गांधी कथा नाटक चित्र 5
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पार्टनर कहो तुम्हारी कथा क्या है ? गांधी कथा की रंगमंच समीक्षा

  गांधी कथा : कथा और डिज़ाइन का चुनाव और रंग निर्देशक
 
लिओनार्दो द विंची के ‘द लास्ट सपर’ के स्थिर चित्र की तरह आरंभ होता है , लेखक-निर्देशक सौरभ अनंत और ‘विहान’ समूह के नाटक ‘गांधी कथा’ का, जिसमें ‘कोरस अभिनेता’ गांधी की कथा को कहने को तत्पर हैं। पर शुरूआत कथा से नहीं, एक शब्दहीन संगीत और गुनगुनाहट से होती है। इस शब्दहीन या गीतहीन संगीत का मूल स्वर ‘उत्सव’ है।  
 
यहाँ एक संदेह और प्रश्न है अवचेतन के स्तर का। क्या यह गांधी की कथा है? जवाब है नहीं। यह गांधी की कथा नहीं, गांधी का उत्सव है। कैसे? उत्तर में भी एक प्रश्न ही है। अगर गांधी होते तो आज अपनी कथा कैसे कहते? वह अपनी कथा का उत्सव मनाते ! या शायद अपनी हत्या से ही अपनी कथा की शुरूआत करते, क्योंकि उनकी कथा का अंत तो उनकी हत्या से ही होता है। गांधी की असली और संपूर्ण कथा की मूल प्रवृत्ति ट्रेजेडी ही होगी, न कि कोमल और मधुर भजन। ‘गांधी कथा’ में कथा के इस प्रश्न पर थोड़ा और सोचना आवश्यक है, मगर कुछ चीजों को पहले समझना आवश्यक है।
 
सौरभ अनंत मुझे डिज़ाइन उन्मुख निर्देशक मालूम पड़े। परंतु कृत्रिम डिज़ाइन कई तरह की समस्या भी साथ में लाती है। जैसा कि अभिनवगुप्त ने कहा है कि
“भिन्नेन्द्रियम्राह्य अपि दृदयश्रव्ये एकानुसन्धानविषयर्वं न विजहीत इति सामान्याभिनय काठप्राणत्वं प्रयोगस्य सूचितम्‌।” [संदर्भ-1,अभिनवगुप्त.]
 
अर्थात ऐसा कोई उपाय इन दृश्य एवं श्रव्यों मे लगाया जाये कि जिससे भिन्न इन्द्रियों से ग्राह्य होने पर भी इनकी एकात्म न हट जाय । चक्षु एवं श्रोत्र दो इन्द्रियों से ग्राह्य दो विषय होने पर भी दृश्य और ध्वनि की एक ज्ञानजन्य एकाग्रता विच्छिन्न नहीं हो पाये। दृश्य एवं श्रव्य अभिनय का काल एक ही है। इस बात को और आगे बढ़ाये जाये तो डिज़ाइन ऐसा हो कि दृश्य और श्रव्य के साथ संवाद और कथा सूत्र के अर्थ का एकात्म होना चाहिए। कभी-कभी कथा से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि कथा कौन कह रहा है, किससे कह रहा है और कैसे कह रहा है। नाटक करने वाले अभिनेता यह कथा कह रहे हैं। यह कहा जा रहा है , सीधे दर्शक दीर्घा को और उनमें से नाम लेकर दर्शक को पुकारा भी जा रहा है, जैसे Sanjay Upadhyay को पुकारा गया। ऐसे ही एक संवाद में एक बच्ची से नोट पर गांधी की तस्वीर छपे होने का उत्तर पाकर अभिनेता अपने नाटक की सार्थकता की स्वघोषणा भी करते हैं। सार्थकता का यह दावा, स्वयं गांधी का भी नहीं था, जो स्वयं कहते हैं कि उनके प्रयोगों के सत्य होने का दावा नहीं किया जा सकता है।
 
 
 
