लक्की जी गुप्ता का माँ मुझे टैगोर बना दे – सार्थकता और सीमा

कृष्ण समिद्ध

कभी-कभी किसी कला के प्रति कलाकार का समर्पण और अभ्यास की प्रक्रिया का प्रभाव इतना बड़ा हो जाता है कि उसकी कला प्रस्तुति पर बात करना गैर जरूरी लगता है। लक्की जी गुप्ता उसी तरह के कलाकार हैं, जिन्होनें निरंतर यात्रा करते हुए अपने रंगकर्म की प्रक्रिया के कद को धीरे-धीरे इतना बड़ा कर लिया है कि अकसर उनकी प्रस्तुति ‘ माँ मुझे टैगोर बना दे  पर उतनी बात नहीं होती है, जिसके वे पात्र हैं। लक्की की “माँ मुझे टैगोर बना दे” की प्रस्तुति दो दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। पहला यह कि अभिनय किसी नाटक को सक्षम बनाने के लिए सबसे सरल मगर प्रभावी माध्यम है। दूसरा यह कि कला में समर्पण और सच्चा अभ्यास एक कलाकार को उसके सबसे महत्वपूर्ण रूप में विकसित कर सकते हैं, भले ही समाज इसे उचित महत्व न दे।

केवल अभिनय वाला डिज़ाइन

इस प्रस्तुति की डिज़ाइन के केंद्र में केवल अभिनय है। प्रस्तुति में अभिनय को छोड कर अन्य किसी तरह के रंगमंचीय डिज़ाइन का इस्तेमाल नहीं था, इसलिए सारा ध्यान केवल अभिनय पर था। नाटक का यह डिज़ाइन मानव भावना पर केंद्रित है, जिसमें दर्शक केवल अभिनय के माध्यम से पात्र की भावनात्मक संवेदना से जुड़ जाता है और दर्शक निष्क्रिय नहीं रह कर चरित्र के साथ व्यक्तिगत रुप से सक्रिय हो जाता है। चरित्र के अनुभव और भावना दर्शक के अनुभव और भावना में बदल जाते हैं। इसके डिज़ाइन में मानव भावना से खेलने के सारे सूत्र हैं। इस प्रस्तुति का डिज़ाइन ऐसा है कि यह अभिनेता को अपना सारा कुछ देने का अवसर देता है और लक्की बतौर अभिनेता अपना सारा देने में सफल भी रहे हैं। इस प्रस्तुति में अभिनय का यह मॉडल दर्शकों के बीच एक संवाद स्थापित करने में सहारा प्रदान करता है। यह अभिनेता द्वारा दर्शक को अपने सम्पूर्ण अनुभव तक ले जाता है।

स्मृति का डिज़ाइन- अभिनय और दर्शक के मध्य सेतु

जब हम इस नाटक के डिज़ाइन को और विस्तार से समझते हैं, तो हमें एक और महत्वपूर्ण अवयव का पता चलता है – वह है स्मृति। यह नाटक मानवीय स्म़ृतियों से निर्मित है, जो अभिनेता और दर्शक दोनों को एक कर देता है। नाटक के कथानक में स्मृति का खेल है। स्मृति के इस खेल में एक समय के बाद हम उस छात्र के साथ उसके स्कूल के दिनों की यादों की यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं, जब वह अपनी जिंदगी की सबसे अच्छे दिनों में था। फिर दर्शक के मन में यह स्मृति छात्र के बदले उनके अपने स्कूल के दिनों की स्मृति में बदल जाती है।

इस परिस्थिति में स्मृति नाटक के लिए एक प्रमुख और सामर्थ्यशाली उपकरण की तरह है। यह नाटक दर्शकों को अपने भूतकाल के संवेदनात्मक अनुभवों को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है, जिससे उनकी अपनी जीवन की यादें और भावनाएं पुनः जीवित होती हैं। यह नाटक की कथा को अधिक प्रभावी बनाता है, क्योंकि यह दर्शकों को अपने पिछले समय और स्मृति  में ले जाता है। इसलिए पात्र का अनुभव उनके व्यक्तिगत अनुभव की तरह प्रभाव छोड़ता है।

