्भीय संरचनाओं या प्राचीन शिलालेखों की याद दिलाते हैं। इसकी संरचना गति से अधिक स्थायित्व और निरंतरता को दर्शाती है। रॉक सीरीज़ की रचना संगठित होते हुए भी जैविक है, जो प्रकृति की सहजता को दर्शाती है। चट्टानों का फैलाव कैनवास पर बेतरतीब प्रतीत होता है, फिर भी उनमें एक अंतर्निहित लय है, जो भूगर्भीय संरचनाओं जैसी लगती है। दो पैनलों का उपयोग निरंतरता और विभाजन की भावना को प्रबल करता है, यह समय के विखंडन और प्रवाह का प्रतीक हो सकता है। डाकोजी की रूप-सज्जा प्राकृतिक सौंदर्यबोध का पालन करती है, फिर भी यह अमूर्तता बनाए रखती है। चट्टानों के बीच की नकारात्मक जगह आस्तित्व और शून्यता का एक खेल बनाती है, जो ज़ेन उद्यानों या पारंपरिक भारतीय शैल-खुदाई वाले मंदिरों की संरचनाओं का आभास कराती है।
प्रणामु सीरीज़ (1990) का ढांचा वृत्ताकार या घेरने वाली रचना में विकसित होता है, जहाँ आकृतियाँ एक खाली केंद्रीय स्थान को घेरे रहती हैं। प्रणामु की संरचना एक वृत्ताकार प्रवाह में चलती है, जहाँ आकृतियाँ एक खाली मध्य बिंदु के चारों ओर व्यवस्थित होती हैं। यह गतिशील व्यवस्था एक लयबद्ध प्रवाह उत्पन्न करती है, जो अनुष्ठानिक नृत्यों, प्राचीन शिलाचित्रों, या स्वदेशी कथाओं में पाए जाने वाले ऊर्जा-चक्रों की याद दिलाती है। डाकोजी द्वारा बिखरे और परस्पर जुड़े रूप सहज, जैविक लय का सुझाव देते हैं, जो इस कृति की प्राकृतिक और मौलिक विषयवस्तु को सुदृढ़ करता है। उकेरे गए रेखाएँ अस्थिर, भावनात्मक और लगभग अराजक प्रतीत होती हैं, जिससे एक तात्कालिकता और कच्चे अभिव्यक्ति की भावना जागृत होती है। यह अंकन प्राचीन शिलाचित्रों की याद दिलाता है, जो प्रारंभिक मानव कला प्रवृत्तियों से एक सीधा संबंध स्थापित करता है।
2. बनावट और रेखांकन: अस्तित्व की मौलिकता
अंकन क्या है? भाषा का पहला संकेत या गति। रॉक सीरीज़ में रेखाएँ क्षणभंगुर नहीं, बल्कि भूगर्भीय प्रतीत होती हैं। यह केवल उकेरी गई आकृतियाँ नहीं, बल्कि समय की परतें हैं। मॉरिस मर्लो-पोंटी लिखते हैं: “हम केवल संसार को नहीं देखते; हम इसे छूते हैं, इसमें निवास करते हैं, इसके माध्यम से गति करते हैं।”
रॉक सीरीज़ की ब्रश स्ट्रोक्स में गहराई और बनावट है। वे सूखी ब्रश तकनीक, खुरचने, और संभवतः स्पंज का उपयोग करते हैं ताकि अपरदन, जमाव, और खनिज के बनावट का प्रभाव उत्पन्न किया जा सके। डाकोजी की चट्टानें केवल दृश्य नहीं, वे स्पर्शीय अनुभव को भी आमंत्रित करती हैं। रॉक सीरीज़ में ब्रश स्ट्रोक्स व्यापक और नियंत्रित हैं, जिससे एक मूर्तिकला जैसी गहराई मिलती है। पेंटिंग में उन्मत्त गति की बजाय एक ध्यानपूर्ण स्थिरता है, मानो ये चट्टानें समय की साक्षी हों। ई.एच. गोमब्रिच हमें याद दिलाते हैं: “एक चित्रकार का कार्य कुछ नया गढ़ना नहीं, बल्कि प्रकृति में पहले से मौजूद लय को पहचानना और उसे उभारना है।”