यह नाटक लिओनार्दो दा विंची के ‘द लास्ट सपर’ के स्थिर चित्र की तरह शुरु होता है। लगभग 81 मिनट का यह नाटक एक सिंगल पेंटिंग की तरह है, जो थोड़ा हिल-डोल लेता है…रुप बदल लेता है, मगर रहता है एक स्थिर चित्र ही। कुछ-कुछ हैरी पॉटर या विज्ञान गल्प के मूविंग पिक्चर की तरह। लगभग 81 मिनट के इस नाटक में केवल एक दृश्य चलता रहता है और सारे ‘दृश्य परिवर्तन’ दृश्य के अंदर ही दर्शक के सामने ही चल रहा होता है। यह एक बहुत कठीन डिजाइन है और ऐसा करना हर काव्यात्मक निर्देशक के लिए स्वप्न और कठीन चुनौती एक साथ है । ऐसे प्रयास के लिए काफी साहस और अभ्यास की आवश्यकता होती है। 81 मिनट। कोई अभिनेता इतनी लंबी अवधि तक बाहर नहीं जाता है। यह लंबे एकल दृश्य की युक्ति अभिनेताओं को अपने कौशल का प्रदर्शन करने का अवसर देता है और उन्हें एक ही दृश्य के भीतर विभिन्न भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर देता है। अभिनय की दृष्टि से यह एक सक्षम समूह था। सामूहिक अभिनय एक कठीन कार्य है, मगर श्वेता केतकर, तेजस्विता अनन्त, देश ईशा गोस्वामी, ग्रेसी गोस्वामी, हेमन्त देवलेकर, अंकित पारोचे, हर्ष झा, रुद्राक्ष भायरे, स्नेह विश्वकर्मा और निरंजन कार्तिक ने मिलकर काफी सहजता से सामूहिक अभिनय को संभव किया। यह अभिनेता समूह किसी भी निर्देशक के लिए ड्रीम टीम की तरह थी। अभिनेता के इस अथक मेहनत प्रदर्शन के लिए बच्ची से वरिष्ठ सभी अभिनेता को साधुवाद। आँख के सामने ही पात्र कभी लाल कोट पहन कर जनरल डायर बन जाता है, कभी मुखिया या फिर गांधी बन जाता है, या फिर पॉलिटिकल साइंस का अभूत विद्यार्थी बन जाता है। अभिनय के लिहाज से दृश्य के नहीं बदलने की यह युक्ति सुंदर और सफल रही। मगर इसके ऐसा होने के पीछे का तर्क क्या था और कथा में इसका क्या योगदान था? यह प्रश्न अपने आप में एक दूसरा आलेख हो सकता है। इस लंबे सीन की युक्ति दर्शक को किसी संदेश पर ठहरकर विचार करने पर मजबूर करती है। पर इस डिजाइन में एक कृत्रिमता है। जीवन में भी दृश्य के मध्य कई तरह के विराम और अलगाव होते हैं, जो ठहरकर या अलग दृष्टि से सोचने का अवसर देते हैं और विषय को संपूर्णता में पकड़ने का अवसर देते हैं। पर उस तरह की संपूर्णता इस प्रस्तुति के डिज़ाइन में छूट गयी। दृश्य विराम के इस अभाव से अभिनेता के चरित्र परिवर्तन का प्रभाव अपेक्षा से कम रहा। साथ में एकल या लंबे दृश्य योजना में कई जगह गौण अभिनेता बस प्रतिक्रिया देते नजर आये। अगर इसकी जगह पर दृश्य के गौण अभिनेता को प्रमुख अभिनेता के समानांतर कार्य व्यापार या कथा दृश्य दिया जाता , तब लंबे दृश्य को संपूर्णता मिलती। 
 
लेखक-निर्देशक सौरभ अनंत ने लगभग 81 मिनट में लोक शैली, किस्सागो, नौटंकी और यथार्थवादी अभिनय के कच्चे माल से एक संगीत प्रधान नाटक के निर्माण का प्रयास किया है। नाटक में कवि अभिनेता Hemant Deolekar का गीत और संगीत संयोजन एक सक्षम ध्वनि योजना थी, जो जरूरत के हिसाब से अफ्रीकी हो रही थी, कभी लोक संगीत।
 
शुरुआत में ही अभिनेता समूह अपने वहाँ आने का उद्देश्य का स्पष्ट करता है, जिसमें एक अभिनेता कहता है कि वह गांधी पर व्याख्यान देने आया है, परंतु सब कहते हैं कि ऐसा नहीं है और वे सब व्याख्यान नहीं कथा कहने आये हैं -गांधी कथा एवं वह कथा, नाच , अभिनय और संगीत अर्थात नाटक से गांधी कथा कहने आये हैं। पर समस्या यह है कि संगीत और नृत्य से सजी यह नाटक कथा कम और व्याख्यान अधिक लगता है।
 
 
 
