बहरुल इस्लाम बनाम चेखव : मूल रचना बनाम नाट्यांतरण में पाठ और चरित्र

 “मैं पहले ही कह चुका हूं कि चेखेव के ‘सीगल’ नाटक से पहली बार परिचित होने पर मुझे नाटक का सार, सुगंध और सौंदर्य समझ में नहीं आया।” [ संदर्भ –1, Stanislavski] स्तानिस्लावस्की को यह एहसास सीगल की सफल प्रस्तुति के बाद हुआ था। स्वयं चेखव भी ‘सीगल’ की प्रस्तुति में असफल रहे थे। 1896ई ,अलेक्जेंड्रिंस्की (Alexandrinski) थियेटर, पीटर्सबर्ग में चेखव के सीगल नाटक का पहला प्रोडक्शन था। नीना की भूमिका निभा रहीं थी अभिनेत्री वेरा कोमिसारज़ेव्स्काया, जो दर्शकों के हूटिंग से इतनी परेशान हो गयी कि अपना संवाद तक भूल गयी। चेखव को भी नाटक के दो अंक खत्म होते-होते दर्शक दीर्घा छोड़ कर बैक स्टेज में जाना पड़ा अंतिम दो अंक में। वह एक ऐतिहासिक असफलता थी। [संदर्भ –2,Jean Benedetti] संदर्भ यहाँ यह है कि नाटक में प्रदर्शन प्रमुख होता है, न कि नाटककार या नाटक निर्देशक की योजना।

6 जनवरी, 2024 को द हाउस आफ वेरायटी थियेटर,पटना में सीगल ग्रुप (संभवत: चेखव के सीगल से ही प्रेरित नाम.) द्वारा बहरुल इस्लाम के निर्देशन में चेखव के लघु -उपन्यासिका ‘द बोरिंग स्टोरी’ का मंचन हो रहा था और चेखव पुन: बैक स्टेज में था। इस आलेख का उद्देश्य है कि इस नाटक की प्रस्तुति के चरित्र और मूल रचना के चरित्र के स्वरूप का तुलनात्मक अध्ययन करना है और उसके माध्यम से मूल रचना से नाट्यरुपांतरण की प्रक्रिया एवं मंच हेतु चरित्र निर्णय और निर्माण की प्रक्रिया पर विचार करना है।

छह खंड वाली इस उपन्यासिका के पहले खंड में केंद्रीय चरित्र प्रोफेसर निकोलाई स्टेपानोविच (Nikolay Stepanovitch) कहता है कि “मेरी याददाश्त कमज़ोर हो गई है; मेरे विचारों में अनुक्रम की कमी है और जब मैं उन्हें कागज पर उतारता हूं, तब मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि मैंने उनकी सहजता खो दी है; उसकी संरचना एकरस है; मेरी भाषा ख़राब और कमजोर है। अकसर मैं वही लिखता हूँ, जो मेरा मतलब नहीं होता।” [संदर्भ-3, Chekhov] चेखव चाहता है कि पाठक निकोलाई की स्मृति और लेखन दोनों को विश्वसनीय या एकदम प्रामाणिक नहीं माने।

इसी अविश्वसनीय प्रोफेसर निकोलाई स्टेपानोविच की भूमिका में स्वयं निर्देशक बहरुल इस्लाम थे। बहरुल का प्रोफेसर इतना जिंदादिल है कि उससे हर किसी को लगाव हो जाये या इतना अक्खड़ है कि पैसे देनेवाले अयोग्य PhD छात्र को निकाल देता है। कौन इस किरदार को पसंद नहीं करेगा! और बहरुल का प्रोफेसर इतना बेचारा है कि उसकी पत्नी हर दिन देखती है कि वह मरा कि नहीं। ऐसे में अपने मित्र के मरने के बाद उसकी अनाथ बेटी कात्या, जो नाटक को दिन-रात ओढ़ती-बिछाती है, से ‘आदर्श प्रेम’ हो जाता है। बकौल बहरुल इस्लाम के शब्दों में ‘यह (‘द बोरिंग स्टोरी’) एक बुजुर्ग प्रसिद्ध प्रोफेसर और एक युवा महत्वाकांक्षी अभिनेत्री (कात्या) की समय के साथ विकसित हुई एक आदर्श प्रेम कहानी है। उन्हें एक-दूसरे से जुड़कर ही अपने अकेलेपन और अशांत मन से सुकून और राहत मिलती हैं।’ [संदर्भ-4] क्या बहरुल के द्वारा रंगमंच के लिए निर्मित प्रोफेसर का चरित्र और चेखव के प्रोफेसर का चरित्र एक ही है? चेखव के शब्दों में “मेरे (‘द बोरिंग स्टोरी’ के प्रोफेसर) नायक के बारे में बात यह है “वह अपने आस-पास के लोगों की परवाह नहीं करता है। उसके करीबी लोग आँसू बहाते हैं, गलतियाँ करते हैं, झूठ बोलते हैं, लेकिन वह तटस्थ रूप से उन्हें थिएटर या साहित्य पर व्याख्यान देता है।” [संदर्भ-5, Chekhov] स्पष्ट है कि चेखव का यह नायक ‘प्रोफेसर‘ दूसरे को प्रेम देने में अक्षम है। इसलिए इस प्रश्न पर भी विचार करते हैं कि क्या सच में “ए बोरिंग स्टोरी” एक प्रेम कहानी है। प्रस्तुति में एक जगह कात्या प्रोफेसर से कहती भी है कि मुझसे शादी करोगे। बहरुल इस्लाम की प्रस्तुति का यह नायक-नायिका वाला प्रेम मॉडल चेखव के “ए बोरिंग स्टोरी” में नहीं है। चेखव की कात्या साफ कहती है “शादी करने लायक कोई नहीं है। इसका (शादी का) कोई कारण भी नहीं है।” [ संदर्भ-6, Chekhov] चेखव की कात्या ने दो जगह कहा कि प्रोफेसर को अपना पिता मानती है “आप मेरे पिता हैं…..मेरे एकमात्र मित्र!” [संदर्भ-7, Chekhov] “मैं आपको अपने पिता और अपने एकमात्र दोस्त के रूप में प्यार करती थी।” [संदर्भ-8, Chekhov] चेखव का प्रोफेसर भी कात्या के बारे में कहता है कि “मैंने उसके पिता का स्थान लिया और उसे एक बेटी की तरह प्यार किया !” [संदर्भ-9, Chekhov]

कात्या और प्रोफेसर निकोले स्टेपानोविच के संबंध का मनोवैज्ञानिक अन्वेषण फ्रायड के स्थानांतरण (Transference) और प्रतिसंक्रमण (Countertransference) की मनोविश्लेषणात्मक अवधारणाएँ (अवधारणाओं)से संभव है। स्थानांतरण (Transference) अवधारणा के अनुसार कोई व्यक्ति अतीत के किसी ‘एक व्यक्ति से रिश्ते की छवि’ को वर्तमान में ‘अन्य व्यक्ति से रिश्ते’ में देखता है। प्रतिसंक्रमण (Countertransference) अवधारणा के अनुसार उस पिछले रिश्ते से जुड़े सभी विचारों और भावनाओं को नये और दूसरे रिश्ते में प्रक्षेपित कर देता है। निकोले अपने अतीत में अपने बेटे और बेटी में अपने समान बौद्धिकता का अभाव पाता है, जो एक पिता के रुप में वह अपनी संतान में देखना चाहता था। “मैं उसी समय अपने बेटे के बारे में भी सोचता हूं, जो वारसॉ में अधिकारी है। वह एक चतुर, ईमानदार और शांत व्यक्ति है। लेकिन मेरे लिए ये काफी नहीं है। अपने बच्चों के बारे में ऐसे विचारों ने मेरे अंदर जहर भर दिया।” [संदर्भ-10, Chekhov] निकोले के अतीत का यह अनुभव कात्या से उसके वर्तमान संबंध को अवचेतन में परिभाषित करता है और निकोले के लिए कात्या उसकी इच्छित बौद्धकिता वाली संतान थी। निकोले कात्या के बारे में कहता है कि “वह मेरे जैसी ही थी। मैं भी सुंदर कपड़ों और अच्छी खुशबू का शौकीन हूं।” [संदर्भ-11, Chekhov] यह लगाव कात्या के अंदर मौजूद बौद्धिक और कलात्मक प्रतिभा के कारण है और वह घंटो उससे नाटक पर बात करता है। वह कात्या के पत्र की भाषा पर मोहित है “इसके बाद के पत्र पहले की तरह ही शानदार थे, लेकिन अब उनमें अल्पविराम और विराम ने अपनी सही जगह बना ली है, व्याकरणिक गलतियाँ गायब हो गईं, और उनमें एक स्पष्ट रूप से मर्दाना स्वाद था। [संदर्भ-12, Chekhov] चेखव के पात्रों के वर्तमान के संबंधों पर अनसुलझे पारिवारिक संघर्षों और अतीत की असफलता का अचेतन प्रक्षेपण होता है। स्पष्ट है प्रोफेसर और कात्या के मध्य नायक- नायिका वाला प्रेम नहीं था, बल्कि मित्रता और पिता एवं पुत्री के संबंध का मिश्रण था। चेखव मानवीय संबंधों के बने बनाये खांचों के विपरीत ऐसे मानवीय संबंध की बात कर रहे हैं, जो दो व्यक्ति के बीच विशेषीकृत ख़ास संबंध है और जो किसी दो अन्य व्यक्ति के बीच संभव नहीं है। प्रोफेसर को एक विशेष संबंध की जरूरत थी, जो उसकी बौद्धिक भूख को संतुष्ट कर सके और कात्या को एक पितानुमा और कलानुरागी मित्र चाहिए था। बहरुल इस्लाम यहाँ सही है कि “उन्हें एक-दूसरे से जुड़कर ही अपने अकेलेपन और अशांत मन से सुकून और राहत मिलती हैं।” मगर प्रोफेसर और कात्या के मध्य प्रेम का मॉडल लेने के कारण कथा की मूल भावना पर से फोकस धुंधली हुई है। तब प्रश्न है कि अगर एक प्रेमकथा नहीं है, तब यह किस प्रकार की कथा है? और इस लिखित साहित्यिक कथा का नाट्यांतरण कैसे होगा? “Thou Whose Spell Can Raise the Dead ” मतलब “तू ,जिसका मंत्र, मृतकों को उठा सकता है।” [संदर्भ –13, Lord Byron ] लिखित साहित्य भी लार्ड बायरन की उक्त कविता के मंत्र की तरह होता है। लिखे जाने के बाद साहित्य के नाट्यरुपांतरण में हमारे द्वारा लिखे शब्द को दुबारा जन्म देने की आवश्यकता होती है क्योंकि साहित्य आमतौर पर एक पृष्ठ पर मुद्रित शब्दों के रूप में हमारे पास आता है, निर्जीव, मौन और मृत। इसलिए एक रचना का नाट्य रूपांतरण करना मृतकों को उठाना है। एक जोखिम भरा खेल। और कथा का नाट्यमंचन कहानी पाठ से भी ज्यादा खतरनाक और जोखिम वाला खेल होता है, क्योंकि इसमें केवल स्याही सी काली और मृत कहानी को जीवित करना मात्र नहीं होता है, बल्कि उसे कथा के शरीर से निकाल कर अभिनेता के शरीर में परकाया प्रवेश भी करवाना होता है। बिना कथा-साहित्य के मूल अर्थ या केंद्रीय विषयवस्तु या थीम को समझे उसका उचित नाट्यांतरण या परकाया प्रवेश संभव नहीं है। इस कथा-साहित्य के मूल अर्थ या केंद्रीय विषयवस्तु या थीम को समझने के लिए पहले चेखव की मूल रचना ‘द बोरिंग स्टोरी’ के बनने की जन्म कथा और इसके पीछे तीन मृत्यु कथाओं को समझना होगा।

