Basu Chatterjee
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सारा आकाश: बासु चटर्जी की सिनेमा का विरोधाभास

बासु चटर्जी को साधारण मध्यमवर्गीय जीवन का सहज फिल्म निर्देशक माना जाता है और उनकी पहली फिल्म “सारा आकाश” (1969) को इसका उदाहरण माना जाता है, मगर बासु चटर्जी के निर्देशन और फिल्मों का एक विरोधाभास यह है कि निर्देशक की कहन शैली उतनी साधारण नहीं है, बल्कि लाउड और गैर सिनेमाई है। इस बात को उनकी पहली फिल्म सारा आकाश (1969) से समझते हैं। इस विरोधाभास को समझने से पहले फिल्म के कथानक और थीम को समझना आवश्यक है।टी. एस. एलियट की पंक्तियाँ हैं— 
 
“This is the way the world ends, not with a bang but a whimper.”
(यह संसार इस प्रकार समाप्त होता है, विस्फोट से नहीं, बल्कि एक धीमी सिसकी से।)
 
सारा आकाश में भी विस्फोट नहीं है, केवल घुटन है। यह फिल्म राजेंद्र यादव के उपन्यास पर आधारित थी, जिसका पहला नाम ‘प्रेत बोलते हैं’ था, जिसे 1960 में बदलकर ‘सारा आकाश’ किया गया। इसमें एक नवविवाहित दंपत्ति की अनकही चुप्पियाँ ही उनके दांपत्य जीवन का सबसे बड़ा संवाद बन जाती हैं । बासु चटर्जी की सारा आकाश को देखते हुए, ऐसा लगा मानो समय की कोई पुरानी धूल भरी खिड़की खुल गई हो, जहाँ से पारिवारिक संरचना के जटिल रेशे धीरे-धीरे उजागर हो रहे थे। नहीं चाबी दी गयी घड़ी हो, फोटो खिलाने का विलुप्त पारिवारिक उत्सव हो या गायब हो चके लालटेन – ये सब दिखता है। यह सही है कि बासु चटर्जी के दृश्य न तो पूरी तरह व्यंग्य हैं, न पूरी तरह त्रासदी, वे जीवन के उन सूक्ष्म क्षणों को पकड़ते हैं, जहाँ एक धीमा संघर्ष निरंतर चलता रहता है।
 
सारा आकाश के आरंभ में आगरा की घुमावदार गलियाँ, जहां हर मोड़ पर जीवन की धूल जमी थी  और बीच में झाँकता ताजमहल है, क्या यह प्रेम का प्रतीक था, या किसी स्त्री की नियति का जड़ रूप, जिसका सौंदर्य तो पूजनीय था, मगर जो स्वयं अपने भीतर कैद थी? यह फिल्म भारतीय मध्यम वर्ग की मानसिकता का प्रतिबिंब है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता की टकराहट धीरे-धीरे किसी अव्यक्त दुःख में बदल जाती है।
 
समर ठाकुर (राकेश पांडेय) और प्रभा (मधु चक्रवर्ती) की शादी एक समझौता है, एक ऐसी व्यवस्था जहाँ भावनाओं की गूंज नहीं, केवल रीति-रिवाजों की कठोरता है। विवाह यहाँ एक परंपरा है, एक अनिवार्यता, जो व्यक्ति की आकांक्षाओं को निगल जाती है।जैसा कि टी. एस. एलियट ने लिखा था—
 
“Humankind cannot bear very much reality.”
(मानवता बहुत अधिक यथार्थ को सहन नहीं कर सकती।)
 
यही इस फिल्म की त्रासदी थी, समर यथार्थ को सहन नहीं कर सकता था। विवाह की जटिलता, स्त्री के मौन का भार, उसकी अस्वीकृति के पीछे छिपी पीड़ा—यह सब उसके लिए इतना असहनीय था कि वह अपने ही अहंकार में कैद हो गया।
 
“मैं घर से भागना चाहता हूँ, पर कहाँ जाऊँ?” – राजेंद्र यादव (सारा आकाश)
 
