Akhilesh
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अखिलेश का रेखाचित्र : अर्थ की संभावना

अखिलेश का रेखाचित्र
“एक चित्र किसी अनुभव के बारे में नहीं बताता है, वह खुद एक अनुभव होता है” (संदर्भ -1) रोथको के इस कथन की तरह Ar Akhilesh 2019 का यह रेखाचित्र अर्थ से अधिक एक अनुभव की और ले जाता है।
 
पहली नज़र में यह रेखाचित्र (चित्र में) साधारण प्रतीत हो सकता है, मगर इसकी खंडित शैली, पाब्लो पिकासो की बाद की कृतियों और क्यूबिज्म आंदोलन की याद दिलाती है, जहाँ रूपों को तोड़कर नए तरीकों से पुनर्निर्मित किया जाता है।
इस रेखाचित्र में रेखा एक ऐसा बिंदु है जो मानो चलने के लिए निकल पड़ा हो। यह सच है कि रेखाएं कलाकार के विचारों और भावनाओं को बताते हुए कहानियां कह सकती हैं। कुछ ऐसे ही ‘कहानी मगर अकहानी की तरह’ अखिलेश का यह रेखाचित्र कह रहा है, वह भी बिना किसी रंग के और केवल काली रेखाओं के माध्यम से अमूर्त और कभी-कभी खंडित दृश्य में। इस तरह का रेखाचित्र चित्र, रंगों और बनावट के विचलनों को हटा देता है और दृश्य भाषा को उसकी सबसे मौलिक इकाई रेखाओं तक सीमित कर देता जो बिना किसी अलंकरण के सीधे संवाद करती है।
 
अखिलेश के रेखाचित्र में यह सादगी दर्शकों के लिए विषयवस्तु की स्वतंत्र व्याख्या का अवसर प्रदान करती है। यह खंडित संरचना एक न्यूनतम आकृति के रूप में प्रतीत होती है, जो गति में है या फिर जो अंदरूनी उथल-पुथल का प्रतीक है या फिर किसी ठोस मौलिक रूप का प्रतीक है। किसी विवरण की अनुपस्थिति के बावजूद इसमें अनुभूति केवल निष्क्रिय स्वीकृति नहीं है, बल्कि यह अर्थ का सक्रिय निर्माण है।
 
अखिलेश की रेखाओं की विविध मोटाई और प्रवाह इस कृति की भावनात्मक गहराई को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। एक सुचारू, निरंतर रेखा शांति का आभास देती है, जबकि रेखा की मोटाई में परिवर्तन तनाव या अचानक विचारों या भावनाओं में बदलाव का सुझाव दे सकता है।
 
इस कृति में, रेखाचित्र एक प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें या तो कुछ निर्मित हो रहा है या तो कुछ टूट रहा है और यह दर्शक के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यह द्वैतवाद दर्शक को कई व्याख्याओं के स्तरों का अन्वेषण करने के लिए आमंत्रित करता है। इस रेखाचित्र में बस अर्थ की संभावनाओं के अनुभव-संकेत भर हैं।
 
अखिलेश की रेखाचित्र में जो जगह खाली छोड़ी गई है, वह उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी कि खींची गई रेखाएं। नकारात्मक स्थान सक्रिय हो जाता है और रेखाओं के साथ बातचीत करके एक आयतन या गहराई की भावना उत्पन्न करता है, भले ही यह काम सतही रूप से सपाट प्रतीत होता हो। जैसे रॉबर्ट मॉरिस ने अपनी पुस्तक में कहा था कि कि जैसे अंतरिक्ष और रूप एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, वैसे ही “रूप उन स्थानों को स्पष्ट करते हैं, और वे स्थान उन रूपों को उनका अर्थ देते हैं।” (संदर्भ -2) अखिलेश के मामले में रेखाओं के बीच जो खाली स्थान या कागज झलकता है, इस रेखाचित्र को वह रचनात्मक शक्ति प्रदान करता है, जिसमें दर्शक खुद ही चित्र को पूरा कर सकें।
 
अखिलेश का रेखाचित्र न्यूनतमता की एक खोज है, जहाँ स्पष्ट रूप से कोई कथानक या आलंकारिक तत्व न होने के कारण दर्शक एक चिंतनशील अवस्था में चला जाता है। रंगों और जटिल रूपों के शोर को हटाकर कलाकार अपनी रेखाओं के माध्यम से एक सीधा मगर रहस्यमय संवाद प्रस्तुत करता है। यह कृति अस्तित्व, उपस्थिति और अनुभूति पर एक दार्शनिक उक्ति कि “जो अब मौजूद नहीं है, वह शायद कभी नहीं थी”। यहाँ रेखाचित्र को एक “वास्तविकता के सिमुलिक्रा (कृत्रिम-विकल्प)” के रूप में व्याख्या किया जा सकता है। (संदर्भ-3)
 
अंत में संभवत: ये अखिलेश का रेखाचित्र नहीं है, यह मैं हूँ जो इन सारे विचारों को देख रहा हूँ या यह अखिलेश का रेखा चित्र है, जो मुझे देख रहा है। इन विचारों को निश्चित तौर पर कौन कह सकता है -कोई नहीं और वह ‘कोई नहीं’ ही अखिलेश का यह रेखाचित्र है।
——-समाप्त ——–
Canvas Patna के “मॉनसून मेघदूत” के आयोजन (27 से 30 सितंबर) में।
 
———-संदर्भ———-
1. Rothko, M. (2004). The Artist’s Reality: Philosophies of Art. Yale University Press.
2. Morris, R. (1966). Notes on Sculpture. Artforum.
3. Baudrillard, J. (1981). Simulacra and Simulation. Éditions Galilée.

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