Laxman Aelay
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डिकोडिंग लक्ष्मण ऐले: ‘गांधी’ पेंटिंग | दृश्यात्मकता और द्वंद्ववाद

लक्ष्मण एले
पेंटिंग की शक्ति के बारे में एक ग्रीक कथा है, जो प्लिनी के “Natural History” में वर्णित है। यह कहानी पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के दो महान ग्रीक चित्रकारों ज़ियक्सिस (Zixis)और पार्हासियस (Parhasius) के बीच एक प्रतियोगिता की है। इस प्रतियोगिता में ज़ियक्सिसऔर पार्हासियस ने यह साबित करने की कोशिश की कि कौन सबसे यथार्थवादी चित्र बना सकता है। (संदर्भ-1)
 
ज़ियक्सिस ने ऐसा चित्र बनाया जिसमें अंगूर इतनी वास्तविकता से चित्रित किए गए थे कि पक्षी उन्हें देखकर आकर खाने लगे। दूसरी ओर पार्हासियस का चित्र एक पर्दे के पीछे छिपा कर रखा, जब पार्हासियस पर्दा हटाना का प्रयास किया, तब उसे यह पता चला कि पर्दा खुद एक पर्दे का चित्र था। इस खुलासे ने ज़ियक्सिस को हार मानने पर मजबूर कर दिया, क्योंकि उसने स्वीकार किया कि पार्हासियस ने उसे धोखा दिया, जबकि उसने केवल पक्षियों को धोखा दिया था। यह कथा चित्रकला की अद्वितीय दृश्य शक्ति को रेखांकित करती है, जो शब्दों से परे जाकर वास्तविकता का अनुभव कराने में सक्षम होती है। लक्ष्मण ऐले की पेंटिंग ‘गांधी’ भी इसी ताकत से इतिहास और समाज के अकथित का द्वंद्वतात्कमक चित्रण करता है।
 
“जिस तरह से हम चीजों को देखते हैं, वह इस बात से प्रभावित होता है कि हम क्या जानते हैं या क्या मानते हैं।” ( संदर्भ-2) और यह देखने की तकनीक ‘शक्ति या सत्ता की गतिशीलता’ या द्वंद्व को संपूर्ण व्यापकता में प्रकट करने में सक्षम है।
Laxman Aelay की पेंटिंग ‘गांधी’ भी एक दृश्य कथा तकनीक की तरह है, जो एक दृश्य-इतिहासलेखन की तरह काम करता है। यह राष्ट्रीय नेतृत्व की पारंपरिक कथाओं पर सवाल उठाती है और श्रमिक वर्ग और हाशिए के समुदायों के योगदान पर एक अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। ऐले के गांधी में रेखाओं और विरोधाभासी टोनल वैल्यूज़ के प्रयोग से गांधी और ग्रामीण पात्रों का चित्रण होता है, जो भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति के साथ उनके संबंधों को उजागर करता है।
 
प्रतीकात्मकता और आइकनोग्राफी
 
‘गाँधी’ पेंटिंग में प्रतीकात्मकता और आइकनोग्राफी मह्त्वपूर्ण हैं। पेंटिंग में महात्मा गांधी का चित्रण पृष्ठभूमि में उभरता है। पीछे गांधी की दृष्टि निरपेक्ष और स्थिर है, जैसे कि वे ग्रामीण जनसमूह की निगरानी कर रहे हों। इस चित्र-व्यवस्था को उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांत के दृष्टिकोण से देखा जा सकता है, जो दृश्य संस्कृति में राष्ट्रीय नेताओं के प्रतिनिधित्व को समझने की कोशिश करता है। ऐले की यह प्रस्तुति गांधी को दी जाने वाली सरल नायकत्व को चुनौती देती है और उनके आदर्शों का अनुसरण करने वाले ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की यथार्थता पर केंद्रित होती है।
 