समर के मन में खदबदाता असंतोष, उसका हर सन्नाटा मानो किसी अजाने युद्ध की तैयारी हो। विवाह, जो सामाजिक संरचना में एक पवित्र बंधन कहा जाता है, यहाँ एक कैद था—दोनों के लिए। समर का आक्रोश, प्रभा की खामोशी, और उस घर की दीवारों में गूंजती तानों की अनवरत गूंज, सब मिलकर एक ऐसी सिनेमाई बनावट गढ़ते हैं , जहाँ दृश्य शब्दों से अधिक मुखर होते हैं।
 
मध्यमवर्गीय परिवारों में स्त्रियाँ सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे उस हर चीज़ का बोझ ढोती हैं, जो ‘परिवार’ के नाम पर उनकी इच्छाओं पर थोप दी जाती हैं। दीना पाठक का किरदार, समाज द्वारा रची गई उस संरचना का जीवंत रूप था, जो परंपरा के नाम पर स्त्री को जकड़ती है।
 
स्त्री का शोषण, मध्यमवर्गीय घरों में व्याप्त संस्कारों के नाम पर उसे सहेजकर रखा गया एक खोखला सम्मान और पुरुष का अंतहीन अहंकार है और इन सबका टकराव हमें उस स्थिति में ले जाती है, जहाँ पात्र अपने संवाद से अधिक अपनी चुप्पियों में मुखर होते हैं।
 
और फिर, जब समर को अपनी गलती का एहसास होता है, तो क्या यह किसी सुधार की आहट है या केवल समाज द्वारा तय की गई ‘सहमति’ में लौटने का एक नया तरीका?
 
सामर का संघर्ष सिर्फ वैवाहिक नहीं, अस्तित्वगत है। उसकी घुटन केवल एक कमरे तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरे सामाजिक ढांचे में व्याप्त है, जहाँ एक युवा पुरुष की महत्वाकांक्षाएँ परिवार की जिम्मेदारियों के नीचे दब जाती हैं। सारा आकाश का यह सामाजिक पाठ ऋषिकेश मुखर्जी की अनुपमा (1966) और बासु भट्टाचार्य के अनुभव (1971) से मेल खाता है, जहाँ नायकों की लड़ाई बाहरी दुनिया से अधिक, स्वयं से होती है।
 
ग्रीक त्रासदी में सोफोक्लीज़ की एंटीगोन को अपने ही परिवार और व्यवस्था से लड़ना पड़ा था, उसके न्याय की परिभाषा पितृसत्ता की परिभाषा से मेल नहीं खाती थी। सारा आकाश की प्रभा भी उसी संघर्ष की एक नई प्रतिध्वनि थी—उसका मौन उसका विद्रोह।
 
 सौंदर्य -दृश्य और स्थान की भाषा 
 
सारा आकाश की सिनेमेटोग्राफी के.के. महाजन ने की थी, और यह उनकी पहली फ़िल्म थी। महाजन को उनकी ब्लैक-एंड-व्हाइट सिनेमेटोग्राफी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। फिल्म की शूटिंग आगरा के राजा की मंडी में, लेखक राजेंद्र यादव के पुश्तैनी मकान में हुई थी, जो महाजन के अनुसार अपने आप में एक ‘रेडीमेड सेट’ था और मुंबई के किसी भी सेट से बेहतर था। चटर्जी की नज़र सिर्फ कहानी कहने में ही नहीं, बल्कि स्थान को भी एक किरदार की तरह इस्तेमाल करने में माहिर थी। यह घर केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का रूपक था, जहाँ व्यक्ति अपनी पहचान और इच्छाओं के लिए संघर्ष कर रहा था।
 
बासु चटर्जी का सिनेमा दृश्य की तीव्रता में नहीं, बल्कि उसकी अंतर्निहित सहजता में साँस लेता है। ‘सारा आकाश’ में हमें शहर की रौनक नहीं, बल्कि आगरा के तंग मकानों की निराश्रय दीवारें मिलती हैं। यहाँ भव्य सेट्स नहीं, बल्कि वास्तविक लोकेशनों की अनुभूति है, राजेंद्र यादव का पारिवारिक घर जो स्वयं एक मौन किरदार बनकर उभरता है।
 