इसके विपरीत, परणामु में रेखाएँ उकेरी नहीं जातीं, वे प्रकट होती हैं, मानो किसी अनुष्ठानिक आह्वान से शून्य में प्रकट हुई हों। ये आकृतियाँ स्थिर नहीं, वे रूपांतरित होती रहती हैं, मिथक और स्वप्न की तरलता को प्रतिबिंबित करती हुईं।
विक्टर टर्नर द रिचुअल प्रोसेस में लिखते हैं: “अनुष्ठान एक रूपांतरण है, एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन।” प्रणामु में प्रवेश करना इसी परिवर्तनशीलता में प्रवेश करना है। उकेरी गई आकृतियाँ कंपन करती हैं, प्रवाह में हैं। ये केवल देखे जाने के लिए नहीं, बल्कि महसूस किए जाने के लिए हैं, इन्हें अनुभव किया जाना चाहिए।
प्रणामु की रेखा एक तात्कालिक स्मृति है। एक स्पंदित करने वाली अनुभूति। किसी चीज़ को खोने से पहले उसे उकेर लेने की अधीरता।डेविड लुईस-विलियम्स द माइंड इन द केव में सुझाव देते हैं: “गुफा चित्र अलंकरण नहीं, बल्कि आह्वान थे, उन चीज़ों को बुलाने का एक तरीका, जिन्हें शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।” इसी प्रकार डाकोजी की आकृतियाँ प्रणामु में अतीत और वर्तमान, अस्तित्व और लुप्ति के बीच झिलमिलाती हैं। वे केवल रूप नहीं, वे समय से भी प्राचीन किसी चीज़ के अवशेष हैं।
डाकोजी की उकेरने की तकनीक एक प्राचीन, लगभग शिलालेख जैसी बनावट पर बल देती है। उनकी रेखाएँ खुदी, खोदी, और घिसी हुई प्रतीत होती हैं, जिससे छवि में आदिम इतिहास का भाव समा जाता है। उनकी सतहें केवल दृश्य नहीं हैं; वे अनुभव करने के लिए आमंत्रित करती हैं। उकेरी हुई आकृतियों की खुरदरापन दर्शक से केवल देखने की नहीं, बल्कि महसूस करने की माँग करता है, जिससे यह कला एक अनुभव बन जाती है।
3. रंग पैलेट: पृथ्वी और ऊर्जा
डकोजी की रॉक सीरीज़ में ग्रे, काले और मिट्टी जैसे ओचर रंगों का संयमित उपयोग किया गया है। यह संयमित रंग योजना प्रकाश और छाया के सूक्ष्म प्रभावों को उजागर करती है, जो लिथोग्राफ या प्राचीन पेट्रोग्लिफ़ की टोनल विविधताओं के समान प्रतीत होती है। रंगों को सीमित करके डकोजी यह सुनिश्चित करते हैं कि दर्शक के अनुभव का केंद्रबिंदु रूप और बनावट ही रहे।
रोसलिंड क्राउस ने ‘द ओरिजिनैलिटी ऑफ द अवां-गार्द एंड अदर मॉडर्निस्ट मिथ्स’ (1985) में तर्क दिया है कि आधुनिक कला में रंग केवल सजावट नहीं, बल्कि कच्चे भावनात्मक अभिव्यक्ति के संकेत होते हैं। प्रणामु सीरीज़ में रंग ऐसे संकेतों की तरह हैं।प्रणामु सीरीज़ में रंग का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। डकोजी गहरे और पृथ्वी से जुड़े रंगों का उपयोग करते हैं जैसे जले हुए सिएना, जंग जैसा लाल, ओचर और चारकोल ब्लैक , जो प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों के प्राकृतिक रंगद्रव्यों की अनुगूंज उत्पन्न करते हैं। यह पैलेट अग्नि, रक्त और मिट्टी की स्मृति को जगाता है, वे मौलिक तत्व जो जीवन, बलिदान और पवित्र अनुष्ठानों से जुड़े हैं।
4. बनावट और माध्यम: उत्कीर्णन बनाम ऐक्रेलिक