पेंटिंग के अग्रभाग में दिखाए गए पात्र गहरे या काले रंगों में चित्रित हैं, जो संभवतः किसान या श्रमिक हैं और उनकी सफेद पोशाक एक तीव्र विरोधी प्रभाव उत्पन्न कर रहे हैं। इन पोशाक की सिलवटों और श्रमिकों की खुरदरी त्वचा का बारीकी चित्रण श्रम को उजागर करता है, जो गांधीवादी दर्शन के केंद्र में है। यह विरोधी तीव्र प्रभाव श्रमिकों के अस्तित्व की इस विरोधाभास को उजागर करता है कि वे गांधी के आंदोलन के माध्यम से सशक्त हुए हैं, फिर भी इतिहास के अंधेरों में छिपे हुए हैं और इसलिए उनके चेहरे गुमनाम और अस्पष्ट हैं। इनके पैरों के नीचे कांटे और नरकनुमा दशा है , मगर फिर भी वे वाद्ययंत्र बजाते हुए किसी उत्सव में है। वे गोलाकार वाद्ययंत्र पकड़े हुए हैं, जिसे करीब से देखने पर अंबेडकर के चित्र की तरह प्रतीत होती हैं और एक तरह से गांधीवादी आदर्शों और दलित समुदायों की आकांक्षाओं के बीच संवाद का प्रतीक हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गांधी और दलित अधिकारों के बीच चल रही चर्चाओं और भारत में जाति एवं वर्ग के जटिल अंतर्संबंधों को प्रतिबिंबित करता है।
 
मगर गांधी की लगभग भूत जैसी असांसारिक या अलग-थलग छवि ग्रामीण श्रमिकों की यथार्थवादी और जमीनी प्रस्तुति के विपरीत है। यह विपरीत प्रस्तुति आदर्शवादी नेतृत्व एवं एक आंदोलन को बनाए रखने वाले जमीनी स्तर की मेहनत के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। ग्रामीण श्रमिक न केवल अंबेडकर के चित्र को पकड़े हुए हैं, बल्कि गांधी के आदर्शों के भार को भी थामे हुए दिखते हैं, जो इस बात का दृश्य प्रतीक है कि कैसे कामकाजी वर्ग पर राष्ट्रीय नेताओं के दृष्टिकोण को वास्तविक बनाने का बोझ डाला जाता है।
 
एले की पेंटिंग गांधी को एक विशाल लेकिन अमूर्त आकृति के रूप में चित्रित करती है, जो भारतीय इतिहास में उनकी सर्वव्यापकता का सुझाव देती है। दूसरी तरफ सामाजिक असमानताओं को समाधान करने में उनकी भूमिका पर सवाल उठाती है। अग्रभाग के किसान गांधी के व्यापक दृष्टिकोण में भाग लेते हुए भी उनसे अलग-थलग दिखते हैं, जो उनके निरंतर हाशिए पर होने का प्रतीक है।
 
स्थान और संरचना का उपयोग
 
पेंटिंग में ग्रामीण श्रमिकों को एक समूह या एकाश्म रूप से चित्रित किया गया है, जो उनके एकजुटता की भावना को दर्शाता है और उनके स्वतंत्र आस्तित्व के अभाव को भी। इस चित्र में गांधी का सिर बड़ा और न्यूनतम रेखाओं में खींचा गया है, जो उनके ऊपर तैरता हुआ प्रतीत होता है और जमीनी स्तर के काम से उनकी दूरी को दिखाता है। इस संरचना के माध्यम से एले गांधी के नेतृत्व और ग्रामीण जनता के संघर्षों के बीच की दूरी को रेखांकित करते हैं। गांधी को एक बड़े नेता के रूप में दर्शाने के बावजूद एले उनकी वास्तविकता से दूरी पर सवाल उठाते हैं। यह स्थानिक व्यवस्था इस बात की आलोचना करती है कि कैसे नेतृत्वकर्ता अकसर जनता से अलग-थलग हो जाते हैं, जबकि उनके आदर्शों को पूरा करने का बोझ श्रमिकों और हाशिए पर खड़े समुदायों पर पड़ता है।
 
इस पेंटिंग में संरचनात्मक रूप से गांधी और श्रमिकों के बीच का स्थानिक विभाजन सामाजिक हायरार्की का प्रतिनिधित्व करता है। गांधी को बड़े और उच्च स्थान पर चित्रित करना इस बात का प्रतीक है कि वह एक महान राष्ट्रीय नेता हैं, लेकिन श्रमिकों को जमीन से जुड़े और छोटे रूप में दिखाना यह दर्शाता है कि समाज में उनके संघर्ष और योगदान को अक्सर कम करके आंका जाता है। गांधी का बड़ा सिर और उनकी ऊंची स्थिति इस पदानुक्रम को दर्शाती है कि कैसे हम अपने नेताओं को देखते हैं और उनका महत्व किस प्रकार से जनमानस के संघर्षों से ऊपर रखा जाता है। जैसा कि फ्रांज फैनन ने कहा है कि“औपनिवेशिक राष्ट्र को अपने नेतृत्व के प्रतीकों को सावधानी से संभालना चाहिए, क्योंकि कुछ हस्तियों को अधिक महत्व देना जनसाधारण के संघर्षों को ढंक सकता है”। (संदर्भ-3)
 