यह फिल्म श्वेत-श्याम फ्रेम में कैद एक वैवाहिक त्रासदी है, जहाँ भावनाएँ भी प्रकाश और अंधकार के मध्य संतुलन खोजती हैं। सिनेमेटोग्राफर के. के. महाजन का कैमरा रूखेपन में सौंदर्य ढूँढता है, भावनाओं की जटिलता को स्थिर फ्रेमों में पकड़ता है। यह कैमरा दिखावे से इनकार करता है, पात्रों की असहज चुप्पियों में प्रवेश करता है।
 
यह फिल्म किसी खाली गलियारे में पड़े पुराने झरोखे की तरह लगती है, जहाँ समय का एक हिस्सा थमा हुआ है और दूसरा लगातार सुलग रहा है। कैमरा स्थिर नहीं है, वह टोह लेता है, देखता है, कभी दीवारों से झाँकता है तो कभी चेहरे पर अटक जाता है। के. के. महाजन की ब्लैक-एंड-व्हाइट सिनेमैटोग्राफी, रोशनी और अंधेरे के बीच एक धुंधला अंतर बनाती है, जहाँ भावनाएँ आधी छुपी हैं, आधी उभरती हैं।
 
रात गहरी हो, और स्क्रीन पर चमक रहा हो एक शहर – आगरा, अपनी गलियों में एक अंतहीन भटकाव समेटे। शहर की सँकरी गलियाँ, छतों के बीच पसरी धूप, और मन के अंदर उमड़ती-घुमड़ती घुटन सी है -बासु चटर्जी की सारा आकाश (1969) , जिसमें यथार्थ अपनी स्याह-सफेद छायाओं में आकार लेता है। हर फ्रेम में एक गहरी चुप्पी थी, एक मौन विद्रोह, जिसे महसूस किया जा सकता था, पर शब्दों में बांधना मुश्किल था।
 
 सिनेमा परिदृश्य और मध्यम सिनेमा 
 
सारा आकाश केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि मध्यम सिनेमा की उस धारा के प्रारंभ का हिस्सा है, जो बॉलीवुड की चमक-दमक और समानांतर सिनेमा की गंभीरता के बीच पुल बनाता है। इसे मिडिल सिनेमा कहा जाता है, जिसमें न तो कला सिनेमा की सघनता थी और न ही व्यावसायिक सिनेमा की भव्यता, बल्कि इसके केंद्र में थी रोज़मर्रा की साधारण ज़िंदगी। धारा 1970 के दशक में उभरी और बासु चटर्जी, हृषिकेश मुखर्जी और सई परांजपे जैसे निर्देशकों ने इसे अपनी पहचान दी। यह यह न तो पूरी तरह व्यावसायिक है, न ही पूरी तरह कलात्मक; यह अपने समय की मध्यमवर्गीय बेचैनी का सिनेमाई अनुवाद है। बासु चटर्जी का समय वह दौर था जब सिनेमा दो ध्रुवों में बँटा था, एक तरफ मुख्यधारा की भव्यता थी, दूसरी ओर कला सिनेमा की नीरस कठोरता। चटर्जी ने इन दोनों के बीच एक पुल बनाया, जहाँ रोजमर्रा के संघर्ष नायक बन गए और साधारण जीवन की सूक्ष्म हलचलों में नाटकीयता खोजी गई।‘सारा आकाश’ से लेकर ‘पिया का घर’ (1972) तक, उनकी फिल्मों में मध्यमवर्गीय अस्तित्व का संघर्ष दर्ज है -छोटी-छोटी इच्छाएँ, अपरिभाषित दुख, और ठहरे हुए जीवन।
 
‘सारा आकाश’ उसी मध्यम सिनेमा की नींव रखती है, जिसे आगे चलकर ‘रजनिगंधा’ (1974), ‘छोटी सी बात’ (1976) और ‘खट्टा मीठा’ (1978) ने विस्तार दिया। यह सिनेमा न तो पूरी तरह गंभीर था, न पूरी तरह हल्का—यह हमारे ही जीवन की प्रतिध्वनि था। यह उन लोगों की कहानियाँ कहता था जो महलों में नहीं, किराए के मकानों में रहते थे; जिनके सपने हवाई नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़े होते थे।
 