वहीं, रॉक सीरीज़ में ऐक्रेलिक माध्यम समृद्ध, स्तरित बनावट प्रदान करता है, जिससे भौगोलिक गहराई का आभास होता है। चित्र अधिक विस्तारित प्रतीत होता है, मानो दर्शक किसी भव्य परिदृश्य का साक्षी हो, न कि केवल कुछ विशिष्ट आकृतियों का।
प्रणामु सीरीज़ में उत्कीर्णन तकनीक एक खोदाई की अनुभूति कराती है, जैसे किसी भूले हुए प्रतीक या स्मृति को उजागर किया जा रहा हो। खुरदरी उकेरी गई रेखाएँ गुफाओं की दीवारों या प्राचीन अभिलेखों की स्पर्शनीय गुणवत्ता की याद दिलाती हैं।
5. विषयगत विश्लेषण: प्रकृति, समय और स्मृति
इसके विपरीत, रॉक सीरीज़ एक स्मारक की तरह है, यह परिवर्तित नहीं होती, बल्कि स्थायी रूप में रहती है। यह समय के प्रवाह का जीवाश्मीकृत अवशेष है, अनुष्ठान के पश्चात की स्थिरता।
A. चट्टान का प्रतीक: स्थायित्व और परिवर्तन
गैस्टन बैशेलार्ड, अपनी पुस्तक ‘द पोएटिक्स ऑफ स्पेस’ में लिखते हैं:
“चट्टानें केवल अस्तित्व में नहीं होतीं, वे स्वप्न देखती हैं।” रॉक सीरीज़ में सतह समय के स्वप्न की तरह बन जाती है। यह किसी व्याख्या की माँग नहीं करती, यह बस मौजूद रहती है, विशाल और अडिग।
कला में चट्टानों को पारंपरिक रूप से स्थायित्व, समय और प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता है। भारतीय दार्शनिक परंपराओं में पत्थर और पर्वत आध्यात्मिक स्थिरता और शाश्वतता के प्रतीक माने जाते हैं।
लेकिन डकोजी की रॉक सीरीज़ इस प्रतीक में एक विरोधाभास प्रस्तुत करती है, ये चट्टानें भारी होते हुए भी शून्य में स्थगित प्रतीत होती हैं, स्थिर होते हुए भी उनमें गति का आभास होता है।
इसका संबंध गहरे समय (Deep Time) से है, एक अवधारणा जिसका अध्ययन भूवैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने किया है। इन चट्टानों की सतहों पर दिखने वाली परतें और घिसाव करोड़ों वर्षों की यात्रा का संकेत देते हैं।
B. पशु प्रतीकवाद: पवित्र और जंगली
डकोजी की रचनाएँ इन पौराणिक धारणाओं को पुनः प्रारंभिक चेतना से जोड़ने का प्रयास करती हैं, जहाँ मानव और गैर-मानव चेतना के बीच की सीमाएँ घुलने लगती हैं। प्रणामु सीरीज़ में बैल, पक्षी और सरीसृप जैसे जानवर गहरे प्रतीकात्मक अर्थ रखते हैं। बैल शक्ति, उर्वरता और बलिदान का प्रतीक है, जैसा कि मेसोपोटामिया और सिन्धु घाटी सभ्यता में देखा जाता है। पक्षी आध्यात्मिकता और दिव्यता से संवाद का प्रतीक हैं। यह कार्य रूपांतरण के स्थान को दर्शाता है, जहाँ दर्शक एक प्रतीकात्मक दीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं, जो उन्हें पूर्वजों की स्मृति और प्रकृति की मौलिक शक्तियों से जोड़ती है।
6. संदर्भीय विश्लेषण: भारतीय सौंदर्यशास्त्र और वैश्विक आधुनिकतावाद