नाटक का नाटकीय रूपरेखा

इस नाटक का एक कमजोर पक्ष है। नाटक में मौजूद ‘यथार्थ की ट्रेजडी‘ में ‘प्रक्रियागत यथार्थ का अभाव‘ है, जो इसे एक अविश्वसनीय मेलोड्रामा बनाता है। कारण यह कि यह प्रस्तुति कृत्रिम रुप से नाटकीय है, जिसमें यह एक तरफ संघर्ष भरी कहानी के माध्यम से एक मार्मिक अनुभव को प्रस्तुत करती है, मगर दूसरी तरफ इसकी ‘प्रक्रियागत यथार्थ का अभाव‘ से इसका यथार्थ तार्किक रुप से कृत्रिम और अविश्वसनीय प्रतीत होता है। इसलिए यह नाटक तर्क-प्रमुख और भाव-प्रमुख दर्शक पर अलग-अलग तरह का प्रभाव छोड़ेगा। भाव-प्रमुख दर्शक इस नाटक के भावात्मक त्रासदी से अति-प्रभावित होगा , मगर तर्क-प्रमुख दर्शक इससे एक अलगाव महसूस करेगा।

नाटक के प्रारंभिक दृश्य में पात्र के संघर्षों का चित्रण है, जिसमें मजदूर के रुप में उसका संघर्ष है। नाटक के दूसरे भाग में पात्र के जीवन के स्कूल के दिनों की स्मृतियाँ है। कक्षा, छात्रों और शिक्षकों के विविध हास्य दृश्यों से एक आनंद की क्षणिक सृष्टि होती है। । फिर अचानक पिता की मौत के बाद नाटक त्रासदी में परिणत हो जाता है। यह घटना पात्र की जिंदगी में एक बड़ा परिवर्तन लाती है और उसे आत्मनिर्भर किशोर मजदूर बना देती है, जिसकी आंखों में अभी भी स्कूल और कविता के सपने हैं।

मगर त्रासदी का यह क्रम कृत्रिम लगता है, भले ही हूबहू यथार्थ हो। कारण यह है कि दर्शक की स्मृति परंपरा में कथा का एक लंबा अनुभव है, जिसमें त्रासदी का ऐसा स्वरूप फार्मूले सा लगता है और हर चीज ऐसे घट रही हैं, जैसे पहले से तय हो। यह जीवन के प्रक्रियागत अनिश्चित यथार्थ का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है और इसी से तर्कशील दर्शक में एक अलगाव का निर्माण करता है। इससे दो विचित्र परस्परविरोधी प्रभाव एक साथ उत्पन्न होता है। पहला प्रभाव यह  कि नाटक में कथा की अस्थिरता का बोध होता है, उसी समय एक परस्पर विरोधी प्रभाव का बोध भी कराती है कि कथा की नियति कृत्रिम रुप से तय मालूम पड़ती है।

 

कथा का कृत्रिम नियतिवाद और स्वाभाविक विकास

नाटक की कथा की नियति के कृत्रिम रुप से तय होने के पीछे निर्देशक और लेखक का पहले से तय उद्देश्य है कि प्रमुख पात्र की त्रासदी से सहानुभूति निश्चित रुप से पैदा करना है। इससे एक पात्र के निश्चित चरित्र का निर्माण होता है, जो अपने निर्माण में एक अस्वाभाविकता लिए होता है। इस अस्वाभाविकता के मूल में अभिनय लेखक द्वारा कथा के स्वाभाविक विकास के विपरीत थोपा गये लेखकीय उद्देश्य हैं।

उदाहरण के लिए इस नाटक के अंत में प्रमुख पात्र अपनी एक कविता सुनाता है, जिसमें वह कहता कि वह अपनी माँ के पास वैसे ही जैसे कि एक छोटी नदी जो एक बड़ी नदी के साथ होती है। नाटक के अंत में जब प्रमुख पात्र अपनी कविता के माध्यम से अपने अंतिम भावनाओं को व्यक्त करता है, तो उसका उद्देश्य दर्शाता है कि वह अपनी माँ और स्वयं को साथ बहने वाली नदी के रूप में देखता है। इस विशेष उपमा के माध्यम से उसने अपनी एक विशेष आत्म-प्रस्तुति की है। इस नदी वाली आत्म-प्रस्तुति का ही विश्लेषण करें, तो इस उपमा के माध्यम से नाटक के प्रमुख पात्र चरित्र को ऐसा बनाया गया है कि दर्शक उससे भावनात्मक लगाव रखे। अंत में यह घोषणा कि वह फिर से पढाई आरंभ करेगा, एक आरोपित आशावाद की तरह है और नाटक में इस अंत का स्वाभाविक विकास नहीं दिखता है और यह अचानक सा लगता है।