1969 का यह वर्ष भारतीय सिनेमा में परिवर्तन की गवाही देता है। ‘उसकी रोटी’ (1970), ‘भुवन सोम’ (1969) के साथ ‘सारा आकाश’ ने न्यु वेभ (Indian New Wave) को जन्म दिया। यह दर्शकों को बड़े-बड़े सेट्स से हटाकर गलियों की वास्तविकता में ले आई। लेकिन यह सिनेमा लम्बे समय तक नहीं टिक सका, जो 1980 और 1990 के दशक में बॉलीवुड ने कल्पना की उड़ान भर ली, और मध्यम सिनेमा धीरे-धीरे पीछे छूट गया।
 
बासु चटर्जी भी इस बदलाव के बाद ‘राजनी’ और ‘ब्योमकेश बक्शी’ जैसे टेलीविज़न शो की ओर मुड़ गए। लेकिन उनके दृश्य हमेशा जिंदा रहेंगे, हर उस खिड़की में जहाँ सूरज की किरणें प्रवेश नहीं कर पातीं, हर उस कमरे में जहाँ दीवारों से बातें होती हैं।
 
 बासु चटर्जी की शैली और विरोधाभास 
 
बासु चटर्जी की फिल्मों की खासियत है—साधारणता में छिपा सौंदर्य। वे भव्य सेट्स और चमकदार रंगों के बजाय यथार्थवादी वातावरण, सहज कैमरा मूवमेंट और आम लोगों की कहानियों को तरजीह देते थे। उनकी सिनेमाई भाषा सत्यजित रे की नवयथार्थवादी शैली और बांग्ला साहित्य के हल्के-फुल्के हास्य से प्रेरित है। लेकिन इसमें एक विरोधाभास भी है, उनकी कहन-शैली उतनी साधारण नहीं है, जितनी पहली नज़र में लगती है। इसे समझने के लिए उनकी पहली फिल्म सारा आकाश (1969) एक आदर्श उदाहरण है।
 
“सारा आकाश” कोई महाकाव्यात्मक कथा नहीं है, बल्कि एक बंद कमरे में फंसे दो लोगों के बीच घुटती हुई चुप्पी है। लेकिन यही चुप्पी समाज में जड़ जमाए पितृसत्ता, असमान विवाह-संबंधों और दबी इच्छाओं का शोर बन जाती है। बासु चटर्जी इस चुप्पी और शोर के द्वंद्व को हर दृश्य में पकड़ने की कोशिश करते हैं, मगर हर बार सफल नहीं हो पाते।
 
फिल्म की शुरुआत का विवाह दृश्य विभिन्न दृश्यों का एक लाउड कोलाज है-कान चुभने वाले संवाद हैं और और अराजक कट्स। बेटी के शादी हुए कर्ज को उतारने के लिए बेटे की शादी की बात हो या छोटी बहु के आने के बाद मुक्ति की बात हो- ये सब रोज़मर्रा की ज़िंदगी से लिए गए संवाद तो हैं, मगर प्रस्तुतिकरण में अनावश्यक लाउडनेस आ जाती है। एंड्रे बाज़ां ने लिखा था, “सिनेमा का मूल स्वभाव उसकी दृश्यात्मकता में है, न कि संवादों के अतिरिक्त प्रयोग में” (बाज़ां, What is Cinema?, 1958)। लेकिन यहाँ संवाद इतने प्रभावी हैं कि कई जगह दृश्य माध्यम पीछे छूट जाता है।
 