इस संदर्भ में गांधी के एक राष्ट्रीय नेता के रूप में हमारे सांस्कृतिक ज्ञान का प्रभाव उन निचले पात्रों की हमारी धारणाओं पर पड़ता है। जहां गांधी को अक्सर शांति और क्रांति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, ऐले की प्रस्तुति इस एकल कथा पर प्रश्न उठाती है और उन्हें लोगों के संघर्षों से अलग स्थान देती है। ऐले ने किसानों या मजदूर को अग्रभाग में रखा है और गांधी को एक अलौकिक और दूर की आकृति के रूप में चित्रित किया है। यह सब उन ऐतिहासिक कथा की आलोचना करता है, जो श्रमिकों और हाशिए के समुदायों के योगदानों को अकसर दरकिनार कर देती है और केवल नेतृत्व की भूमिका का महिमामंडन करती है।
 
एले की इस पेंटिंग में श्रमिक केवल अनुयायी नहीं हैं, बल्कि वे सक्रिय प्रतिभागी हैं, जो अपने प्रतिरोध और दृढ़ता के प्रतीक धारण किए हुए हैं। विशेष रूप से अंबेडकर का चित्र पेंटिंग में एक और परत जोड़ते हैं। अंबेडकर का चित्र स्वतंत्रता की एक वैकल्पिक आवाज़ का प्रतिनिधित्व करती है, जो गांधी के साथ-साथ मौजूद है एवं इतिहास में उनकी प्रमुखता को चुनौती देता है। ऐले की कई प्रतिरोधी हस्तियों को शामिल करने का निर्णय यह दर्शाता है कि भारतीय इतिहास एक समरूपी कथा नहीं है, बल्कि विभिन्न ताकतों और व्यक्तियों द्वारा आकार दी गई है।
 
इस प्रकार लक्ष्मण एले की ‘गांधी’ एक जटिल और बहुस्तरीय रचना है, जो यह उत्तर-औपनिवेशिक पहचानों की दुविधा का शास्त्रीय उदाहरण है। यह उत्तर-औपनिवेशिक भारत में नेतृत्व, श्रम और हाशिए पर होने की थीम पर विचार करती है।अपने सूक्ष्म चित्रण और विचारशील संरचना के माध्यम से यह पेंटिंग दर्शकों को गांधी को दी गई सरल नायकत्व की धारणाओं पर पुनर्विचार करने और ग्रामीण और हाशिए के समुदायों के निरंतर संघर्षों पर ध्यान केंद्रित करने का आमंत्रण देती है। इस प्रकार ऐले की ‘गांधी’ न केवल ऐतिहासिक प्रतीकों को पुनः परिभाषित करती है, बल्कि यह दृश्य कला की उस मौलिक शक्ति को भी उजागर करती है, जिसमें वह उन संघर्षों और विरोधाभासों को उभार सकती है, जिन्हें शब्दों के माध्यम से इस गतिशील-द्वद्वात्मकता से पकड़ना लगभग असंभव होता है।
 
———–समाप्त———–
Canvas Patna के “मॉनसून मेघदूत” के आयोजन (27 से 30 सितंबर) में।
 
संदर्भ
1. Pliny, Natural History , Translated by: John Bostock and Henry Thomas Riley
Publication: The Loeb Classical Library, Year: 1938 (reprint of the original edition from 1855)
2. John Berger – Ways of Seeing, Penguin Books (1972).
3. Frantz Fanon – The Wretched of the Earth, Grove Press (1961).
4. Ovid. “Metamorphoses.” Translated by A. D. Melville. Oxford University Press, 1986.
5. Griselda Pollock – Modernity and the Spaces of Femininity, Routledge (1988).
6. Homi Bhabha – The Location of Culture, Routledge (1994).

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