 

अथ मृत्यु-कथा उर्फ ‘द बोरिंग स्टोरी’ जन्मकथा

पहली मृत्यु थी चेखव की, निकोलाई चेखव की। निकोलाई अंतोन चेखव का छोटा भाई था, जो TB (tuberculosis) से बीमार था। चेखव ने एक से अधिक बार निकोलाई को बचाया था, कभी लेनदारों से और कभी सैन्य ड्राफ्टिंग से। चेखव ने रोगी निकोलाई से झूठ भी बोला और यह विश्वास दिलाया कि वह TB से भी ठीक हो जाएगा, जबकि 1889ई में TB एक लाइलाज रोग था और TB से मृत्यु निश्चित थी। उस समय रोगियों से गंभीर जानकारी छिपाना आम चिकित्सा पद्धति थी। पर इस बार निकोलाई को चेखव बचा नहीं पाया। चेखव ने प्लेशचेयेव को लिखा, ‘हमारे परिवार को अभी तक मृत्यु का पता नहीं था, और पहली बार हमारे घर पर एक ताबूत देखना पड़ा’ (26 जून 1889)। “मौत एक-एक करके लोगों को छीन लेती है।” [संदर्भ –14, Chekhov ] सुमी में अंतिम संस्कार के बाद दूसरे भाई अलेक्जेंडर चेखव ने मॉस्को में काम कर रहे अपने पिता को पत्र लिखा कि परिवार के बीच केवल एंटोन नहीं रोया था, ‘और यह भयानक है’। अंतिम संस्कार के बाद चेखव क्रीमिया गया और वहाँ एक महीना बिताया। और उस एक महीने के प्रवास में ‘ए बोरिंग स्टोरी’ (‘स्कुचनिया इस्तोरिया’, 1889) लिखी गयी।

इवान इलिच की मृत्यु की छाया

दूसरी मृत्यु इवान इलिच की थी। इवान इलिच कोई व्यक्ति नहीं था बल्कि टॉल्स्टॉय की 1886ई में प्रकाशित कहानी “द डेथ ऑफ इवान इलिच” का पात्र था। समकालीन आलोचक अरिस्टारखोव की नजर में चेखव की ‘ए बोरिंग स्टोरी‘ इसी कथा की एक नकल थी “अजीब बात है, इतना (चेखव जैसा) मौलिक लेखक कैसे नकल के जाल में फंस सकता है”, ऐसा उसने रस्किये वेदोमोस्ती में लिखा। [संदर्भ –15, अरिस्टारखोव]

पर मामला नकल का नहीं है, रचनात्मक मतांतर का है। चेखव एक तरफ टॉल्स्टॉय की रचनात्मकता को कालजयी मानता था, मगर दूसरी तरफ टॉल्स्टॉय के इस आग्रह को मूर्खतापूर्ण मानता था कि टॉल्स्टॉय अपनी रचनाओं में मानव से ऊपर अकसर नैतिकता, आध्यात्मिकता और सार्थक जीवन की खोज के व्यापक सवालों को रखता था। चेखव के ही शब्दों में “टॉल्स्टॉय मानव जाति की अमरता से इनकार करते हैं, लेकिन हे भगवान, उनके (टॉल्स्टॉय के) दृष्टिकोण में कितनी व्यक्तिगत शत्रुता है! मैं परसों उनका “आफ्टर-वर्ड” पढ़ रहा था और यह “द लेटर्स टू ए गवर्नर्स वाइफ” से अधिक मूर्खतापूर्ण  है, जिससे मैं घृणा करता हूँ। सभी महान बुद्धिमान व्यक्ति जनरलों की तरह निरंकुश और जनरलों की तरह ही असभ्य और असंवेदनशील होते हैं क्योंकि वे अपनी दण्डमुक्ति के प्रति आश्वस्त होते हैं।” [संदर्भ-16, Chekhov]

यह कोई गुप्त ज्ञान नहीं है कि टॉल्स्टॉय अपने जीवन की सांध्य बेला में काफी नैतिकतावादी हो गए थे। इस काल में लिखित “द डेथ ऑफ इवान इलिच” का पात्र इवान है, जिसको अपने जीवन के ढलते क्षणों में ,मृत्यु की छाया में, अपने अब तक के जीवन की कृत्रिमता का बोध होता है और वह प्रामाणिक या नैतिक जीवन के प्रश्न से जूझता है। अपने आखिरी क्षणों में इवान करुणा और सहानुभूति से भर जाता है और बेटी और पत्नी के लिए उसकी नफ़रत अचानक दया में बदल जाती है। इससे अंत में मृत्यु का आतंक समाप्त हो जाता है, जो टॉल्स्टॉय की इस धारणा को प्रतिध्वनित करता है कि मृत्यु स्वयं मिट जाती है। यह कहानी मार्च 1886 में लिखी गई थी, जो टॉल्स्टॉय के रचना जीवन का उत्तरकाल था। तब टॉल्स्टॉय लगभग साठ वर्ष का था और मानता था कि कथा साहित्य की उत्कृष्ट कृतियाँ लिखना ‘एक पाप’ था। टॉल्स्टॉय ने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वह अपने मध्य जीवन के महान पापों ‘युद्ध और शांति’ और ‘अन्ना करेनिना’ के बाद अब केवल आम लोगों के लिए, किसानों के लिए या स्कूली बच्चों के लिए पवित्र शैक्षिक दंतकथाएँ, नैतिक परीकथाएँ या इसी तरह की सरल नैतिक शिक्षावाली कहानियाँ लिखेगें। “द डेथ ऑफ इवान इलिच” में इसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने का आधा-अधूरा प्रयास किया गया है। बकौल व्लादिमीर नाबोकोव “टॉल्स्टॉय का सूत्र” है कि आध्यात्मिक मनुष्य सार्वभौमिक ईश्वर-प्रेम के क्षेत्र में लौटता है। कथा में इवान भी एक बुरा जीवन जीता है और चूंकि बुरा जीवन आत्मा की मृत्यु के अलावा और कुछ नहीं है, इसलिए इवान की मृत्यु एक नए जीवन में बदलने की प्रक्रिया भर है- नए शानदार जीवन में।“[ संदर्भ-17, Nabokov]

चेखव को इस निर्धारित नैतिकतावादी दृष्टिकोण से चिढ़ थी। चेखव की रचनाएं व्यक्तिगत जीवन की सूक्ष्मताओं और मानव अस्तित्व की अंतर्निहित अस्पष्टता पर अधिक केंद्रित होती थीं। चेखव की यह कहानी टॉल्स्टॉय के नैतिकतावादी दृष्टिकोण के प्रति प्रतिक्रिया थी। शायद निकोले स्टेपानोविच टॉल्स्टॉय के लिए proxy या प्रतिरुप या जवाब है।

यहाँ एक दूसरी बात भी है कि इस मतांतर के बाद भी चेखव टॉल्स्टॉय की रचनात्मकता पर मोहित थे।  चेखव के ही शब्दों में टॉल्स्टॉय की भाषा आउटडेट हो सकती है, मगर उनकी कथा नहीं। टॉल्स्टॉय नैतिकतावादी आग्रह के बाद भी जब लिखता था, तो नैतिक दर्शन से अधिक लेखकीय रचनात्मकता हावी रहती थी और इसीलिए “द डेथ ऑफ इवान इलिच” टॉल्स्टॉय की सबसे कलात्मक और सबसे परिष्कृत कृति मानी जाती है। इसलिए जब चेखव तीन साल बाद अपने भाई की मृत्यु के बाद मिले मृत्युबोध के बाद 1889ई में ‘ए बोरिंग स्टोरी’ लिख रहा था, तो इसपर टॉल्स्टॉय और “द डेथ ऑफ इवान इलिच” की छाया चेतन और अवचेतन दोनों स्तर पर चेखव पर पड़ रही थी,….कथा और भाषा दोनों स्तर पर पड़ रही थी। यह कहानी टॉल्स्टॉय के जवाब में लिखी गयी थी, संभवत: इसलिए इस कहानी में साहित्य या दर्शन पर लंबे संवाद चेखव की अन्य कहानियों से अधिक पाए जाते हैं । कात्या की कई टिप्पणियाँ मानो सीधे-सीधे टोल्सटॉय के लिए कही गयी हों कि कला को “उन्होंने अखबारों के अपने चिर-परिचित खबरों से और चतुर लोगों ने दर्शन से इसे अश्लील बना दिया है।” ”दर्शनशास्त्र का इससे कोई लेना-देना नहीं है।” “हाँ यदि कोई इसके बारे में दार्शनिक विचार करता है, तो इससे पता चलता है कि वह इसे नहीं समझता है।”[संदर्भ-18, Chekhov]