उपन्यास के आंतरिक संवाद और आत्मसंघर्ष को सिनेमा के चित्रात्मक भाषा में ढालना कठिन काम अवश्य है। उपन्यास में ससुराल की तारीफ में शहर भर साइकिल घुमाने का दृश्य जिस जीवंतता के साथ खुलता है, वह फिल्म में उस तरह उभर नहीं पाता। यहाँ संवाद की आवश्यकता थी, मगर संवाद है ही नहीं, और जहाँ बिना संवाद के दृश्य के माध्यम से बात कहनी थी, वहाँ भर-भर के लाउड संवाद हैं। यह संवाद की असहजता कहीं न कहीं राजेंद्र यादव के उपन्यास की भाषा से भी उपजी है। मजे की बात यह है कि संवाद का मोह इतना अधिक है कि जहाँ चरित्र बोल नहीं सकता और चुप है, वहाँ भी उसके मन की बातें सुनाई जाती हैं। इस कारण निर्देशक फिल्म में कई जगह गैर सिनेमाई हो गया है।
समाज बदलने के भाषण वाला दृश्य, और बैंड-बाजे से भागने वाला दृश्य, दोनों मिलकर इस बात की ओर संकेत करते हैं कि बासु चटर्जी अभी दृश्य माध्यम को लेकर पूरी तरह आत्मविश्वास में नहीं थे। संवाद की प्रमुखता, और कैमरे की सहजता का अभाव, यह दर्शाता है कि इस फिल्म में वे अभी अपनी सिनेमाई भाषा की खोज में थे। शायद यही कारण है कि कई दृश्यों में शब्द अधिक दिखते हैं और दृश्य पीछे रह जाते हैं। यह उनके शुरुआती दौर का एक ऐसा प्रयास था, जहाँ वे सिनेमा की सादगी और सहजता को पकड़ने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
 
“सारा आकाश” में संवादों की प्रमुखता और कैमरे की सहजता की कमी यह दर्शाती है कि बासु चटर्जी अभी अपने सिनेमाई स्वरूप को गढ़ने की प्रक्रिया में थे। शायद यही कारण है कि कई दृश्यों में शब्द अधिक प्रभावी दिखते हैं और दृश्य पीछे रह जाते हैं। यह उनका एक शुरुआती प्रयोग था, जहाँ वे सिनेमा की सादगी और सहजता को पकड़ने के लिए संघर्ष कर रहे थे। हालाँकि, बाद की फिल्मों में भी यह प्रवृत्ति बनी रही, बस थोड़ा और परिष्कृत होकर। साथ ही परिष्कार के साथ चरित्र का यथार्थ के बजाए फिल्मी अधिक हो गये, जो शायद व्यवसायिक सिनेमा के दवाब का परिणाम था। जीन मित्री ने लिखा था—”सिनेमा शब्दों का माध्यम नहीं, छवियों का माध्यम है, और जब छवियाँ खुद बोलने लगें, तभी फिल्म सच में जीवंत होती है” (मित्री, The Aesthetics and Psychology of the Cinema, 1963)।
 
फिल्म वहाँ भली लगती है, जहाँ संवाद नहीं, केवल दृश्य बोलते हैं। मगर ऐसे क्षण बहुत कम हैं। फिल्म के उत्तरार्ध में जब संवाद कम हो जाते हैं और दृश्य अधिक प्रभावी होते हैं, तब फिल्म अधिक सहज और प्रभावशाली लगती है। यही वे क्षण हैं, जहाँ बासु चटर्जी की सिनेमाई भाषा आकार लेती दिखती है मगर इसके विकास पर आगे भी ध्यान नहीं दिया।
 
मेरी दृष्टि में सारा आकाश का कथ्य किसी खुले आकाश की तरह नहीं लगता, बल्कि एक छोटे से कमरे की बंद खिड़की से झाँकते हुए आसमान के टुकड़े की तरह प्रतीत होता है, जहाँ अनगिनत संभावनाएँ हैं, पर वे अभी पूरी तरह साकार नहीं हुई हैं। यह कोई ‘फाइनल आंसर’ देने वाली फिल्म नहीं होनी चाहिए थी, बल्कि इसे एक प्रश्न होना चाहिए था—जिसका उत्तर हर पीढ़ी को अपनी परिस्थितियों में खोजना था।
 
क्या समर और प्रभा का संघर्ष समाप्त हो गया? या यह बस एक अस्थायी ठहराव था? शायद, इस प्रश्न का अनुत्तरित रहना ही इसका सबसे बड़ा उत्तर था। सारा आकाश के कथ्य की आत्मा उत्तरों से अधिक प्रश्नों में थी, और इसकी प्रभावशीलता इन्हीं प्रश्नों के अनुत्तरित रहने में थी। मगर एक सुखद अंत रूपी उत्तर को चुनकर पहले राजेंद्र यादव और बाद में बासु चटर्जी इस कथ्य की व्यापक संभावनाओं से चूक गए।
 
( समाप्त)

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