यह व्याख्यान इसलिए है कि इसमें सब कह देने का लालच है। उदाहरण के लिए एक दृश्य में गांधी के एक परीक्षा में 34 छात्रों के बीच 32वें स्थान पर रहने की बात कही गयी है और हर बच्चे की विशेषता के अनुसार शिक्षा देने की सुंदर बात कही गयी है। इस बात से कोई भी विवेकशील कैसे इनकार करेगा। मगर गांधी की लघु कथा में इसका क्या योगदान है। कवि नरेश सक्सेना की एक बात इस प्रसंग के लिए प्रासंगिक है। “कोई स्वर अपने अकेलेपन में बेसुरा नहीं होता। वह बेसुरा होता है उन स्वरों के संगीत के कारण जो उससे मेल नहीं खाते।” [ संदर्भ -2, नरेश सक्सेना.] स्वर की तरह कोई भी प्रसंग अकेले में सही ही होता है, जब कथा- क्रम या संपूर्णता में बेमेल होने के कारण बाधक हो जाता है।
प्रस्तुति में गांधी की कथा सार यह है कि गांधी के वैष्णव होने, मांस भक्षण और झूठ से कथा का आरंभ होता है। फिर गांधी नाटक के अंदर एक दूसरा नाटक सत्य हरिश्चन्द्र देख कर सत्य पर अडिग हो जाते हैं। डाक्टर बनना चाहते हैं, मगर माता-पिता के कहने पर वकील बनते हैं। विदेश यात्रा के कारण जात बाहर होते हैं। फिर साउथ अफ्रीका में रेल में अपमानित होकर सत्याग्रही होते हैं। इसके बाद गुरु गोखले से संपर्क और फिर भारत यात्रा होती है। भारत भ्रमण में बीएचयू की स्थापना और चंपारण आंदोलन की बात होती है, जो किसान को जगाने की कथा है। फिर जनरल डायर और असहयोग आंदोलन। फिर गांधी के कुर्ता न पहनने की कथा है। नमक आंदोलन है। चिट्ठी के बहाने गांधी के भारत के सबसे लोकप्रिय आदमी होने की भ्रामक घोषणा है। देश आजाद, नोआखाली और अंततः गांधी का ‘हे राम‘। गांधी के विशाल जीवन की विपुल घटनाओं में केवल इन घटनाओं के चुनाव से और अन्य घटनाओं को छोड़ने से कथा का अपना एक उद्देश्य और डिजाइन तय हो जाता है। 
 
यह एक विचित्र डिजाइन वाली गांधी कथा है, जिसमें कस्तूरबा बाई है ही नहीं। स्त्री प्रश्न की चर्चा भी अमृत कौर को लिखे पत्र के माध्यम से है। कस्तूरबा बाई के प्रति या एक स्त्री के प्रति या पत्नी के प्रति किये अन्याय की कथा पर पश्चाताप स्वयं गांधी ने व्यक्त किया है, मगर इस गांधी कथा में यह है ही नहीं। यह गांधी कथा गांधी से भी कम समालोचना दृष्टि रखती है। इसके कई कारण हैं।
इसका इतिहासबोध धुंधला है। ‘गांधी जैसा कोई लोकप्रिय नहीं है’ इसका दावा नाटक में ‘पत्र और पता’ के मजेदार विवरणों वाले दृश्य में है। भारतीय तर्क परंपरा में मजेदार प्रवृति है, जिसमें लोग किसी के बारे में अपनी बात को हमेशा सर्वोत्तम रुप में रखते है, जिसका स्रोत संभवतः भारतीय धर्म दर्शन से जोड़ा जा सकता है। भारतीय धर्म दर्शन में एक अवधारणा है, जिसमें जिस समय जिस एक देवता की पूजा की जाती है, वही सर्वशक्तिमान हो जाता है और दूसरे देवता गौण हो जाते हैं। जब आप ब्रह्मा की पूजा करते हैं, तब वे सर्वशक्तिमान हो जाते हैं, शेष देवता गौण होते हैं और जब आप शिव की पूजा करते हैं, तब वे सर्वशक्तिमान हो जाते हैं, शेष देवता गौण होते हैं। कुछ ऐसा ही नाटक में देखने को मिला, जब कहा गया कि भारत में गांधी से लोकप्रिय कोई नहीं हुआ था। तथ्य यह है कि भारत में बुद्ध सर्वाधिक लोकप्रिय थे, जिनके विचार आज चीन, जापान आदि कई देशों में कायम हैं। संदर्भ यह है कि इस प्रकार का अतिकथन नाटक के इतिहास बोध को सीमित और विकलांग बनाता है।
 