शायद लेखन के इस दबाव को चेखव भी महसूस कर रहे थे। स्वयं चेखव के मन में ‘ए बोरिंग स्टोरी’ के प्रति कई तरह की शंकाएं थीं। बकौल चेखव, “मैंने अपने जीवन में कभी भी इस तरह का कुछ नहीं लिखा है। ऐसे विषय मेरे लिए बिल्कुल नए हैं और मैं अपनी अनुभवहीनता से थोड़ा सावधान हूं। दूसरे शब्दों में, मैं कुछ भी बेवकूफी भरा नहीं लिखना चाहूंगा।” ।” [संदर्भ-19, Chekhov]

जवाब में कवि मित्र एलेक्सी प्लेशचेयेव (Aleksey Pleshcheyev) ने चेताया कि “यह सबसे गहरी, सबसे मजबूत चीज़ है जो तुमने आज तक लिखी है। बूढ़े वैज्ञानिक (प्रोफेसेर) का टाइप शानदार है और यहां तक कि उन क्षणों में भी जब उसकी सोच तुम्हारे जैसी लगती है, पर कहानी खराब न कर लेना।” [संदर्भ-20, Aleksey Pleshcheyev] एलेक्सी प्लेशचेयेव ने चेखव को शीर्षक बदलने को भी कहा। पर चेखव ने शीर्षक बदलने से इंकार कर दिया। दरअसल चेखव पहले ही शीर्षक बदल चुका था और वह भी एलेक्सी प्लेशचेयेव के कहे अनुसार ही। पहले ही पांडुलिपि पढ़ कर प्लेशचेयेव ने चेखव को चेतावनी दी थी कि पारंपरिक कथानक की कमी और तर्क-वितर्क की अधिकता के कारण ‘बहुसंख्यकों को कहानी निस्संदेह बोरिंग लगेगी’। [संदर्भ–21, Aleksey Pleshcheyev] लिखते समय इसका पहला शीर्षक ‘माई नेम एंड आई’ (‘My Name and I’) था, मगर प्लेशचेयेव की प्रतिक्रिया के बाद ही चेखव ने इसका शीर्षक बदल कर ‘ए बोरिंग स्टोरी’ कर दिया।

 

A Boring Story 2

स्व मृत्यु कथा

 

तीसरी मृत्यु स्वयं एंतोन चेखव की थी। चेखव की मृत्यु 1904 में हुई थी, मगर इसकी शुरुआत 1884ई में हो चुकी थी, जब चेखव को खून की खांसी हुई। 1886 में दौरे बदतर हो गए, लेकिन चेखव ने अपने परिवार या दोस्तों को अपने TB के बारे में नहीं बताया। “… मैं बीमार हूं। खून और कमजोरी के बावजूद… मुझे दक्षिण जाना चाहिए लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैं अपने सहकर्मियों के सामने जाने से (खांसी के कारण) डरता हूं। [संदर्भ –22, Chekhov] इसलिए ‘ए बोरिंग स्टोरी’ को चेखव की आपबीती मानने वाले (वाला)एक बड़ा वर्ग है। एलेक्सी प्लेशचेयेव और अन्य कई लोगों ने चेखव से यह बात कही कि वैज्ञानिक (प्रोफेसर) चेखव ही है क्योंकि वह चेखव की तरह डॉक्टर है और वैसा ही सोचता भी है। [संदर्भ-23, Chekhov] कहानी का पहला शीर्षक ‘माई नेम एंड आई’ था, वह भी इस ओर ही संकेत कर रहा था।1889ई में चेखव की “ए ड्रियरी/बोरिंग स्टोरी” अभी-अभी प्रकाशित हुई थी और उसके प्रकाशन ने इस तरह की चर्चाओं और गलत अपवाहों को जन्म दिया। सभी ने प्रशंसा तो की लेकिन सुवोरिन, ग्रिगोरोविच और प्लेशचेयेव जैसे लोगों ने इसमें वे बातें भी देख लीं, जो चेखव ने कभी कहने का इरादा नहीं किया था। इस कहानी से यह ग़लतफ़हमी फैली कि कहानी का प्रोफेसर चेखव ही है और निराश चेखव ने कुछ समय के लिए साहित्य से दूर जाने का निर्णय लिया है। इस बात पर चेखव ने आपत्ति जताई और कहा कि ‘अगर कोई आपको कॉफी परोसता है, उसमें बीयर ढूंढने की कोशिश न करें। यदि मैं आपको प्रोफेसर के विचारों से अवगत कराता हूं, तो मुझ पर विश्वास रखें और उनमें चेखवियन विचारों की तलाश न करें’ [संदर्भ-24, Chekhov] बात यह है कि निकोलाई की मृत्यु, टॉल्स्टॉय के रचनात्मक कद और चेखव की आपबीती की  छायाओं में “ए ड्रियरी या बोरिंग स्टोरी” को अवश्य देखना चाहिए, मगर चेखव की बात मानते हुए

कॉफी में बीयर नहीं खोजना चाहिए।

“ए बोरिंग स्टोरी” में मृत्यु

इसके बाद तो एक बार फिर देखना होगा कि “ए बोरिंग स्टोरी” में मृत्यु कथा खोजना कॉफी में बीयर खोजने जैसा तो नहीं है। “ए बोरिंग स्टोरी” के पहले अंक की अंतिम पंक्ति है “जब मुझ पर टिक डौलोरेक्स का दौरा पड़ता है तो मेरे चेहरे पर एक अजीब अभिव्यक्ति होती है, जिसे देखकर हर किसी के मन में विचार उत्पन्न हुआ होगा कि यह आदमी जल्द ही मर जाएगा।” [संदर्भ-25, Chekhov] “मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मैं अगले छह महीने से अधिक जीवित नहीं रह सकता” [संदर्भ-26, Chekhov] “ए बोरिंग स्टोरी” के अंतिम छठे अंक में कात्या से अंतिम विदाई के समय भी वह प्रेम की नहीं मृत्यु की बात कहना चाह रहा है “मैं उससे पूछना चाहता हूं, तुम मेरे अंतिम संस्कार में नहीं आओगी?” इसके अलावा कई अन्य जगह प्रोफेसर की चाह मृत्यु ही है- मुझे एक आदमी की तरह मरना होगा [संदर्भ-27, Chekhov] “मुझे कहो कि डूब जाओ; तुम्हें यही करना चाहिए।” [संदर्भ-28, Chekhov] “या मुझे लगा कि हर चीज़ मुझे देख रही है और मेरे मरने का इंतज़ार कर रही है।” [संदर्भ-29, Chekhov] “मैं वहीं उसी सीढ़ी पर मर जाऊँगा,” सोचा। “‘उसी स्थान पर…।” [संदर्भ-30, Chekhov] मैं आधी रात के बाद उठा ….. किसी कारण से मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं तुरंत ही मरने वाला हूँ।[संदर्भ-31, Chekhov] “ए बोरिंग स्टोरी” की दूसरी प्रमुख चरित्र कात्या का कथा में प्रवेश भी पिता की मृत्यु और उसके अनाथ होने से शुरु होता है “ अठारह साल पहले मेरा एक सहकर्मी, एक नेत्र रोग विशेषज्ञ, एक छोटी सात साल की बच्ची कात्या और साठ हजार रूबल छोड़कर मर गया।[संदर्भ-32, Chekhov] बाद में कात्या ने एक पत्र में आत्महत्या करने की इच्छा भी व्यक्त की “मुझे बेरहमी से धोखा दिया गया है। मैं जीवित नहीं रह सकती। मेरे धन का जैसा आप उचित समझें निपटारा कर दें। [संदर्भ-33, Chekhov] बाद में कात्या का एक और मृत्युपत्र प्रोफेसर को मिलता है जिसमें वह कहती है “इस पत्र की निराशा के लिए क्षमा करें; कल मैंने अपने बच्चे को दफनाया। [संदर्भ-34, Chekhov] इस कथा में मृत्यु बार- बार आती है और कथा की घटनाओं की मुख्य उत्प्रेरक है। और किसी करीबी की मृत्यु मन में एक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, जिसमें विषय और वस्तु के बीच या स्वयं और अन्य के बीच या मृतक या जीवित के बीच के अंतर का बोध नहीं रहता है और इसके कारण तय अर्थ और तर्क खतरे में पड़ने लगते हैं। “ईश्वर के बिना और विज्ञान के बाहर देखी गई लाश तय अर्थों के नाश का बड़ा कारण होती है। मृत्यु जीवन को परिभाषित और संक्रमित करने लगती है। ऐसी प्रतिक्रिया के कारण के तौर पर प्राथमिक उदाहरण लाश है, जो दर्दनाक रूप से हमें हमारी अपनी मृत्यु की याद दिलाती है।” [संदर्भ–35, Julia Kristeva]। इस उपन्यासिका में प्रोफेसर निकोले का बिगड़ता स्वास्थ्य और शरीर भी अदृश्य भय का स्रोत है। जब निकोले अपने भौतिक स्व के विघटन का सामना करता है, उसे जीवन भर की उपलब्धि शून्य लगती है और उसका स्वयं का प्रिय काम ‘छात्रों को पढ़ाना’ अब एक टार्चर सा लगता है। प्राचीन ग्रीक पौराणिक कथाओं में थानाटोस मृत्यु के मानव अवतार का प्रतिनिधित्व करता था। फ्रायड ने थानाटो या मृत्यु वृत्ति की अवधारणा पेश की, जिसमें कहा गया कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से मृत्यु और विनाश की ओर झुका हुआ है। “सभी जीवन का उद्देश्य मृत्यु है।” [संदर्भ–36, Freud] इन अर्थों में “ए बोरिंग स्टोरी” की केंद्रीय विषय वस्तु या थीम मृत्यु है।