यह इस नाटक की 1370वीं प्रस्तुति थी। उपरोक्त अंतर्निहित सीमाओं के बावजूद इस नाटक का देश के अलग-अलग शहरों में प्रस्तुति के होने का अपना महत्व है। 1370 प्रस्तुति और भी नाटक के हुए हैं, मगर जिस प्रकार से इस नाटक की  सक्षम प्रस्तुति को लक्की ने अलग-अलग संस्कृति और भाषा क्षेत्र में बार- बार दोहराया है, वह रंगमंच के नये विकल्प के लिए एक सफल केस स्डटी हो सकता है। यह शैक्षणिक रंगमंच का एक नया भविष्य हो सकता है, जो रंगमंच को फिर से जनता के बीच वापस ले जा सकता है। साथ ही रंगकर्म को नये रंगकर्मी का अक्षय स्रोत दे सकता है। पर शैक्षणिक रंगमंच की अपनी सीमाएं हैं। मजे की बात है , NSD का सारा कार्यव्यापार भी एक तरह का शैक्षणिक रंगमंच ही है। जब तक रंगमंच दर्शक के लिए नहीं होगा और दर्शक से मिली पूंजी से नहीं चलेगा, तब तक रंगमंच आत्मनिर्भर नहीं होगा। इसके लिए आवश्यक है कि रंगमंच के साथ प्रयोग हो और लक्की का ‘माँ मुझे टैगोर बना दे’ यही कर रहा है।

यह अकारण नहीं है कि रंग गुरु प्रसन्ना ने स्वयं “माँ मुझे टैगोर बना दे” का अनुवाद कन्नड़ भाषा में ” Kuppalli Putta” के नाम से किया है, जिसमें टैगोर के बदले कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा की बात है। लक्की के निर्देशन और प्रसन्ना के नेतृत्व में कन्नड़ में 15 सितंबर 2023 तक 20 प्रस्तुति हो चुकी हैं। इस नाटक और इसके कन्नड़ अनुवाद के संदर्भ में किसी नाटक के अलग-अलग संस्कृति व्यवहार में ” साहित्य और बौद्धिकता की स्वतंत्रता” और संस्कृति पर निर्भरता को समझने का प्रयास किया जा सकता है। एक बांग्ला कवि टेगौर के हिंदी नाटक में प्रासंगिक होना और फिर उसी हिंदी नाटक के कन्नड़ नाटक के रुप में और कन्नड़ कवि कुपल्ली  के रुप में प्रासंगिक होना, इस बात का प्रमाण है कि ‘नाटक‘ और ‘मानवीय भावना’ के एक सार्वभौमिक या युनिवर्सल संवाद-युक्ति या वैकल्पिक संवाद माध्यम है, जो भाषा, देश और संस्कृति के परे जाकर एक समान रुप से काम करता है। इस नाटक की यही ताकत है कि यह भाषा, देश और संस्कृति के परे जाकर मानव के प्रश्न रखने में सक्षम है। यह नाटक यह भी साबित करता है कि अभिनय किसी नाटक को सक्षम बनाने के लिए सबसे सरल और प्रभावी माध्यम है। कुल मिलाकर यह नाटक दर्शक के भावनात्मक विकास के उपकरण की तरह है। मनुष्यों के पास कई परस्पर विरोधी इच्छाएं होती हैं जो उनके व्यवहार को प्रभावित करते हैं। यह नाटक व्यक्तियों की वैसी ही परस्पर विरोधी इच्छाओं को व्यक्त करने और उनका अन्वेषण करने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं, जो दर्शक को उनके आंतरिक संघर्षों को संबोधित करने और उन पर विचार करने का समय और स्थान देता है। इस प्रभाव में ही लक्की जी गुप्ता के ‘माँ मुझे टैगोर बना दे’ की सफलता है।

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