यह नाटक गांधी से अधिक गांधीवादी है। यह नाटक गांधी के प्रति इतना आश्वस्त है, जितना गांधी भी स्वयं अपने प्रति नहीं थे। इसलिए उनकी आत्मकथा में सत्य कहने की बात कही गयी है, परंतु सत्य जानने का दावा नहीं है। आत्मकथा में गांधी ने कहा है ”इन प्रयोगों के बारे में मैं किसी भी प्रकार की संपूर्णता का दावा नहीं करता।जिस तरह वैज्ञानिक अपने प्रयोग अतिशय नियम-पूर्वक, विचार-पूर्वक और बारीकी से करता है और उत्पन्न परिणामों को अंतिम नहीं कहता और तटस्थ होता है, मेरा भी वैसा ही दावा है।”[सदंर्भ -3, Gandhi.]
 
नाटक में एक गीत और दृश्य है, जिसमें सारा देश गांधी के पीछे चल पड़ा। इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था और क्रांग्रेस के अंदर गांधीवादी, समाजवादी आदि तरह का लोकतांत्रिक विभाजन था। क्रांतिकारी आंदोलन था। अंबेडकर का आंदोलन था। एक विवाद गांधी और टैगोर के मध्य भी था। [ संदर्भ -4, Gandhi, Tagore, S. Bhattacharya.] जब गांधी ने 1920 में अपना चौतरफा असहयोग आंदोलन शुरू किया, टैगोर देश से दूर विदेश में थे और जुलाई 1921 में “इस नई मिली आजादी की प्रफुल्लित हवा” में सांस लेने की उम्मीद में वापस आए। इसके बजाय वे देश में “दमनकारी माहौल” से परेशान थे, जो एक ओर अपने विपक्ष के प्रति असहिष्णु था और जहां लोग अपने मन की बात कहने से डरते थे। इसके तुरंत बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में “सत्येर अहवाहन” या “द कॉल ऑफ ट्रूथ” नामक प्रसिद्ध भाषण में असहयोग आंदोलन और गांधी पर हमला किया। इसके बाद गांधी अपने आंदोलन के लिए टैगोर से समर्थन मांगने आए थे। टैगौर ने अपनी आपत्तियों के प्रमाण के रूप में गांधी को अपने घर के बाहर के एक दृश्य की ओर इशारा किया: “आओ और मेरे बरामदे के किनारे को देखें”। गांधी ने नीचे देखा, टैगोर ने कहा – “और देखें कि आपके अहिंसक अनुयायी क्या कर रहे हैं। उन्होंने दुकानों से कपड़ा चोरी किया है। उन्होंने मेरे आंगन में अलाव जलाया है और उसके चारों ओर भेड़िए की तरह गरज रहे हैं।” दरअसल गांधी निरंतर विकासशील रहे और कई बार उन्होंने अपने तय विचार को बदला। उदाहरण के लिए फिल्म के बारे में उनके विचार गलत थे। गांधीजी सिनेमा को संसाधनों और समय की बरबादी मानते थे। गांधीजी ने हरिजन के 3 मई, 1942 अंक में प्रकाशित एक साक्षात्कार में कहा, “अगर मैं उनके (सिनेमा की बुराई) सम्मान में धरना आयोजित करना शुरू कर दूं, तो मुझे अपनी जाति, अपना महात्मापन खो देना चाहिए”। गांधी ने सिनेमा को उन्होंने दुर्व्यसन की तरह लिया। आशय यह है कि देश में गांधी के प्रति कई तरह की शंकाए तब भी थीं और अरुंधति रॉय के आलेख ‘द डॉक्टर और संत’ के रुप में आज भी हैं। स्वयं गांधी के मन में भी कई तरह की शंकाएं अपने प्रति थीं। इस तरह की कोई शंका या द्वंद्व इस नाटक में नहीं दिखता, जिससे यह नाटक गांधी की कथा नहीं, गांधी का उत्सव बन जाता है और स्पष्ट रुप से कहें तो गांधी की भक्ति है।
 