फ्रायड ने डेथ ड्राइव अवधारणा के साथ ही जीवन ड्राइव अवधारणा भी पेश की थी, जिसके अनुसार अस्तित्व या आनंद का बुनियादी पहलू जीवन को बनाये रखता है, जो मृत्यु वृत्ति के समानांतर जीवन वृति या जीवन ड्राइव होती है। जीवन ड्राइव की प्रवृत्ति में प्यास, भूख और दर्द से बचाव जैसी प्रेरणाएँ भी शामिल होती हैं। प्रेम, उर्वरता और जुनून के प्राचीन ग्रीक देवता इरोस के नाम पर फ्रायड ने इसे इरोस वृति भी कहा है। एक तरफ प्रोफेसर और कात्या के जीवन का उद्देश्य मृत्यु था, दूसरी तरफ दोनों एक दूसरे के लिए जीवन ड्राइव भी थे। इसलिए अपनी मृत्यु के इंतजार के दर्द से बचने के लिए प्रोफेसर कात्या से मिलता है और कात्या भी अपने पुत्र की मृत्यु में अपनी मृत्यु देखती है, इसलिए बकौल बहरुल इस्लाम के शब्दों में “उन्हें एक-दूसरे से जुड़कर ही अपने अकेलेपन और अशांत मन से सुकून और राहत मिलती हैं।’ साराँश यह कि चेखव ने इस कथा को प्रेम से अधिक म़त्युकथा के रुप में डिजाइन किया है। इस अवधारणा या केंद्रीय विषय वस्तु या थीम के साथ चेखव प्रोफेसर निकोले स्टेपानोविच और बहुरुल के प्रोफेसर के चरित्र की तुलना करते हैं।

 

चरित्र निर्णय और निर्माण- खंडित प्रोफेसर

‘चरित्र’ या ‘चरित्र की स्थिरता’ की अवधारणा एक सुविधाजनक मगर भ्रामक अवधारणा है। अभिनवगुप्त ने कहा है “चलं हि गुणवृत्तमिति हि तत्र भवन्तः। अतएव  प्रयोगवैचित्रयम्‌।” अर्थात गुणों का वृत्त ( नियमरूप चरित्र) चल है, स्थिर नहीं है। अतएव गुणों के चल होने से ही प्रयोगों में वैचित्र्य आता है। [ संदर्भ –37, अभिनवगुप्त ] चेखव के निकोले की पहचान एक स्थिर इकाई नहीं है बल्कि सामाजिक अपेक्षाओं, व्यक्तिगत इतिहास और सांस्कृतिक प्रभावों से प्रतिक्रिया का एक कोलाज है, जो संदर्भ के अनुरूप निरंतर बदलता रहता है, जो उसके चरित्र की स्थिर पहचान को खंडित करता है। पहले अंक में निकोले स्टेपानोविच समाज के लिए एक प्रतिष्ठित व्यक्ति है, मगर वर्तमान में वह अपनी पहचान के विघटन से जूझ रहा है। एक प्रोफेसर, पति और पिता के रूप में उनकी भूमिका असम्बद्ध चरित्र-प्रदर्शनों की एक श्रृंखला बन जाती है, जो व्यक्ति की पहचान की बहुलता है। यह एक स्थिर चरित्र की रूढ़ि और कृत्रिमता को दर्शाती है। चेखव ने बाहरी प्रभावों में निकोले की पहचान को अस्थिर रखा है।निकोले बौद्धिक गतिविधियों में व्यस्त रहता है, जो उसकी अपनी इच्छाओं की खोज के विरुद्ध एक रक्षा तंत्र के रूप में कार्य करता है। आंतरिक अनुभवों से उसका अलगाव सतह के नीचे छिपी मौलिक इच्छाओं को दबाने और नियंत्रित करने का एक अचेतन प्रयास है।

चेखव ने योजनापूर्वक निकोले के चरित्र का निर्माण किया ताकि उसके शानदार अतीत और मोहभंग की वर्तमान स्थिति के बीच स्पष्ट अंतर पर जोर दिया जा सके। कहानी निकोले के आंतरिक संघर्षों पर प्रकाश डालती है, जो उसकी चेतना में व्याप्त अस्तित्व संबंधी चिंता को उजागर करती है। चेखव पाठकों को निकोले के दिमाग में झांकने के लिए एक खिड़की प्रदान करने के लिए आत्मनिरीक्षणात्मक मोनोलॉग या एकालाप का उपयोग करते हैं, जिससे हम जीवन के प्रति उनके उत्साह के क्षरण को देख सकते हैं।

चेखव ने दूसरे खंड में कात्या का परिचय और जीवन की घटनाएं को भी पत्र के माध्यम से रखा है, जो पत्र पाठक प्रोफेसर और पत्र लेखक कात्या का अलग- अलग मोनोलॉग है। चेखव की “ए बोरिंग स्टोरी” छह अंकों में थी, जिसे बहरुल ने पाँच दृश्य अंकों में बदला है। अंक एक में वस्तुतः प्रोफेसर का परिचय है, आत्मनिरीक्षण और शायद असंतोष की भावना से चिह्नित एक चरित्र के लिए मंच तैयार करता है। इससे प्रोफेसर की मानसिकता की झलक मिलती है।

अंक दो में पत्नी और कात्या या एकातेरिना व्लादिमीरोवाना का परिचय है। दोनों अंक मूलत मोनोलॉग है, और प्रोफेसर के दृष्टिकोण से है, इसलिए दूसरा अंक पत्नी या कात्या का परिचय होते हुए भी प्रोफेसर का ही परिचय है। पत्नी एकरस जीवन के प्रतीक के रुप में है। “हर सुबह बिल्कुल एक जैसी ही बात होती है। आमतौर पर मेरे स्वास्थ्य के बारे में चिंतित पूछताछ के बाद, वह अचानक हमारे बेटे का उल्लेख करती है जो वारसॉ में एक अधिकारी है। हर महीने की बीसवीं तारीख के बाद हम उसे पचास रूबल भेजते हैं और यही हमारी बातचीत का मुख्य विषय होता है।” [संदर्भ-38, Chekhov] जिस पत्नी से कभी प्रेम विवाह हुआ था, उसके बारे में इतना मशीनी विवरण प्रोफेसर की नीरसता की हद तक की तटस्थता को ही दिखाता है। इन्ही पत्रों में कात्या के खुद अपने बेटे के साथ दफनाने का विवरण है जो बाद के उसके जीवन की कड़वाहट का स्रोत है। पत्नी और कात्या के पात्र परिचय को चेखव ने मोनोल़ॉग के द्वारा करवाया था, पर बहरुल ने उस मोनोलॉग को कई जगह संवाद में बदल दिया है। यह न केवल चेखव के चरित्र- योजना के विपरीत है, बल्कि कथा की मूल चेतना ‘अनिवार्य अकेलापन’ के भी विपरीत है। चेखन ने इसे संवाद के तौर पर नहीं कहा बल्कि मोनोलॉग के रुप में रखा है, तो इसका एक मकसद यह था कि संवादहीनता को दर्शाना और पात्रों के अपने आंतरिक गुप्त विचारों और संघर्षों को व्यक्त करना।

बहरुल ने दूसरे अंक का लोप किया है और इस अंक के कात्या के जीवन की दुर्घटनाओं को तीसरे अंक वाले कात्या के घर वाले दृश्य में संवाद में कहलवाया है। इससे चेखव के गैर ऱेखीय कथा क्रम में भी बदलाव आता है और प्रस्तुति में कथा लगातार घटती घटना के रुप में दिखाया गया (दिखायी गई)है। चेखव निकोले के चरित्र के विघटन को दिखाने के लिए एक गैर-रेखीय अस्थायी कथा क्रम का उपयोग करते हैं। निकोले स्टेपानोविच का चरित्र असंबद्ध यादों, सपनों और विचारों के मिश्रण के रूप में सामने आता है। यह अस्थायी अलगाव समकालीन वास्तविकता की खंडित प्रकृति को प्रतिबिंबित करता है, जहां अतीत, वर्तमान और भविष्य एक अव्यवस्थित सातत्य में सह-अस्तित्व में हैं। गैर-रैखिक कथा हमारी पारंपरिक अपेक्षाओं को बाधित करती है और पाठकों को कथा के टुकड़ों को अलग -अलग संदर्भ  में अलग पाठ की ओर ले जाती है एवं अलग-अलग भावबोध देती है। कथा अतीत और वर्तमान के बीच निर्बाध रूप से बदलती रहती है, जो निकोले की चेतना की खंडित प्रकृति को दर्शाती है।

इसी अविश्वसनीय और खंडित प्रोफेसर निकोलाई स्टेपानोविच की भूमिका में स्वयं निर्देशक बहरुल इस्लाम थे। बहरुल इस्लाम का यह अभिनय जीवन भर के लिए एक अनुभव की तरह था। शब्द और मौन ध्वनि हो या गतिशील आंगिक अभिनय हो या स्थिर मुद्रा हो, हर स्तर पर बहरुल जादू कर रहे थे। बहरुल द्वारा प्रापर्टी का इस्तेमाल कुछ ऐसा था, मानो कि वह उनके शरीर का ही विस्तार हो। कात्या के कमरे वाले दृश्य में बहरुल बैठकर ड्रिंक के साथ बिस्किट खा रहे थे, कात्या से मिले अप्रिय वाक्यों के जवाब में बिस्किट को हाथ में रखे ग्लास में बस धीरे से गिरा देते हैं। बहरुल के बदले बिस्किट कहती है ‘नहीं’। इसी दृश्य में कात्या प्रोफेसर को पानी का बोतल देती है, तो बहरुल धीरे ढक्कन लगाकर बोतल रख देते हैं। और इसी दृश्य में जब टेबल पर बैठ कर हुर्रा कहते हैं, तब मेरे मन में बस सेंट आफ वूमेन के अल पीचीनो की हुर्रा याद आती है। परंतु बहरुल के इस शानदार अभिनय से प्रोफेसर एक संपूर्ण और आत्मविश्वासी चरित्र के रुप में सामने आता है, जो प्रोफेसर का अतीत हो सकता है परंतु वर्तमान नहीं। वर्तमान में प्रोफेसर म़त्युबोध से त्रस्त है। मगर प्रदर्शन में शानदार अभिनय की यह सकारात्मक उर्जा मृत्युकथा के विपरीत रुप में दर्शक के अवचेतन में जाती है। यह अभिनय भावात्मक खामी है। अभिनेता भी एक माध्यम है या रंगमंच का एक फार्म है या यंत्र है, जिसके माध्यम से कथ्य को रखा जाता है। अगर अभिनेता का अभिनय कथ्य से ध्यान विपरीत दिशा में ले जाता है, तब वह सुंदर अभिनय होते हुए भी नाटक विरोधी हो जाता है। ऐसी स्थिति में ही अच्छा और सकारात्मक अभिनय मूल चरित्र के विपरीत चला जाता है और बहरुल का यह चरित्र अभिनय इस विपरीत अभिनय का उदाहरण है। अंतिम दो दृश्य को छोड़कर बहरुल का प्रोफेसर कहीं से भी चेखव का ֧“बासठ साल का आदमी, गंजा सिर वाला, नकली दांतवाला और एक लाइलाज टिक डौलौरेक्स के साथ” बेचारा नहीं दिखता है। [संदर्भ-39, Chekhov] अंतिम दो दृश्य में चेखव का खंडित प्रोफेसर दिखता है, जो चेखव को भी पसंद आता।  