डकोजी का कार्य भारतीय कलात्मक परंपरा से प्रेरित है, विशेषकर अजंता की गुफा चित्रकला और गोंड व वारली जैसी जनजातीय कला से। इन कलाओं में प्रतीकों और प्रवाही रेखाओं के माध्यम से कथात्मकता प्रस्तुत की जाती है। स्टेला क्रामरिश, अपनी पुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग इंडिया’ज सैक्रेड आर्ट’ (1956) में लिखती हैं: “भारतीय कला में छवि केवल वास्तविकता का चित्रण नहीं, बल्कि उसकी गहनतम सच्चाई का प्रकटीकरण होती है।” डकोजी की अमूर्तता भी इसी सिद्धांत का अनुसरण करती है, उनकी आकृतियाँ प्रकृति की प्रतिकृति नहीं, बल्कि उसके सार को पकड़ने का प्रयास करती हैं।
साथ ही पॉल क्ले और जोआन मिरो जैसे पश्चिमी अमूर्त कलाकारों की तरह, डकोजी भी प्राकृतिक रूपों से एक सार्वभौमिक दृश्य भाषा विकसित करते हैं। क्लेमेंट ग्रीनबर्ग, ‘मॉडर्निस्ट पेंटिंग’ (1960) में लिखते हैं: “सच्ची अमूर्तता सांस्कृतिक विशिष्टता से परे होती है।” डकोजी की प्रणामु सीरीज़ इस सिद्धांत को मूर्त रूप देती है, यह कला व्यक्तिगत भी है और सार्वभौमिक।
इन विषय वस्तु का मौलिक स्त्रोत देवराज डकोजी का जीवन है। धर्माजी गुडेम के एक शांत गाँव में, जहाँ पश्चिम गोदावरी की हरी-भरी सांसें हवाओं में घुली होती हैं, एक बालक (देवराज डकोजी) भोर में चलता है और उसकी उँगलियाँ ओस में भीगे पत्तों को छूती हैं। हर सुबह, स्कूल जाने से पहले देवराज डकोजी अपने पिता के लिए जड़ी-बूटियाँ चुनते हैं, एक आयुर्वेद चिकित्सक, जिनके हाथों में प्राचीन ज्ञान का भार समाया है। कुचली गई पत्तियों की गंध, छाल की बनावट, प्रकृति की मूक स्पंदनशीलता, यह सब उनके भीतर समा जाता है, एक अव्यक्त लय बनकर। वर्षों बाद जब वे एक कलाकार बने, तो यह स्मृतियाँ उनके भीतर जीवंत बनी रहीं। प्रकृति उनकी रेखाओं में झलकती है, उन कोमल आकृतियों में जो जड़ों की तरह भूमि को खोजती हैं।
निष्कर्ष -मौन की भाषा
मेरे लिए दकोजी की कला का अंतिम बिंब ऐसा है जैसे कोई हाथ पत्थर पर एक निशान उकेरता है, या कोई रेखा खींची जाती है, फिर विलीन हो जाती है, जहाँ समय आगे नहीं बढ़ता, बल्कि गोल घूमता है, मुड़ता है, लौटता है। प्रणामु में हमें प्राचीन आकृतियों की साँसें झलकती हैं। रॉक में हम उस भार को महसूस करते हैं जो पीछे छूट चुका है।
दकोजी की कला दो भाषाओं में बोलती है—एक हवा में फुसफुसाती है, घुल जाती है; दूसरी पत्थर में धँस जाती है, खोदने की प्रतीक्षा में। दोनों हमें याद दिलाती हैं कि हम भी समय में मात्र संकेत हैं। कि हम भी केवल निशान छोड़ जाएँगे। सतह पर एक खरोंच। मौन और स्मृति के बीच अटकी एक साँस।
मन में प्रश्न आता है कि जब संकेत बीत जाता है, तब क्या शेष रहता है?
हम कह सकते हैं कि“अनुष्ठान एक क्रिया है, मिथक एक संज्ञा।” प्रणामु एक क्रिया है, यह गतिमान है, साँस लेती है, परिवर्तन में स्पंदित होती है। रॉक एक संज्ञा है, स्थिर, अडिग, इतिहास में जड़ी हुई।
दकोजी की कृतियाँ वस्तुओं का चित्रण नहीं हैं। वे चीजों को देखने के तरीकों का चित्रण हैं। रॉक समय, धैर्य और उस अवशेष को देखता है जो संकेत मिट जाने के बाद भी बना रहता है। प्रणामु मिथक, गति और उस रिक्ति को देखता है जो मानव और पशु, उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच विद्यमान है।
( समाप्त)