नाटक के अंत में गांधी की हत्या के दृश्य को संकेत में कहा गया है, जलते हुए दिये और ‘हे राम के गीत’ से। मृत्यु का यह गौण संकेत गांधी जीवन में मौजूद विडंबना को कमजोर रुप से दिखाता है। और उसका एक अतिरिक्त अंत दर्शक दीर्घा के एक उत्साही दर्शक के जय श्री राम के उदघोष से होता है, जो एक अलग मामला है। कुल मिला कर इस नाटक के आलेख में न्यूनतम ऐतिहासिक, चारित्रिक और भावात्मक शोध का अभाव है।
अंत इस प्रसंग से करूंगा कि 2014 में द गैम्बलर फिल्म के प्रोफेसर नायक से एक प्रश्न छात्र द्वारा पूछा जाता है कि उसने पहले उपन्यास के बाद इतने वर्षों से दूसरी रचना क्यों नहीं की। प्रोफेसर कहता है कि वह जो कुछ भी लिख सकता है, उस चीज पर उससे बेहतर पहले ही लिखा हुआ है, इसलिए उसका लिखना बेमानी है। उसी तरह गांधी पर लिखे साहित्य में मेरी समझ में गांधी की स्वयं की लिखी आत्मकथा से बेहतर साहित्य कोई नहीं है। बेहतर होता कि गांधी की आत्मकथा पर ही प्रयोग होता या उससे बेहतर लेखन को तैयार किया जाता, मगर सौरभ अनंत बतौर लेखक निर्देशक से कमजोर हैं और उनके लेखन में गांधी के जीवन के आधारभूत द्वंद्व गायब हैं। इसलिए कथा में कथा है, गीत है, नृत्य है, आंसू हैं , संवाद है, भारतीय लोकधुन है, अफ्रीकी धुन है, नहीं है तो बस इन सब को एक साथ अर्थ देने वाली दृष्टि। यह कथा इसी तरह से क्यों कही जा रही है, यह स्पष्ट नहीं है। यह प्रस्तुति इसका आदर्श उदाहरण है कि कैसे एक कमजोर लेखन सक्षम प्रस्तुति को भी कमजोर करता है। साथ सौरभ अनंत का डिजाइन भी नाटक के विपरीत काम कर रहा है।
 
इसलिए प्रकट रुप से ‘गांधी कथा’ को देखना एक सुंदर दृश्य और श्रव्य अनुभूति थी। मगर प्रस्तुति के तल छट में सुंदर दिखने वाली चीज सच में सुंदर नहीं हैं क्योंकि यथार्थ की असुंदरता को भी सुंदर रुप में प्रस्तुत कर रहा है। असुंदर यथार्थ की सुंदरता उनकी असुंदरता में ही होती है। असुंदर यथार्थ कथा का सौंदर्य शास्त्र अलग होता है, प्रति सुंदर होता है। यह नाटक भी असुंदर यथार्थ विषय पर अति सुन्दर नाटक है। इस लिए लोक शिल्प, चित्र कला, कोर्स, कथा कहने, सारे रंग प्रयोग बिना विशेष दृष्टि के सुंदर और झूमाने वाली प्रस्तुति के निर्माण में सफल है, मगर गांधी के बारे में सोचने के प्रति गांधी या अंततः किसी की भक्ति की प्रवृति को ही मजबूत करती है।
मैं एकमत होकर कह सकता हूं, यह प्रस्तुति मूलतः पसंद आयी है, भले ही इसमें एक तरह का अधूरापन है। मगर इस बात पर उससे भी अधिक एकमत हूं कि गांधी की असली और संपूर्ण कथा की मूल प्रवृत्ति ट्रेजेडी ही होगी , न कि कोमल और मधुर भजन। यह गांधी की कथा नहीं, गांधी का उत्सव है। और ऐसा अकसर होता है कि उत्सव में उद्देश्य गौण हो जाता है और प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो जाती है। उत्सव मुद्रा में आप विषय के साथ न्याय नहीं करते हैं। कुछ -कुछ यह वैसा ही है कि हम किसी के मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि इस पर भी शंका होने लगती है कि हमें मृतक के लिए कोई शोक है या नहीं।
 
(कालिदास रंगालय, पटना। 2 फरवरी 2024। प्रांगण , 2024)
 
संदर्भ
1. पृष्ट–46, अभिनवगुप्त, अभिनव भारती, प्रथम भाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय मुद्रणालय, 1971.
2. पृष्ट-8,नरेश सक्सेना, भूमिका ,अनीश अंकुर, कलाओं के तीन शिखर, अभिधा प्रकाशन, 2022।
3. p-12,Mohandas Karamchand Gandhi, The Story of My Experiments with Truth, Rajpal & Sons; 2015.
4. p-34, Mahatma Gandhi, Rabindranath Tagore, S. Bhattacharya , The Mahatma and the Poet: Letters and Debates Between Gandhi and Tagore, 1915-1941, National Book Trust, 1997.
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