यहाँ पर स्तानिस्लावस्की और चेखव अनुभव उपयोगी है। चेखव को दिखाने के लिए केवल 11 लोगों के सामने स्तानिस्लावस्की ने सीगल की प्रस्तुति की और उसके बाद चेखव की प्रतिक्रिया का बैचेनी से इंतजार कर रहे थे और स्तानिस्लावस्की के ही शब्दों में “विशेष प्रदर्शन में चेखव स्पष्ट रूप से मुझसे परहेज कर रहे थे। मैं अपने ड्रेसिंग रूम में उनका इंतजार कर रहा था, लेकिन वह नहीं आये। वह एक अपशकुन था. मैं खुद उनके पास गया। “मुझे डाँटो, एंटोन पावलोविच,” मैंने उनसे विनती की। “आश्चर्यजनक! सुनो, यह अद्भुत था! केवल आपको फटे जूते और चेकदार पतलून की आवश्यकता है। चेखव मुझे और कुछ नहीं बताएगा। इसका क्या मतलब था? वह राय व्यक्त नहीं करना चाहते थे? क्या यह मुझसे छुटकारा पाने की कोई चाल थी? क्या वह मुझ पर हंस रहा था? ट्रिगोरिन द सीगल में एक युवा लेखक था, जो महिलाओं का पसंदीदा था, कैसे अचानक उसे फटे जूते और चेक वाली पतलून पहनया जा सकता (पहनाई जा सकती)है। मैंने सबसे सुंदर वेशभूषा में (ट्रिगोरिन की) भूमिका निभाई – सफेद पतलून, सफेद कोट, सफेद टोपी, नए जूते और सुंदर मेकअप किया था। एक साल या उससे अधिक समय बीत गया। मैं फिर से ट्रिगोरिन की भूमिका निभा रहा था – और एक प्रदर्शन के दौरान मुझे अचानक समझ आया कि चेखव का क्या मतलब था। “बेशक, जूते फटे होने चाहिए और पतलून धारीदार होनी चाहिए, और ट्रिगोरिन सुंदर नहीं होना चाहिए। इस भाग का सार यह है: युवा, अनुभवहीन लड़कियों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि आदमी एक लेखक हो और भावुक उपन्यास प्रकाशित करे, और नीना ज़रेचनया, अनुभवहीन लड़कियों (लड़कियां)एक के बाद एक, उसकी गोद में पर खुद को फेंक देगी, बिना यह ध्यान दिए कि वह वह प्रतिभाशाली नहीं है, कि वह सुन्दर नहीं है, कि वह चेकदार पतलून और फटे जूते पहनता है।” इसी प्रकार का कुछ प्रयोग प्रोफेसर और कात्या के वस्त्र के साथ होना चाहिए था। यह सही है कि प्रोफेसर और कात्या सुंदर ड्रेस पहनने वाले फैशनबेल थे। प्रोफेसर कात्या को उसके सुरुचिपूर्ण ड्रेस सेंस के कारण पसंद भी करता है वह “वह मेरे जैसी ही थी। मैं भी सुंदर कपड़ों और अच्छी खुशबू का शौकीन हूं।” [संदर्भ-40, Chekhov] और अपनी बेटी लीजा के खराब ड्रेस सेंस के कारण दया करता है। प्रस्तुति में वस्त्र के चुनाव से प्रस्तुति में चरित्र उस समय धुंधला हो जाता है, जब कात्या फटा जींस पहनी है या प्रोफेसर अधिकतर वेलसुटेट दिखता है। यह एक तरह के परस्पर विरोधी चरित्र का भ्रम पैदा करता है- सचेतन और अवचेतन दोनों स्तर पर। प्रोफेसर का ड्रेस उसके आत्मविश्वासी रुप को दर्शाता है। इसलिए दोनों का वस्त्र सुरुचि पूर्ण होने के बावजूद कुछ अस्त व्यस्त या अजीब सा होना चाहिए था। वस्त्र के साथ यह बात चरित्र के स्तर पर थी। बहरुल के इस शानदार अभिनय पर मैं चेखव के वही शब्द को दोहराऊंगा, जो उन्होंने स्तानिस्लावस्की के अभिनय पर कहा था “आश्चर्यजनक! सुनो, अद्भुत था! केवल …फटे जूते और चेकदार पतलून की आवश्यकता है।”

 

रहस्यमय कात्या

मोनिका श्री दूसरे केंद्रीय पात्र कात्या की भूमिका में थी। घर वाले सीन में पत्नी द्वारा  नौकर बहादुर को बार बार बुलाने पर चिल्ला कर कहती है कि भुक्खड़ नहीं हूँ मैं। चेखव की कात्या का चरित्र इतना मेलोड्रामेटीक नहीं है। चेखव की कात्या काफी आत्म नियंत्रण वाली है, जो अपनेपुत्र की मृत्यु के बाद भी संयमित पत्र लिखती है, उसमें कहती है कि “इस पत्र की उदासी के लिए माफ करें; कल मैंने अपने बच्चे को दफनाया है।” [संदर्भ-41, Chekhov] इतने संयत चरित्र से इतने पैनिक रिएक्शन की उम्मीद नहीं की जा सकती है, यह कात्या के मूल चरित्र के विपरीत है। प्रस्तुति के अंतिम दृश्य में कात्या होटल से निकलते वक्त प्रोफसेर को मुड़ कर देखती है, जबकि मूल कथा में कात्या बिना मुड़कर देखे निकल जाती है,“ नहीं, उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैंने उसे आखिरी बार काली पोशाक में देखा।” [संदर्भ-42, Chekhov] दरअसल यह भाव-संयम पुत्र को दफनाने के बाद उसके डिफेंस मैकेनिज्म का हिस्सा था, जिसमें वह किसी भी प्रकार के भावात्मक संबंध से दूर रहती है।

यहाँ चेखव की कात्या की तुलना चेखव के ‘सीगल’ नाटक की चरित्र नीना से आवश्यक है। दोनों अभिनेत्री हैं। चेखव की ‘ए बोरिंग स्टोरी‘ की कात्या अभिनेत्री बनी, मगर जब एक बच्चे के जन्म के बाद उसके प्रेमी ने उसे छोड़ दिया तब वह अपने अभिनय के करियर और अपने जीवन के तय उद्देश्य को छोड़ देती है। दूसरी तरफ ‘सीगल’ की नीना अपने संघर्ष को जारी रखने का फ़ैसला करती है जो उसके अंतिम संवाद में दिखता है जिसमें वह एक अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान को स्वीकार करती है। बहरुल की कात्या सीगल की नीना की तरह लगती है। प्रस्तुति में बहरुल की कात्या कहती है कि वह बंबई जा रही है। एक अभिनेत्री के बंबंई जाने का मतलब सब जानते हैं कि फिल्म में करियर बनाना है। मगर चेखव की कात्या होटल से निकलते वक्त कहती है कि वह “क्रीमिया, काकेशस के लिए” जायेगी [संदर्भ-43, Chekhov] क्रीमया में काकेशस एक दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र है, जहाँ लोग एकांत के लिए जाते हैं। कात्या के द्वारा जाने के लिए बंबई का चुनाव कथा के अंत को बदल देता है, जो एक बड़ी त्रुटि है। नाट्यांतरण में कात्या को बंबई की जगह लद्दाख जाना चाहिए था, जो काकेशस की तरह संभवत: उसके ऐकांतिक जीवन के चुनाव का संकेत होता।

चेखव ने कात्या के अस्तित्व को नाटकीय रखा है, जो पहले रंग अभिनेताओं से प्रेम करती थी और बाद में घृणा। चेखव ने कात्या के द्वारा अपने जीवन में स्वतंत्र निर्णय लेने और उसके द्वारा दूसरे के जीवन का अनुकरण करने के बीच की रेखाओं को धुंधला रखा है। चेखव पाठकों को कात्या की भावनाओं और कार्यों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह अर्थ कथा की घटनाओं के बदले कथा- व्यवस्था से निकलती है। चेखव का कथात्मक तत्वों का यह मेनुपलेशन कहानी कहने की संरचनाओं या कथा- व्यवस्था से समझी जा सकती है। इसलिए चेखव की कथा तकनीक या कथा- व्यवस्था बारीकी से जांच की मांग करती है, खासकर कात्या के चित्रण में। दूसरे अंक में कात्या के बचपन से अपने बच्चे की लाश को दफन करके लौटी तिक्त असफल अभिनेत्री की कथा कही गयी है, जो पहली बार में दूसरे व्यक्ति निकोलाई के दृष्टिकोण से कही गयी है। फिर तीसरे अंक में कात्या की कथा कात्या के अपने दृष्टिकोण से कही गयी है। दो अलग – अलग दृष्टिकोण के अंतर से कथा मे अंतर आया है, जो उसके चरित्र के द्वैत को दिखाता है। पहली बार में निकोले के दृष्टिकोण से कात्या की कथा कही जाती है, तब कात्या का चरित्र मायावी बना रहता है। प्रोफेसर के विवरण में कात्या अभिनेताओं के पोस्टर लेकर घूमती रहती है और अंततः उनके जीवन का अनुकरण करती है। ऐसे क्षणों में जब कात्या स्वयं कथा कहने की बागडोर अपने हाथ में लेती है, तब कात्या अपने विवरण में रंगमंच अभिनेताओं की कमियों को कहती है। इसके भावनात्मक परिदृश्य की जटिलता उजागर होती और उसकी आंतरिक दुनिया में अंतरंग पहुंच प्राप्त होती है। कात्या के जीवन में प्रामाणिकता और अनुकरण के बीच की सीमा  धुंधली है। कात्या खंडित वास्तविकता का प्रतीक बनकर उभरती है। चेखव की कात्या का चरित्र परस्पर विरोधी पहचान का युद्ध क्षेत्र बन जाती है।

इस धुंधलेपन में कात्या के चरित्र के सही निर्धारण का सूत्र चेखन ने इसी कथा में प्रोफेसर से ही कहलवाया है- “मुझे बताओ कि तुम क्या चाहते हो, और मैं तुम्हें बताऊंगा कि तुम कैसे इंसान हो।” [संदर्भ-44, Chekhov] कात्या की चाहत से उसके चरित्र का निर्माण संभव हो सकता है। अंतिम दृश्य में कात्या की चाहत इस प्रश्न में है कि बताओ प्रोफेसर “मैं क्या करुँ’’। जीवन के अनिर्णय की अपनी प्रवृति से बाहर निकलने की चाहत से कात्या का चरित्र खुलता है। प्रोफेसर भी इस प्रश्न का जवाब नहीं दे पाता है, न कात्या के लिए और न अपने लिए। इसलिए कात्या के लिए थिएटर और निकोले के लिए बौद्धिक उपलब्धि एक मुखौटा की तरह है, जो जीवन की कठोर वास्तविकताओं के खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है एवं जिसके पीछे वे अपनी कमजोरियों और समस्या से अपने पलायन को छिपा कर रखते हैं। स्व-प्रस्तुति का यह मुखौटा उन्हें खुद का एक ऐसा संस्करण बनाने की अनुमति देती है जो उन्हें अस्तित्वगत शून्यता से बचाने का एक सुखद भ्रम देता है। कात्या की भावनात्मक दूरी संभावित चोट या अस्वीकृति से खुद को बचाने के उसके अवचेतन के प्रयासों में निहित है। 

 

स्टीरियोटाइप पत्नी

इस प्रस्तुति में चेखव के गौण पात्र ‘निकोले स्टेपानोविच की पत्नी’ को विस्तार दिया गया है। प्रोफेसर की पत्नी कथा में केंद्रीय पात्र नहीं है, मगर कहानी के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रोफेसर की पत्नी के रुप में भागीरथी बाई का अभिनय हर अभिनेता के लिए एक सबक हो सकता है, सबक यह कि अभिनेता कितना भी सक्षम हो, मगर चरित्र के लिए तैयार न हो तब एक खराब अभिनय का माध्यम बन जाता है। एक कारण यह भी हो सकता है कि यह चरित्र कोई अन्य अभिनेत्री निभा रही थी, अपरिहार्य कारण से उसके नहीं होने के कारण भागीरथी बाई ने उनका जगह लिया। परंतु एक बड़ा कारण यह है कि सहज अभिनय के बावजूद कई जगह वह शब्द का साथ नहीं दे पायीं। एक जगह वह कात्या ‘दस की उम्र’ की जगह पर ‘दस उम्र’ तक साथ रही है’ कहती हैं। एक जगह ‘आपका खाना’ रखा हुआ, आपने खाया ही नहीं’ का उच्चारण इस तरह से होता है कि ‘आपका’ में केवल ‘प’ ध्वनित होता है और सुनाई पड़ता है कि ‘प खाना रखा हुआ, आपने खाया ही नहीं। वैसे शुद्ध भाषा जैसी कोई चीज होती नहीं है, फिर भी अभिनय के दृष्टिकोण से हिंदी नाटक में आंचलिक उच्चारण अगर बिना उद्देश्य का हो तो दर्शक को भ्रम होता है। नये अभिनेता को यह कह कर सहा जा सकता है कि सीख लेगा। मगर भागीरथी बाई जैसी दशकों से सीजंड और प्रशिक्षित एक्टर आँचलिक टोन से बाहर नहीं आकर अपनी अभिनय क्षमता के साथ पूरा न्याय नहीं कर रही हैं, इस स्थिति में वे अपनी आँचलिक भाषा के नाटक में ही अपनी अभिनय क्षमता के साथ न्याय कर पाएंगी या फिर ऐसे हिंदी नाटक में जिसका पात्र उनके अंचल से हो। एक दूसरा कारण यह भी है कि अभिनेता से हर चरित्र एक समय मांगता है और संवाद का हर शब्द एक समय माँगता है और बड़ा से बड़ा अभिनेता चरित्र और शब्द की इस माँग से नहीं बच सकता। अगर अभिनेता किसी भी कारण से वह समय नहीं दे पाता है, तो अभिनेता की सारी प्रतिभा और प्रदर्शन पर कुछ छोटी गलतियाँ पानी फेर देती है। एक प्रसंग है जिसमें चेखव को दिखाने के लिए केवल 11 आदमी के सामने स्तानिस्लावस्की ने सीगल का विशेष प्रदर्शन निकित्स्की थिएटर में किया था। नाटक के बाद चेखव ने कुछ अभिनेताओं की प्रशंसा की और कुछ की आलोचना की। मगर विशेष रूप से एक अभिनेत्री का विरोध किया था, जिसके काम से चेखव पूरी तरह से असंतुष्ट थे। चेखव ने स्तानिस्लावस्की से कहा “सुनो वह मेरे नाटक में अभिनय नहीं कर सकती।” हमने (स्तानिस्लावस्की ने) बचाव किया। “लेकिन हम उससे यह भूमिका कैसे छीन सकते हैं?” ] चेखव ने क्रूरता से अभिनेत्री को हटाने के लिए यह धमकी दी “सुनो, मैं तुमसे नाटक छीन लूँगा,” [संदर्भ-45 Stanislavsk] सारांश यह है कि अभिनेता या रंगकर्मी को किसी स्तर पर नाटक की माँग से समझौता नहीं करना चाहिए या प्रतिकूल निर्णय नहीं लेना चाहिए।

साथ ही बहरुल इस प्रस्तुति में पत्नी इतनी नकारात्मक है, जिसे प्रोफेसर के इस संवाद से समझा जा सकता है, जिसमें वह पत्नी को कहता ‘अभी मरा नहीं हूं मैं’ और लगता है कि पत्नी एक लालची चरित्र है, जो अपने पति की मृत्यु का इंतजार कर रही है। चेखव के स्त्री पात्रों का अपना विवरण भी कभी-कभी स्त्री विरोधी स्वर लिए होता है, जिसमें स्त्री पात्र प्राय: मेधाहीन होती हैं। परंतु बहरुल का यह चित्रण उससे भी एक कदम आगे है। किसी भी हालत में प्रोफेसर की पत्नी इतनी नकारात्मक नहीं हो सकती। चेखव की कथा में एक पत्नी और मां की पारंपरिक भूमिकाओं में है, जो उसके आंतरिक संघर्षों की जटिलताओं को छिपाता है। पत्नी ने कभी प्रोफेसर से प्रेम विवाह किया था। वर्तमान में निकोले स्टेपानोविच की पत्नी के चरित्र में मातृत्व की भूमिका एक केंद्रीय है। यह कथा पत्नी की दबी हुई आकांक्षाओं की ओर संकेत करती है। मनोविश्लेषणात्मक रूप से अपने बच्चों के प्रति यह प्रयास स्त्री के तौर पर अधूरी इच्छाओं की अभिव्यक्ति हो सकती है। बलिदान की गई आकांक्षाओं को मातृ भूमिका में एक आउटलेट या दूसरा जीवन मिल जाता है, जो उद्देश्य प्रदान करता है और साथ ही पत्नी के रुप में स्त्री की दबी हुई महत्वाकांक्षाओं का निकास मार्ग बनता है।

एक और महत्वपूर्ण चरित्र प्रोफेसर की बेटी लिजा का है, जिसे बहरुल ने प्रस्तुति से दृश्य में गायब रखा है, बस संवादों के विवरण में है। चेखव की लिजा का भले ही कम संवाद है, मगर कथा में पत्नी से अधिक महत्वपूर्ण थी, खास कर चौथे अंक में जिसमें रात की बेचैनी और दुःस्वप्न का दृश्य है। निकोले के चरित्र में पत्नी और उनकी बेटी लिज़ा के साथ रिश्तों की गतिशीलता जटिलता की परतें जोड़ती हैं। पत्नी और बेटी के साथ तनावपूर्ण संबंध भावनात्मक अलगाव के व्यापक विषय को दर्शाता है जो निकोले के जीवन में व्याप्त है। पारिवारिक बंधनों के बावजूद अलगाव और भावनात्मक दूरी की भावना प्रबल होती है, जो कथा को घेरने वाली उदासी के समग्र माहौल में योगदान करती है। उनकी बौद्धिक गतिविधियाँ भी जो कभी जीवन को अर्थ को अर्थ देती थीं, अब टार्चर की हद तक एक बोझिल दिनचर्या बन जाती हैं।

लिजा की तरह एक और चरित्र को प्रस्तुति में जगह नहीं दी गई है। वह चरित्र है मिहैल फ़्योदोरोविच जो प्रस्तुति में सुकांत शर्मा के रुप में संवाद में चर्चा भर आता है। इसी के विवाह प्रस्ताव पर सलाह लेने कात्या होटल में प्रोफेसर के पास जाती है। इसके अभाव से प्रस्तुति में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा है, बल्कि  निर्देशक द्वारा इस चरित्र को हटाने से मूल कथा पर ज्यादा ध्यान गया है।

मगर बेटी लिजा का अभाव प्रस्तुति को कमजोर करता है। और पता नहीं क्यों नौकर बहादुर का चरित्र रखा गया है। एंटोन चेखव की “ए बोरिंग स्टोरी” में कहानी के केंद्रीय पात्र निकोले स्टेपानोविच के नौकर या घरेलू कर्मचारियों की कोई भूमिका नहीं है। एक जगह पत्नी नौकर येगोर के बकाया वेतन की चर्चा करती है और नौकर इससे अधिक कहीं कथा में नहीं है। सारी कहानी मुख्य रूप से निकोले स्टेपानोविच, उनके परिवार के सदस्यों और अन्य पात्रों के साथ उनकी बातचीत के इर्द-गिर्द घूमती है। सारा फोकस उनके व्यक्तिगत और अस्तित्व संबंधी संघर्षों, रिश्तों और उनके अनुभवों पर है। निकोले स्टेपानोविच के घर में एक नौकर चरित्र की अनुपस्थिति कथा के मुख्य पात्रों के आंतरिक जीवन की खोज को प्राथमिकता देती है। नौकर के रुप में बहादुर के होने से कथा के एकालाप संवाद में बदले हैं, जो कथा के भाव के विपरित हैं। साथ नौकर द्वारा कात्या के द्वारा सुखे गुलाब की चर्चा प्रतीकात्मक है, मगर यह चेखव की कथा की मूल कथा–व्यवस्था के विपरीत है जिसमें कथा के चरित्र ही छुपे हुए प्रतीक हैं।

 

सेट और डिज़ाइन

नाटक में मिनिमलिस्ट सेट डिजाइन है। मिनिमलिस्ट लेकिन विचारोत्तेजक और प्रतीकात्मक सेट है। सेट में कोने में एक फ्रेम लटका हुआ है, जिसमें कोई तस्वीर नहीं है। फ्रेम है, मगर उसके होने का उद्देश्य या सार्थकता देने वाली तस्वीर के बिना। यह प्रोफेसर और कात्या के जीवन की तरह है, जो है मगर बिना इच्छित अर्थ के। इसी तरह सेट के लोउर डेफ्थ में गमले में गुलाब का सूखा पौधा है। यह सूखे जीवन का प्रतीक है।

यह भेद खोलने वाला सेट इस बात का भी प्रमाण है कि बहरुल भेद खोलने वाले निर्देशक हैं। वह अपनी बात को खोलने का सूत्र बिखरते चलते हैं। यह दर्शक को अपनी इच्छित बात तक जबरदस्ती ले जाने का शार्टकर्ट है। यह अतिरिक्त और गैरजरूरी बोझ है। प्रस्तुति में “To be, or not to be, that is the question” भी है, मगर क्या शेक्सपीयर के हेलमट के इस संवाद को चेखव की जरुरत थी। शेक्सपीयर का यह संवाद मन के अणु स्तरीय भाव को भारी शब्दों में कह रहा है। चेखव के अनुसार कभी भी आम जीवन में लोग इस तरह से संवाद नहीं करते, बल्कि मूल बात साधारण बातों के सब टेक्स्ट के रुप में रहती है। शेक्सपीयर की यह पंक्ति सीधे-सीधे चेखव विरोधी है।

वैसे मंच का डिज़ाइन सरल रखा गया है, जो दर्शकों को पात्रों और उनकी बातचीत पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति देता है। प्रकाश कम था, प्राप्स कम थे, केंद्र में था अभिनय। यह सेट घरेलू सेटिंग और पात्रों के आंतरिक परिदृश्य के बीच निर्बाध रूप से परिवर्तित हो रहा था।

चेखव और बहरुल दोनों की कात्या अंतिम दृश्य में काला गाउन पहन कर आती है। पाश्चात्य संस्कृति के व्यवहार में मृत्यु शोक की अवधि में काला वस्त्र पहना जाता है, मगर भारतीय संस्कृति के व्यवहार में मृत्यु शोक में सफेद कपड़ा पहना जाता था। मिखाइल बाख्तिन, “द डायलॉगिक इमेजिनेशन” में इस बात पर जोर देते हैं कि प्रत्येक संस्कृति दुनिया को देखने के एक अलग तरीके का प्रतिनिधित्व करती है और संस्कृति के साथ लेखक का संबंध ‘संवादात्मक चरित्र’ का होता है। [ संदर्भ-46, बाख्तिन] इसी तरह संस्कृति के अनुरूप दर्शक का भाव-बोध भी अलग -अलग होता है। रुस और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ में अंतर है, इसलिए रंगों से अलग भावबोध उत्पन्न होता है। इसलिए नाट्यांतरण में वस्त्रों के रंगो का रूपांतरण भी भारतीय दर्शक अनुभव के लिए अधिक प्रभावी होता।

इस प्रस्तुति में कई जगह बहरुल का अभिनय बड़े रंगमंच के लिए सही होता, मगर हाउस आफ वेरायटी थियेटर के छोटे और निजी होने कारण लाउड महसूस हो रहा था, विशेष कर जिस दृश्य में प्रोफेसर को दौरा पड़ता है। मगर अंतिम दृश्य में निचले स्वर का जो अभिनय था, वो इस हॉल में एकदम सटीक था।

अत  ऊध् र्व न  कर्त्तव्यः  कर्तुभिर्नाट्यमंडपः।

यस्मादव्यक्तभावं  हि  तन्न  नाटथं  व्रजेदिति।।

मण्डपे  विप्रकृष्टे  तु  पाठ्यमुउच्चारितस्वरम्  ।

अनिस्स रणधर्मत्वाद्विस्वरत्व  भ्रशं  बजेत्‌ ।। [संदर्भ-47, भरतमुनि]

अधिक प्रमाण के प्रेक्षा भवन में पात्रों का स्वर अव्यक्त हो जायगा, स्पष्ट नहीं सुनाई देगा, उसी में गुँज कर रह जायेगा। भरतमुनि के अनुसार प्रतिकूल रंगमंच पर सुर भी बेसुरा हो जायगा और राग या रागिनियो को गाया जायेगा, वे भी बेसुरी मालूम होगी। बात यह है कि रंगमंच के हिसाब से अभिनय के प्रभाव में अंतर आता है और अभिनेता को अपने मंच के हिसाब से खुद के सुर को साधना होता है।

 

नाट्यांतरण हेतु आवश्यक योग्यता

यहाँ एक अतिरिक्त मगर सबसे आधारभूत प्रश्न है कि रचना का मूल अर्थ या साराँश और चरित्र को समझ लेने के बाद नाट्यांतरण आसान हो जाता है क्या ? इसका उत्तर है नहीं? क्यों, इसके जवाब के लिए चेखव की तीन चिट्ठियों को पढ़ना जरूरी है, जिसमें वह नाटक लिखने की आवश्यक योग्यता को (पर)बात रहे हैं। पहली चिट्ठी में चेखव तीकोनोव को कहते हैं “थिएटर के लिए लिखने के लिए, आपको उससे प्यार करना चाहिए; इस प्यार के बिना उस लेखन से कुछ भी सार्थक नहीं निकलेगा। इस प्यार के बिना सफल मंचन का भी कोई आकर्षण नहीं है। अगले सीज़न में मैं नियमित रूप से थिएटर जाना शुरू कर दूंगा और मंच के मामलों में खुद को शिक्षित करने की कोशिश करूंगा” [संदर्भ–48, Chekhov] यह पत्र 1889ई का है, उस साल तक चेखव एक सफल कथाकार के रुप में स्थापित हो चुके थे और उनको पुश्किन पुरस्कार मिल चुका था।1887 में कोर्श नाम के एक थिएटर मैनेजर के लिए चेखव एक नाटक ‘इवानोव’ एक पखवाड़े में लिख चुके थे। इवानोव चेखव के बौद्धिक विकास और साहित्यिक करियर में एक महत्वपूर्ण क्षण था। इस अवधि से ही ‘चेखव की बंदूक’ का एक नाटकीय सिद्धांत जोड़ा जाता है, जिसके अनुसार कथा में प्रत्येक तत्व आवश्यक और अपरिहार्य हो और बाकी सब कुछ हटा दिया जाए। [संदर्भ –49, Chekhov] और इन शानदार उपलब्धि के बाद भी चेखव थियेटर के लिए लिखने के लिए खुद को शिक्षित करने की बात कर रहे है।

पर यहाँ एक उल्टा प्रश्न यह भी है कि क्या केवल नाटक से प्रेम और रंगमंच से पूर्ण शिक्षित होना काफी है? यह नहीं भूलना चाहिए कि नाटक में दीक्षित होने से पहले ही चेखव एक सफल और सक्षम कथाकार थे। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि नाटकीय तकनीक और दृश्य के परे नाट्यालेख भी कथा या साहित्य है। इसलिए कथा साहित्य के विकास से भी नाटककार को परिचित होना चाहिए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि विधागत तकनीक के भी परे मूल्यगत प्राथमिकताएं और मापदंड महत्वपूर्ण है, जिसे चेखव को भी सीखना पड़ा और जिसका विवरण आगे की दो चिट्ठियों में पढ़ा जा सकता है।

दूसरी चिट्ठी उस समय के प्रसिद्ध रूसी लेखक चौसठ वर्षीय दिमित्री ग्रिगोरोविच ने छबीस वर्षीय चेखव की लघु कहानी “द हंट्समैन” पढ़ने के बाद उन्हें लिखा था कि “जल्दबाजी में लिखना बंद करो।.. तुम में वास्तविक प्रतिभा है, एक ऐसी प्रतिभा जो तुमको नई पीढ़ी के लेखकों के बीच अग्रिम पंक्ति में रखती है। मुझे नहीं पता कि तुम्हारी आर्थिक स्थिति क्या है। यदि वह खराब है, तो तुम्हारे लिए बेहतर होगा कि तुम भूखे रहो, जैसा कि हम अपने दिनों में करते थे, और एक परिपक्व, पूर्ण कार्य के लिए अपने अनुभवों को बचाकर रखो, जिसे एक बैठक में नहीं लिखो, बल्कि प्रेरणा के रचनात्मक क्षणों के दौरान लिखो।” [संदर्भ-50, ग्रिगोरोविच]

तीसरी चिट्ठी चेखव ने ग्रिगोरोविच को जवाब में लिखा कि “आपका पत्र मुझ पर बिजली की तरह गिरा। मैं इतना अभिभूत हो गया था कि मैं आंसुओं के कगार पर पहुंच गया था, और अब भी मुझे लगता है कि इसने मेरे अंतर्मन पर गहरी छाप छोड़ी है। मैं जो लिख रहा हूँ, उसका एकमात्र कारण यह है कि आपकी नजर में अपने गंभीर पाप को कुछ हद तक सही ठहरा सकूं। अब तक मैं अपने साहित्यिक कार्यों से बेहद तुच्छता से, लापरवाही से व्यवहार करता था, मुझे एक भी कहानी पर एक दिन से अधिक काम करने की याद नहीं है, और “द हंट्समैन”, जो आपको ठीक लगा, मैंने तब लिखा था जब मैं तैराकी कर रहा था। मैंने अपनी कहानियाँ उसी तरह लिखीं जैसे पत्रकार रिपोर्ट लगाते हैं- यंत्रवत्, केवल आधे-अधूरे ढंग से, पाठक या स्वयं की ज़रा भी चिंता किए बिना।” [संदर्भ – 51, Chekhov]

          पहले पत्र में थियेटर से प्रेम के साथ थियेटर के लिए लिखने के लिए खुद को शिक्षित करने बात है, जिसमें कथा साहित्य के विकास से भी नाटककार को परिचित होने की बात अंतर्निहित है। दूसरे पत्र में प्रेरणा के रचनात्मक क्षणों में रचना को लिखे जाने पर बल दिया गया है। इसलिए भी नाट्यरुपातंरण हेतु किसी रचना के प्रेरणा के रचनात्मक क्षणों को समझना आवश्यक होता है। तीसरे पत्र में रचना पर कई बार काम करने की जरूरत की बात कर रहे हैं। इन योग्यताओं के बाद ही किसी रचना के असली शरीर को समझा जा सकता है, जो एक सक्षम नाट्यरुपांतरण को संभव बनाता है। इसके बाद ही उन शब्दों की जाँच संभव होती है, जिसने रचना और चरित्र रुप या शरीर दिया है।

 

रचना या चरित्र का शरीर: भाषा और पाठ

इसके लिए ‘ए बोरिंग स्टोरी֥‘ के शब्दों की जाँच आवश्यक है। इसके लिए पुन: केंद्रीय चरित्र प्रोफेसर निकोलाई स्टेपानोविच के शब्दों को देखना होगा “मेरी याददाश्त कमज़ोर हो गई है; मेरे विचारों में अनुक्रम की कमी है, और जब मैं उन्हें कागज पर उतारता हूं तो मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि मैंने उनके सहजता खो दी है; उसकी संरचना एकरस है; मेरी भाषा ख़राब और कमंजोर है। अक्सर मैं वही लिखता हूँ,जो मेरा मतलब नहीं होता।” [संदर्भ –52, Chekhov] चेखव चाहता है कि पाठक निकोलाई की स्मृति और शब्द दोनों को विश्वसनीय या एकदम प्रामाणिक नहीं माने। चेखव ने सबसे पहले इसे ‘बूढ़े आदमी का नोटबुक’ का उपशीर्षक दिया है, जो स्म़ृतिदोष का शिकार है। पूरे पाठ का आरंभ ही शब्द और भाषा पर अविश्वास के साथ होता है।

यह कहकर स्वयं चेखव जानबूझकर इस भ्रम का पाठक के मन में निर्माण करते हैं। लेखकीय मंशा और साहित्यिक सृजन का यह अलगाव पाठ के भीतर पात्रों को स्वतंत्र तत्व के रूप में देखने की आवश्यकता पैदा करता है। “अंतर” (“différance”) की अवधारणा तब सामने आती है, जब चेखव की कथा मूर्त और अमूर्त के बीच नेविगेट करती है और लेखकीय इरादा और पाठक की व्याख्या के बीच की सीमाओं को धुंधला कर देती है। वैसे भी भाषा सत्य को व्यक्त करने के लिए एक पारदर्शी या निर्दोष माध्यम नहीं है, बल्कि शक्ति संरचना द्वारा संचालित भाषाई निर्माणों की एक श्रृंखला है। भाषा की वस्तुनिष्ठता संदेहगत है, जो भाषाई पारदर्शिता की आधुनिकतावादी विश्वास के विपरीत है। “ए बोरिंग स्टोरी” में चेखव की भाषा शब्दों के खेल की एक श्रृंखला है, जो अर्थ के क्षरण में योगदान देती है। निकोलाई की अकादमिक भाषा कॉलेज में कभी ज्ञानोदय का एक उपकरण थी, मगर घर में वही भाषा संबंधों के अर्थ को अस्पष्ट करती है और भाव को प्रकट होने के बजाय अस्पष्ट करती है। चेखव ने भाषाई पदानुक्रम को नष्ट कर अर्थ की अस्थिरता को उजागर किया है। निकोले के आंतरिक एकालाप में शब्द निश्चित अर्थ खो देते हैं और कई अर्थों का शोर होता है।

लेखन या भाषा स्वयं निर्माणाधीन है, जो समाज और व्यक्ति की जरूरत के अनुसार परिवर्तनशील है और अर्थ विभिन्न पाठों की परस्पर क्रिया से आकार लेता है। इसलिए भाषा के शाब्दिक अर्थ को इतर पाठ के संदर्भ में करना संपूर्ण अर्थ को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। चेखव मुख्य कथ्य कथा में मानवीय रिश्तों की जटिलता से अर्थ के कई पाठ बनाते हैं, जिसे सब-टेक्स्ट या उप-पाठ से सुलझाया जा सकता है। जैसे-जैसे हम कथा की प्रगति पर विचार करते हैं ,कथा की घटनाओं में एक सुविचारित आयोजन को देखा जा सकता है, जो पाठ की व्यापक एकता में ही सही अर्थ देता है। छह अंकों में हर अंक का अपना विशेष उद्देश्य है , मगर हर अंक आपस में मिलकर अलग अर्थ देते हैं। नायक के आधी रात को जागने से लेकर गनेकर से लीजा की शादी के रहस्योद्घाटन तक हर घटना समग्र कथा के भीतर एक विशिष्ट कार्य करती है और एक दूसरे के संदर्भ में विशेष अर्थ निर्मित करती है और उस स्थिति में शब्द गौण हो जाता है।

भाषा के मामले में चेखव की खामोशियाँ बहुत कुछ कहती हैं। संवाद में अंतराल, अनकहे संवाद, उसके चरित्र को समझने में महत्वपूर्ण बन जाते हैं। चेखव एक भाषाई परिदृश्य का निर्माण करते हैं जहां असली बात जानबूझ कर अनकहा रखते हैं। उनके लेखन में स्पष्ट संवाद जितना महत्व रखता है, उससे अधिक असंवाद और मौन की शक्ति महत्व रखती है, जो मानवीय भावनाओं की अनकही जटिलताओं को व्यक्त करती है। चेखव पात्रों की भावनाओं की जटिलताओं को रेखांकित करने के लिए संचार में अंतराल या मौन का इस्तेमाल करते हैं, जो अदृश्य होने की हद तक एक सूक्ष्म कथा शैली है। इसका उदाहरण निकोले स्टेपानोविच और लिज़ा के बीच तनावपूर्ण संबंधों में पाया जा सकता है। एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद उनके बीच भावनात्मक दूरी साफ नजर आती है। लिज़ा की अव्यक्त भावनाएँ, शायद डर या अलगाव की भावना के कारण एक मार्मिक वातावरण बनाती हैं, जिसमें प्रोफेसर की सारी उपलब्धि व्यर्थ हैं। ये मूक क्षण एक कथा उपकरण के रूप में काम करते हैं, जो पाठकों को पात्रों की बातचीत के उप-पाठ में गहराई से जाने के लिए आमंत्रित करते हैं। उदाहरण के लिए जब लिज़ा भावनात्मक उथल-पुथल से गुज़र रही होती है और प्रोफेसर की पत्नी बेटी की मदद करने की बात कहती है” उसकी मदद करो! उसकी मदद करो!’ मेरी पत्नी ने मुझसे विनती की। “कुछ करो!” क्या करता? मैं कुछ नहीं कर सका।” और ठीक इस बीच प्रोफेसर मन में लिज़ा के  बचपन के बारे में सोच रहा था “मैं सोच रहा था कि हम कैसे लिज़ा को बचपन में नहाते थे।” यहाँ दृश्य का असली अर्थ पिता के अनकहे शब्दों में है। घंटो व्याख्यान देने वाले प्रोफेसर के पास वो शब्द नहीं है, जिससे वह अपनी बेटी लिज़ा को सांत्वना भी दे सके। शब्द की यही असमर्थता फिर दिखती है, जब कात्या अंतिम दृश्य में उससे सलाह लेने आती है और “केवल एक शब्द, केवल एक शब्द!” [संदर्भ-53, Chekhov] मांगती रह जाती है, मगर प्रोफेसर के पास वह शब्द नहीं था “मेरे शब्द सुनो, कात्या, मैं नहीं जानता।…. ।” [संदर्भ- 54, Chekhov] यहाँ जो कहा जा रहा है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है, जो नहीं कहा जा रहा है और जो पात्र कह पाने में अक्षम हैं।

दरअसल भाषा में कथा कहना इतना परिचित और सर्वव्यापी है कि हमेशा अकथ्य और अंततः कथ्य भी अनदेखा रह जाता है या उसका अति मूल्यांकन हो जाता है। हम अपने अनुभव और मानवीय घटनाओं की अपनी स्मृति को मुख्य रूप से कथा के रूप में व्यवस्थित करते हैं। कथा समय, प्रक्रिया और परिवर्तन के साथ तालमेल बिठाने की एक बुनियादी मानवीय रणनीति है। भाषा इसमें बाधा हो सकती है और भाषा की इस बाधा से परे ही असली कथा होती है। जैसा कि स्तानिस्लावस्की ने चेखव के नाटक के बारे में कहा था “उनका आकर्षण संवाद में नहीं है; वह संवाद के पीछे के अर्थ में, विरामों में, अभिनेताओं की शक्ल में, उनके भावनाओं को प्रदर्शित करने के तरीके में निहित है।” [संदर्भ –55, स्तानिस्लावस्की]

इसलिए चेखव का लेखन नाट्य प्रस्तुति के लिहाज से हमेशा खतरनाक रहा है, खासकर अपने सब-टेक्स्ट के कारण। स्वयं चेखव को भी 1896 ई में अलेक्जेंड्रिंस्की (Alexandrinski) थियेटर की सीगल नाटक का पहली प्रस्तुति में असफलता हाथ लगी थी। बहरुल की यह प्रस्तुति भी उसी कड़ी में है, जिसमें कलाकार की भाषा या अभिव्यक्ति का माध्यम उसके कथ्य के सामने बौना होता है। स्तानिस्लावस्की को भी अपनी शुरुआती प्रस्तुति की सफलता के बावजूद यह एहसास हुआ कि उनकी चेखव के लेखन की समझ अधूरी थी, और धीरे-धीरे अभिनय के विभिन्न प्रयोगों के द्वारा चेखव के पाठ के लिए समक्ष अभिनय की नयी प्रक्रिया को विकसित किया। पाठ के लिए ऐसी ही गंभीरता और अभिव्यक्ति के माध्यम के विस्तार के प्रयास के साथ ही चेखव की रचना की एक सक्षम प्रस्तुति संभव है, जिससे निर्देशक बहरुल इस्लाम और सीगल  ग्रुप की यह प्रस्तुति अभी दूर है। बहरुल इस्लाम के अभिनय के रेंज में उस दूरी को तय करने की संभावना है, मगर इसके लिए एक सुविचारित पाठ, चरित्र निर्णय और डिज़ाइन की आवश्यकता है।  

(समाप्त)

संदर्भ सूची

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